Wednesday, August 22, 2018
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पृथक निर्वाचन मंडल की माँग पर डॉक्टर अांबेडकर का स्वागत और विरोध!

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 10

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की दसवीं कड़ी – सम्पादक

 

 

91.

 

26 जनवरी 1932 को एस. एस. मुल्तान द्वारा  मौलाना शौकत अली और डा. आंबेडकर का आगमन

(फाइल संख्या 3447ध् भ्ध्प्प्प्ध्32.37)

अधीक्षक, एच एवं आई, मण्डल

डिप्रेस्ड क्लासेस इंस्टीट्यूट, बम्बई के सचिव को सम्बोधित बम्बई पोर्ट ट्रस्ट के सेक्रेटरी के पत्र की एक प्रति आपके अवलोकन हेतु अग्रसारित की जाती है। इससे आपको पता चल जायेगा कि दलित वर्गों और खिलाफत कमेटी को बेलार्ड तट पर डा. आंबेडकर और मौलाना शौकत अली के आगमन के सम्बन्ध में क्या रियायतें दी गईं हैं।

2- आपका ध्यान बन्दरगाह के प्रबन्धक कार्यालय की इसी 27 जनवरी के टिप्पणी की ओर आकर्षित कराना है, जिसकी प्रतिलिपि आपको सीधे भेजी गई है, और आपको उसके अनुसार सारी व्यवस्थाएॅं करनी हैं। दलित वर्गों और खिलाफत कमेटी के सचिवों के साथ यह सहमति बनी है कि ग्रीन गेट सुबह पाॅंच बजे तक खुला रखा जायेगा। ये इन्तजाम उसी तरह के किए जायेंगे, जिस तरह के इन्तजाम मि.गाॅंधी के आगमन पर किए गए थे। दलित वर्गों के वालन्टियरों को प्रवेश द्वार से हाल में जाने के लिए ग्रीन गेट तक सड़क पर जाने की अनुमति दी जाए। यदि आवश्यक हो, तो अधीक्षक को वालन्टियरों को ऐसी स्थिति में रखना चाहिए, जिससे सामान्य यातायात बाधित न हो। जब तक नाव किनारे पर आकर बाॅंध न दी जाए, तब तक किसी को भी तट पर जाने की अनुमति न दी जाए, और पास-धारकों के सिवाए किसी को भी जहाज के लिए कस्टम हाल में प्रवेश न दिया जाय।

3- इसी नाव से आने वाले गोलमेज सम्मेलन की विभिन्न समितियों के सदस्यों के विरुद्ध काॅंग्रेस के विरोध प्रदर्शन करने की भी सम्भावना है। इस स्थिति से निपटने के इन्तजाम ‘ए’ मण्डल के अधीक्षक को करने होंगे। जो भी विरोध प्रदर्शन हो, उसकी अनुमति किसी भी परिस्थिति में बलार्ड तट की सीमा में नहीं दी जाए।

4- मेले में यातायात को नियमित करने के उद्देश्य से ‘टी’ मण्डल से तीन अधिकारी भेजे जायेंगे। मोटर कारों की पार्किंग हमेशा की तरह की जाए।

5- ऐसी सम्भावना है कि विरोध प्रदर्शन रोड गेट के माध्यम से प्रवेश करने का प्रयास कर सकता है। अतः उस जगह पर मजबूत प्रबन्ध करने होंगे।

6- हाल में प्रवेश के लिए पास की एक प्रति इस पत्र के साथ भेजी जा रही है।

7- यह व्यवस्था की गई है कि मौलाना शौकत अली और डा. आंबेडकर सुबह 7.15 और 7.30 बजे के बीच उतरेंगे। दोनों की समितियों के सचिवों को सूचित कर दिया हैं कि सुबह 8.30 बजे तक बल्लार्ड तट साफ हो जाना चाहिए। सुबह 8.30 और 9 बजे के बीच मताधिकार समिति के सदस्य गवर्नमेंट हाउस के लिए कार से पहुॅंचेंगे। वे रेड गेट से ही डाक्स में प्रवेश करेंगे।

8- एस. एस. ‘मूलतान’ सुबह लगभग 4 बजे बल्लार्ड तट पर पहुँचेगा। यह पोर्ट ट्रस्ट का रिवाज है कि जब मेल बोट जल्दी आती है, तो मेल गाड़ियों, कुलियों और डाक कर्मचारियों आदि के प्रवेश के लिए ग्रीन गेट को एक घण्टा पहले खोल दिया जाता है। किन्तु इस अवसर पर ऐसा नहीं किया जायेगा। डाक कर्मचारी आदि लोग रेड गेट से बल्लार्ड तट पर जायेंगे। इसलिए ग्रीन गेट खोलने से पहले रेड गेट और बल्लार्ड तट पर अतिरिक्त इन्तजाम करने होंगे।

 

(हस्ताक्षर-)

डपायुक्त पुलिस, पोर्ट

प्रतिलिपि,

विशेष शाखा

 

 

92.

डा. आंबेडकर और गोलमेज सम्मेलन

 

(बाम्बे सिटी विशेष शाखा, 30 जनवरी)

दलित वर्गों के नेता डा.आंबेडकर एस. एस. मूलतान से 29 जनवरी को बम्बई पहुॅंचे हैं। उसी दिन शाम को डा. पी. जी. सोलंकी की अध्यक्षता में दलित वर्गों के 1500 लोगों ने दामोदर हाल के पीछे पैदान में उनका स्वागत किया गया था।

डा. सोलंकी ने गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के हित में कार्य करने के लिए डा. आंबेडकर को बधाई दी।

डा. आंबेडकर ने उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों की समस्या को रखने के लिए सक्षम नहीं हो सकते थे, अगर उन्हें सात करोड़ अछूतों का एकजुट समर्थन नहीं मिलता। उन्होंने अपने और दलित वर्गों के कुछ अन्य गुटों के बीच मौजूद मतभेदों का उल्लेख करते हुए उनको आश्वस्त किया कि उन्होंने दलित वर्गों के किसी खास गुट का पक्ष नहीं लिया है, बल्कि उनकी योजना सम्पूर्ण समुदाय के हितों को संरक्षण दिलाने की है। उन्होंने अल्पसंख्यक समस्या के निवारण में मि.गाॅंधी के रवैए की आलोचना की और कहा कि वे, जिस समय दलित वर्गों के साथ बात कर रहे थे, उसी समय गुपचुप तरीके से मुसलमानों से भी बातचीत कर रहे थे। उन्होंने उपस्थित लोगों से कहा कि ऐसे नेता पर भरोसा मत करो, और हमेश अपनी ताकत पर निर्भर रहिए। अन्त में उन्होंने नासिक मन्दिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह करने वाले लोगों को बधाई दी।

 

93.

डा. आंबेडकर की वापसी

(दि बी. एस. ए., 13 फरवरी 1932)

 

384, बम्बई सिटी एस. बी., 30 जनवरी। 29 जनवरी को डा आंबेडकर का, एस. एस. मूलतान से बम्बई वापिस आने पर दलित वर्गों के लगभग 1500 लोगों के द्वारा दामोदर ठाकरसे हाल के पीछे मैदान में एक जनसभा में स्वागत किया गया। डा. सोलंकी ने, सभा की अध्यक्षता की, जिन्होंने डा. आंबेडकर को गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के हित में काम करने के लिए बधाई दी। अपने स्वागत का आभार व्यक्त् करते हुए डा. आंबेडकर ने कहा कि यह सात करोड़ अछूतों की एकजुटता का परिणाम था, जो गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के वास्तविक कष्टों को रखने में समर्थ हो सके। उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रश्न के निपटारे में राष्ट्रवादी मुसलमानों के साथ वार्ता में मि. गाॅंधी के साजिशी रवैए की आलोचना की और अपने लोगों को उनसे सावधान रहने की सलाह दी।

 

94.

डा. बी. आर. आंबेडकर

(बी. एस. ए. पी., 20 फरवरी 1932)

430, ईस्ट खांदेश, 6 फरवरी। 31 जनवरी को जब डा. आंबेडकर को दिल्ली जा रहे थे, तो ईस्ट खांदेश के महारों ने भुसावल स्टेशन पर उनका स्वागत किया और उन्हें ज्ञापन दिया।

 

95.

डा. आंबेडकर की निरर्थक धमकी

मुन्जे राजा समझौता और उसके बाद

(दि बाम्बे क्रानिकल,  27 फरवरी 1932)

(हमारे विशेष संवाददाता द्वारा)

नई दिल्ली, 26 फरवरी।

डा. आंबेडकर की ‘हमारे और हम लोगों के बीच संघर्ष को तोड़ने’ की धमकी और उनकी समिति के एक सदस्य के द्वारा इस धमकी के विरुद्ध लार्ड लोथियन का विरोध नवीनतम घटनाक्रम है, जो आॅल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन के आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में निर्णय लेने के सम्बन्ध में सामने आया है।

ऐसा प्रतीत होता है कि यह पता लगने पर कि ऐसोसियेशन के अध्यक्ष ने संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में घोषणा की है, वे इस बात से डर गए हैं कि एसोसिएशन के इस समर्थन से लन्दन में उनकी सारी गतिविधियों पर पानी फिर सकता है। अतः डा. आंबेडकर ने मि. जी. ए. गवई, एम. एल. सी., महासचिव, आॅल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन और सी. पी. प्रोविंसियल फ्रेन्चाइज कमेटी के सदस्यों को निम्नलिखित पत्र लिखा है-

 

आंबेडकर की चिन्ता

 

मैं आपको अपने माॅंगपत्र से अवगत कराने के लिए उसकी एक प्रतिलिपि भेज रहा हूॅं। आप इसके अन्तिम पैरे पर ध्यान देंगे, जिस पर हमारी कमेटी और इसलिए आपकी कमेटी भी साम्प्रदायिक प्रश्न पर चर्चा नहीं कर सकती। प्रधानमन्त्री के पत्र और कमेटी द्वारा जारी प्रश्नावली से यह स्पष्ट हो जाता है। हमारी कमेटी के अध्यक्ष दिल्ली और लखनऊ दोनों स्थानों पर इस प्रश्न पर एक निर्णय दे चुके हैं, जो इसी विचार के समर्थन में है। इसलिए आपको अपनी कमेटी को यह बताना होगा कि वे इस प्रश्न पर चर्चा नहीं कर सकते, और यदि वे इस पर जोर देते हैं, तो आपको इस पर चर्चा करने से मना कर देना चाहिए। आपको संयुक्त बनाम पृथक निर्वाचन पद्धति पर चर्चा करने के बजाए, आपको इस विषय पर चर्चा ही नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह आपकी कमेटी के विचार का विषय ही नहीं है। मैं जानता हूॅं कि आपकी समिति को प्रश्नावली मिल चुकी है।

 

राजा के रवैए से स्तब्ध

 

अभी मुझे सिर्फ एक बात कहनी है। मैं यह जानकर स्तब्ध हूॅं कि मि. राजा ने अपना मत बदल दिया है और अब वह संयुक्त निर्वाचन की वकालत कर रहे हैं। मुझे आशा है कि आपकी कमेटी इस नीति पर उनका समर्थन नहीं करेगी, क्योंकि यह हर तरह से आत्मधाती है, किन्तु यदि वह उनका समर्थन करती है, तो हममें और हमारे विरुद्ध युद्ध के बीच स्थाई विच्छेद हो जायेगा, जिससे बचने का मैं हर कीमत पर प्रयास कर रहा हूॅं। इसलिए इसमें हठ न करें। मुझे आश्वस्त होते हुए खुशी होगी कि आप मुझसे बातचीत किए बगैर कुछ भी ऐसा नहीं करेंगे। मैंने मताधिकार समिति को उत्तर देने के लिए एक विस्तृत प्रश्नावली तैयार की है, जो टाइप हो रही है। मैं टाइप होने के बाद शीघ्र ही उसकी एक प्रति आपको भेजूॅंगा।

 

धमकी सफल नहीं हुई

यह सब जानते हैं कि यह धमकी उन लोगों को डराने में सफल नहीं हुई है, जो संख्या के आधार पर सीटों के आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचन का समर्थन करते हैं, और उनके तथा हिन्दू महासभा के बीच इस समझौते का निष्कर्ष पहले ही उसके सफल परिणाम को दर्शाता है।

 

धमकाने वाला पत्र

 

कमेटी के एक सदस्य के विरुद्ध लार्ड लोथियन के प्रति दर्ज किए गए प्रतिरोध तथा धमकी के पत्रों और उनके आदर्श जवाबों का कोई प्रभाव हो सकता है या नहीं, परन्तु एसोसिएशन की कार्यकारी समिति यह मानती है कि लोथियन कमेटी द्वारा जारी की गई प्रश्नावली ने दलित वर्गों को एक विशेष स्थान दिया था और उन्हें इन वर्गों के सम्बन्ध में मत व्यक्त करने के लिए आमन्त्रित किया था कि उनके लिए पृथक निर्वाचन होना चाहिए या संयुक्त निर्वाचन और किस अनुपात में?

 

भ्रामक सूचना

 

मि. गवई को समय से पूर्व ही दलित वर्गों के लिए निम्नलिखित वक्तव्य जारी करने का अवसर मिल गया था- ‘आपको कुछ भ्रामक जानकारी दी जा रही है कि भारतीय मताधिकार समिति निर्वाचन पद्धति के प्रश्न पर व्यक्तियों अथवा एसोसिएशनों के साथ चर्चा नहीं कर सकती, जो इस विषय पर दलित वर्गों की ओर से ज्ञापन प्रस्तुत करते/करती हैं। यह गलत जानकारी है। क्योंकि समिति द्वारा भेजी गई प्रश्नावली में पत्रक 2 में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व विषय के अन्तर्गत यह स्पष्ट कहा गया है कि विधायिका में समुदाय का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जो एक विशेष प्रस्ताव बनाया जायेगा, वह क्या होगा।

 

आदर्श उत्तर

 

फिर भी मैं सुझाव दूॅंगा कि हमारी एसोसिएशनों को यह अच्छी तरह से सलाह  दी जाए कि वे दूसरों के द्वारा तैयार किए गए आदर्श उत्तरों से अलग अपने स्वयं के प्रान्तों के सन्दर्भ में अपने उत्तर भिजवाएॅं। 1 दिसम्बर 1931 को जैसा कि प्रधान मन्त्री द्वारा घोषित किया गया है, भारत के संविधान में आने वाले बदलावों को ध्यान में रखते हुए प्रान्तों को पूर्ण प्रान्तीय स्वायत्तता प्रदान की जायेगी। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हमारे समुदाय को भी समय के साथ चलना चाहिए और हमें अपने ऊपर उल्लिखित निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो हमने प्रधान मन्त्री के वक्तव्य से पहले लिया था।

 

96

डा. आंबेडकर के प्रचार से पहले ही लोथियन कमेटी पृथक निर्वाचन के लिए तैयार

(दि बाम्बे क्रानिकल,  23 फरवरी 1932)़

डा. आंबेडकर द्वारा इंग्लैण्ड से वापिस आने के बाद से दलित वर्गों में पृथक निर्वाचन के पक्ष में राय बनाने के लिए एक बहुत ही घृणित प्रकृति का प्रचार किया जा रहा है।

डा. आंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलन के प्रथम सत्र में जाने से ठीक पहले नागपुर में एक दलित वर्ग सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचन ही उनके समुदाय के हित में बेहतर है। उन्होंने बम्बई प्रान्तीय साइमन कमेटी की रिपोर्ट में भी अपनी प्रसिद्ध असहमत टिप्पणी में यही घोषित किया था कि साम्प्रदायिक निर्वाचन सबसे बड़ी बुराई है, जो भारत में साम्प्रदायिक द्वैष और तनाव को बढ़ाएगी। इसलिए आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचन की पद्धति ही उनके समुदाय के लिए सर्वश्रेष्ठ होगी।

 

अपनी बात से हट गए

किन्तु लन्दन की दो यात्राओं, जो उन्होंने 1930 और 1031 में गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधि के रूप में की थीं, और सेंट जेम्स पैलेस के वातावरण, जिसमें वे रहे थे, उनके विचार को बदल दिया है। वापिस आने के बाद वे पृथक निर्वाचन के पैरोकार हो गए हैं। उन्होंने मताधिकार समिति द्वारा जारी प्रश्नावली के लिए अपने उत्तरों का जो एक सेट तैयार किया है, उसकी प्रतियाॅं अनेक व्यक्तिगत सदस्यों तथा दलित वर्गों के कुकुरमुत्ता संगठनों को भेज दी हैं। इनमें प्रत्येक पैराग्राफ के आरम्भ में व्यक्तिगत सदस्यों और संगठनों को अपना नाम भरने के लिए खाली जगह छोड़ दी गई है।

 

घिसेपिटे उत्तर

प्रश्नावली के सौ उत्तर घिसेपिटे हैं-

‘………………..(यह रिक्त स्थान संगठन के नाम से भरा जायेगा) का मत है कि दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व सामान्य निर्वाचन में सुरक्षित नहीं हो सकता। इसमें वे अपनी पसन्द के बहुत कम प्रतिनिधियों को सुरक्षित कर सकते हैं। भले ही व्यस्क मताधिकार हो। इसके कारण इस प्रकार हैं-

‘(अ) प्रत्येक प्रदेशीय निर्वाचन क्षेत्र में दलित वर्ग जनसंख्या में अल्पसंख्यक हैं और वे चुनावों में अपने सदस्यों को जिताने के लिए बहुत बड़ी अल्प संख्या में होंगे।

‘(ब) सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण उच्च जाति का कोई भी व्यक्ति दलित वर्गों के प्रत्याशियों को वोट नहीं देगा।

‘(स) दूसरी ओर उच्च जातियों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने और उच्च वर्गों के सामाजिक प्रभाव की वजह से मतदाता हमारे अपने प्रत्याशी के विरुद्ध उच्च जाति के प्रत्याशियों के लिए मतदान करेंगे। इस प्रकार उच्च जातियों के समर्थन पर दलित वर्गों का कोई भी व्यक्ति परिषद के लिए नहीं चुना जा सकेगा।’

 

पहले से निर्धारित

दलित वर्गों के कुछ सदस्यों ने डा. आंबेडकर से प्रश्न किया था कि क्या पृथक निर्वाचन दलित समुदाय की अक्षमताओं को हटाने की वजाए अस्पृश्यता को ही कायम नहीं रखेगा? इसका डा. आंबेडकर ने नौकरशाही के स्वर में जवाब दिया कि मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद में दलित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों की घोषणा में अक्षमताओं की समाप्ति की घोषणा भी है। कानून तथाकथित उच्च जातियों के किसी भी व्यक्ति के लिए दलित वर्गों के साथ अछूत जैसा व्यवहार करना असम्भव बना देगा।

उन्होंने कहा कि अपने समुदाय में संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में किसी भी राय को प्रभावी ढंग से जाॅंचने के लिए उन्होंने पिछले माह मताधिकार समिति के सदस्यों के साथ यात्रा की थी। समिति निश्चित निर्देशों और पहले से सोच विचार के साथ अल्पसंख्यक समुदायों के लिए पृथक निर्वाचन की सिफारिश के लिए तैयार हो गई थी तथा उसने किसी भी कीमत पर संयुक्त निर्वाचन को सुधार के लिए उपयुक्त नहीं माना था। अतः उनके समुदाय को, व्यावहारिक लोगों के रूप में, संयुक्त निर्वाचन के लिए मामले तैयार करने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए, बल्कि पृथक निर्वाचन के आधार पर काम करने की तैयारी करनी चाहिए।

अपने समुदाय की स्थिति को मजबूत करने के लिए डा. आंबेडकर का ध्येय भारतीय राष्ट्रीय काॅंग्रेस के समानान्तर दलित वर्गों की सभी 46 उपजातियों को मिलाकर एक ‘आॅल इंडिया बोर्ड’ बनाने का है। अगर इन 46 उप-जातियों का गठन होता है, तो शुरुआती समिति ‘अस्पृश्यता के भीतर अस्पृश्यता’ होगी। उदाहरण के लिए, चमार मानते हैं कि महार उनसे समाज में स्तर और स्थिति में निचली श्रेणी में हैं। वे एक दूसरे के यहाॅं न विवाह करते हैं और न भोज करते हैं। महारों के कुॅंओं का इस्तेमाल भी चमार नहीं करते हैं। इस सामान्य बात को छोड़कर कि वे सभी हिन्दू कहलाते हैं, उनकी सामाजिक प्रथाएॅं, रीति-रिवाज और संस्कृति एक दूसरे से अलग है।

प्रस्तावित बोर्ड में दलित वर्गों की इन सभी 46 उपजातियों का प्रतिनिधित्व होगा, जो जारी किए गए एक ही घोषणा पत्र पर चुनावों के लिए सदस्यों का चयन करेंगे और उनका चुनाव लड़ायेंगे। चुने गए सदस्य एक पार्टी के रूप में विधान सभाओं में प्रवेश करेंगे, मतदान करेंगे और अन्य पार्टियों के साथ मिलकर मन्त्रिमण्डल भी बनायेंगे। लेकिन अपने समर्थकों के बीच ‘बाबासाहेब’ कहे जाने वाले डा. आंबेडकर यह हल खोजने में असमर्थ हैं कि इन विभिन्न उपजातियों में सीटों का बॅंटवारा किस तरह होगा कि उसे किसी भी विधायिका में अपने समुदाय के लिए आबंटित किया जा सके। डा. आंबेडकर प्रत्येक उपजाति को उचित प्रतिनिधित्व का आश्वासन दे रहे हैं और कुछ मामलों में ‘पृथक निर्वाचन में भी पृथक निर्वाचन’ स्वीकार करने को तैयार हो रहे हैं। वे अभी भी इस समस्या पर काम कर रहे हैं, और जब अपना समाधान प्रकाशित करेंगे, तो उसे बहुत रुचि के साथ पढ़ा जायेगा।

 

97

बहती धारा

(दि बाम्बे क्रानिकल,  2 अप्रैल 1932)़

डा. आंबेडकर द्वारा जारी बयान, जिसमें निर्वाचन के विषय पर उनके और मि. गवई तथा मि. जाधव के बीच हुए एक निजी पत्राचार का खुलासा हुआ है, हम समझते हैं, जनता पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं डालेगा। इसका उद्देश्य, अवश्य ही, राजा-मुंजे समझौते और देश में उसके समर्थन को बदनाम करना है। डा. आंबेडकर ने बहुत साहस के साथ यह दावा किया है कि पूरे देश के दलित वर्गों ने इस समझौते को नकार दिया है, और वह एसोसिएशन केवल एक कागजी संगठन है। उनका पहली दलील इतनी गैरमामूली है कि उस पर गम्भीरता से चर्चा करने की जरूरत नहीं है। यह ज्ञात है कि इस समझौते ने व्यापक और प्रभावशाली समर्थन प्राप्त किया है। सम्पूर्ण देश के दलित वर्गों ने इसी में अपना हित घोषित किया है।

संयुक्त निर्वाचन के लिए केवल एक मामले का हवाला देते हुए मि. बी. जे. देवरुखकर और उनके समुदाय के अन्य स्थानीय नेताओं ने बम्बई में मताधिकार समिति को जो ज्ञापन सौंपा था, उसे दलित वर्गों के 145 संगठनों और 5000 सदस्यों का समर्थन प्राप्त था। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से संयुक्त निर्वाचन की घोषणा की गई थी। केवल तीन दिन पहले ही हमने बम्बई के लगभग 20 संगठनों के द्वारा राजा-मुंजे समझौते के समर्थन में लार्ड लोथियन को भेजे गए तार प्रकाशित किए थे। अतः डा. आंबेडकर और उनके सरकारी मित्रों के लिए संयुक्त निर्वाचन के लिए इस बढ़ते समर्थन की अनदेखी करने का प्रयास बेतुका है।

‘आॅल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन’ के सम्बन्ध में, जिसे डा. आंबेडकर कागजी संगठन कहते हैं, हर व्यक्ति जानता है कि इसकी पहिचान पिछले छह या सात वर्षों से दलित वर्गों के अखिल भारतीय संगठनों में लगभग 40 हजार सदस्यों के साथ सबसे बड़े संगठन के रूप में बनी हुई है। एसोसिएशन के साथ मि. राजा का क्या सम्बन्ध है, इस बारे में इसके संस्थापकों में एक मि. गवई ने दिल्ली में मताधिकार समिति की बैठक में बताया था कि 1924 में इसकी स्थापना के बाद मि. राजा को एक वर्ष के लिए इसका अध्यक्ष चुना गया था, हालांकि 1926 में मि. आंबेडकर का नाम प्रस्तावित हुआ था, किन्तु अनुमोदन न होने से वह प्रस्ताव गिर गया था। अभी तक सिर्फ इसलिए कि डा. मुंजे ने, मि. राजा के साथ समझौते को अन्तिम रूप देने से पहले, डा. आंबेडकर से बातचीत करने का प्रयास किया था, पर उनकी टिप्पणी बचकानी थी। डा. मुंजे ने वार्ता के लिए मि. राजा को दलित वर्गों का प्रतिनिधि नहीं माना था।

डा. आंबेडकर द्वारा निजी पत्राचार के प्रकाशन का उद्देश्य इससे परे कुछ नहीं है कि वे निजी पत्रों को उजागर करने पर लगाए जाने वाले नैतिक प्रतिबन्धों के प्रति उदासीन हैं। मताधिकार समिति की दिल्ली बैठक में भी उन्होंने एक निजी पत्र को, जो उन्हे लिखा गया था, पढ़ने का प्रयास किया था, परन्तु चिन्तामणी के विरोधके कारण अध्यक्ष ने उन्हे रोक दिया था। अब मुख्य पत्रों को डा. आंबेडकर ने प्रकाशित कर दिया है, जो सिर्फ यह प्रदर्शित करते हैं कि मि. गवई,  राजा-मुंजे पैक्ट को स्वीकार करने से कुछ ही दिन पहले पृथक निर्वाचन के पक्ष में थे। स्वतन्त्र दिमाग वाले लोगों और उन लोगों में, जो विवादों में अपना खुला दिमाग रखने की क्षमता रखते हैं, राजनीति में अपने विचारों को बदलाव लाना  कोई नई बात नहीं है। डा. आंबेडकर स्वयं भी पहले संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में थे, पर अब उनका विचार बदल गया है। अब जब उन्होंने अपने आपको नए विचार के लिए प्रतिबद्ध कर लिया है, तो जब तक वे अपनी पूर्व धारणा पर वापिस आने के लिए स्वतन्त्र नहीं हो जाते हैं, तब तक दूसरों की वैचारिक स्वतन्त्रता से इन्कार नहीं कर सकते। उनको यह सवाल करने का बहुत कम हक है, क्योंकि जैसा कि वे अपने बयान में कहते हैं, ‘इन लोगों की विचार परिवर्तन की वास्तविकताएॅं पूरी हो चुकी हैं। अब दलित वर्गों में संयुक्त निर्वाचन के समर्थन में बहते हुए प्रवाह को रोकने के लिए बहुत देर हो चुकी है और यह निश्चित रूप से डा. आंबेडकर द्वारा प्रयुक्त संदिग्ध तरीकों से नहीं किया जा सकता।

 

98.

डा. आंबेडकर युद्ध की स्थिति में संयुक्त निर्वाचन के समर्थकों को झुकाने के लिए

 मि. गवई को लिखे पत्र का पर्दाफाश

 

(दि बाम्बे क्रानिकल,  7 अप्रैल 1932)़

तथाकथित दलित वर्गों के नेता और भारतीय मताधिकार समिति के सदस्य डा. आंबेडकर ने, जो अपने समुदाय के लिए पृथक निर्वाचन के अकेले समर्थक हैं, हाल ही में राजा-मुंजे समझौते के पीछे अपने और मि. जाधव तथा मि. गवई के बीच त्रिकोणीय निजी पत्राचार प्रकाशित कराया है।

उन्होंने राजा-मुंंजे समझौते का विरोध हुए कहा कि इसे दलित वर्गों का कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देगा। इसके बाद उन्होंने नेता के रूप में मि. राजा को महत्वहीन बताकर खारिज करते हुए इस बात पर बल दिया कि एक कागजी संगठन के साथ किए गए समझौते को दलित वर्ग मूल्य का दस्तावेज नहीं मानते हैं।

किन्तु डा. आंबेडकर द्वारा मि. जी. ए. गवई, एम. एल. सी. को लिखा गया निम्नलिखित पत्र कुछ और ही कहानी बताता है।

पत्र बताता है कि डा. आंबेडकर ने मि. गवई को चुप कराने का प्रयास किया था ओर यह धमकी दी थी कि यदि मि. गवई उनके विचार के समर्थन में नहीं आए, तो परिणामतः हमारे और उनके बीच हमेशा के लिए सम्बन्ध खत्म हो जायेंगे।

 

मि. गवई को पत्र

उस पत्र की प्रतिलिपि निम्नलिखित है, जो डा. आबेडकर ने आॅल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी मि. गवई, एम. एल. सी. को लिखा था-

 

पटना, 13 फरवरी।

मैं आपकी राह लखनऊ में और पटना में भी देख रहा था, पर मुझे आश्चर्य हुआ कि आप इन दोनों स्थानों में से कहीं भी नहीं पहुॅंचे। किन्तु आपका पत्र मिला, जिसे पढ़कर मुझे दुख हुआ कि आपको अपनी बीमारी की वजह से यात्रा रोकनी पड़ी।

मैं आपको अपने माॅंगपत्र की एक प्रति भेज रहा हूॅं, जिसमें मैंने अपने विचारों को स्पष्ट कर दिया है। मैं इसे आपको अवगत कराने के लिए भेज रहा हूॅं। आपको माॅंगपत्र के अन्तिम पैर पर गौर करना होगा, जिसमें कहा गया है कि हमारी समिति भी और आपकी समिति भी साम्प्रदायिक प्रश्न पर चर्चा नहीं कर सकती। प्रधानमन्त्री का पत्र और समिति द्वारा जारी प्रश्नावली इसे स्पष्ट करती है, और  हमारी समिति के अध्यक्ष ने इसी विचार के अनुरूप दिल्ली और लखनऊ दोनों जगह इस प्रश्न पर अपनी व्यवस्था दी है। इसलिए आपको अपनी समिति को यह बताना चाहिए कि वे इस प्रश्न पर चर्चा नहीं कर सकते और यदि वे इसके लिए आप पर जोर डालते हैं, तो आपको उस पर चर्चा करने से इन्कार कर देना चाहिए।

 

विचारों में परिवर्तन

पृथक बनाम संयुक्त निर्वाचन पर चर्चा करने के बजाए आपका दृष्टिकोण सीधे-सीधे यह होना चाहिए कि आपको इस पर चर्चा ही नहीं करनी है, क्योंकि यह समिति की शर्तों उल्लंघन है। मैं जानता हॅूं कि आपकी एसोसिएशन को प्रश्नावली मिल गई है। सिर्फ एक चीज मुझे उल्लेख करनी है। मैं यह जानकर स्तब्ध हूॅं कि मि. राजा ने अपने विचार बदल दिए हैं और अब वह संयुक्त निर्वाचन की हिमायत कर रहे हैं। मुझे आशा है कि आपकी एसोसिएशन हर स्थिति में इस आत्मघाती नीति पर उनका अनुसरण नहीं करेगी। किन्तु यदि वह करती है, तो इसका परिणाम हमारे और  हमारे लोगों के द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई को खत्म कर देगा। इसे मैं हर कीमत पर रोकने का प्रयास करता हूॅं। इसलिए आप इस पर जोर नहीं दें। मुझे इस आश्वासन से प्रसन्नता हुई है कि आप मेरी सलाह और मेरे संज्ञान में लाए बिना कुछ नहीं करेंगे। मैंने मताधिकार समिति के लिए उत्तरों का एक सेट तैयार कर लिया है। जैसे ही वह टाइप होता है, मैं उसकी एक प्रति शीघ्र आपको भेज दूॅंगा।

मैं आपको प्रश्नावली के क्रम में अपने उत्तरों का विवरण आपके उपयोग के लिए भेज रहा हूॅं और साथ ही एक प्रति संशोधित प्रश्नावली की भी भेज रहा हूॅं। आप देखेंगे कि साम्प्रदायिक प्रश्न को पूरी तरह निकाल दिया गया है।

 

99

डा. आंबेडकर का पूना में स्वागत

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 30 अप्रैल 1932)़

(हमारे निजी संवाददाता द्वारा)

पूना, 28 अप्रैल।

‘आल इंडिया एण्टी-अनटचेबिलिटी लीग’ के निमन्त्रण पर, गोलमेज सम्मलेन में दलित वर्गों के प्रतिनिधि और मताधिकार समिति के सदस्य डा. बी. आर. आंबेडकर मई के शुरु में लीग द्वारा आयोजित सम्मान कार्यक्रम में लीग के मुख्यालय पूना पहुॅंचे, जहाॅं उनके कार्यों के लिए उनका अभिनन्दन किया गया।

इसी समय पूना के दलित वर्गों की ओर से भी उनका स्वागत किया गया। इस सम्मान की तैयारी आर. एस. घाटगे की अध्यक्षता में गठित एक स्थानीय समिति ने की थी।

 

 

पिछली कड़ियाँ–

 

9. डॉ.आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया!
8. जब अछूतों ने कहा- हमें आंबेडकर नहीं, गाँधी पर भरोसा!
7. दलित वर्ग का प्रतिनिधि कौन- गाँधी या अांबेडकर?
6. दलित वर्गों के लिए सांविधानिक संरक्षण ज़रूरी-डॉ.अांबेडकर
5. अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ प्रभावी क़ानून ज़रूरी- डॉ.आंबेडकर
4. ईश्वर सवर्ण हिन्दुओं को मेरे दुख को समझने की शक्ति और सद्बुद्धि दे !
3 .डॉ.आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तो भड़का रूढ़िवादी प्रेस !
2. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी
1. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी


कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत, दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए ख्‍यात, कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।



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