Home काॅलम भारतीय राजनीति में लगातार उभर रही सामाजिक दरारों पर कब बहस होगी?

भारतीय राजनीति में लगातार उभर रही सामाजिक दरारों पर कब बहस होगी?

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हमारे देश के संदर्भ में हमेशा यह बात कही जाती है कि भारत विविधताओं का देश है. हमारी राजनीति के बारे में कहा जाता रहा है कि भारतीय राजनीति संक्रमण से गुज़र रही है. ये दोनों बातें सही हैं. दिलचस्प बात यह है कि राजनीति को विविधताओं के कारण ही संक्रमण से गुज़रना पड़ता है क्योंकि वह इन विविधताओं का समुचित संज्ञान लेने से बचती रही है. वर्ष 1967 से लेकर 2014 तक ये विविधताएँ गठबंधनों और चुनावी समीकरणों को बदलती रही हैं, पर उन्हें ठीक से समायोजित करने में राजनीतिक विमर्श और व्यवहार पूरी तरह से सफल नहीं हो सका है. अब ये विविधताएँ सामाजिक और सांस्कृतिक दरारों का रूप ले चुकी हैं और उनके परस्पर टकराव ने राजनीति में भूचाल की स्थिति बना दी है. वर्तमान लोकसभा चुनाव में ये दरारें (फ़ॉल्ट लाइन) स्पष्ट उभरती दिखायी दे रही हैं और जिनके प्रतिकूल असर से बचाने के लिए वादों और जोड़-तोड़ का पुराना तरीक़ा अपनाया जा रहा है. परिणामों पर इनका प्रभाव तो बाद में ही विश्लेषित हो सकता है, पर सामाजिक दरारों की एक सामान्य पड़ताल की जा सकती है.

भीमा-कोरेगाँव, गुजरात के हालिया दलित आंदोलन और भीम आर्मी जैसी परिघटनाएँ उस बेचैनी का इज़हार हैं, जो दलित समुदायों में बढ़ती जा रही है. इस बेचैनी का प्रतिनिधित्व पारंपरिक दलित पार्टियाँ या मुख्य राजनीतिक दल नहीं कर पा रहे हैं. वर्ष 2011 के बाद से दलित उत्पीड़न के मामलों में सज़ा होने की संख्या लगातार घट रही है, जबकि दूसरे समुदायों से टकराव में बढ़ोतरी हो रही है. आज हर राज्य में दो से अधिक दल दलितों के प्रतिनिधि के रूप में दिखते हैं और ऐसे सामाजिक संगठनों की संख्या तो बहुत है. महाराष्ट्र में मराठा और गुजरात में पटेल और ठाकोर, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर जैसे साधन-संपन्न समुदायों ने भी लगातार माँगें उठायी हैं. वे माँगें कितनी सही या ग़लत हैं, यह बहस का विषय है, पर राजनीतिक मैदान में उन्हें जगह देनी पड़ी है.

हालांकि अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुस्लिम तबके, पर हमले करने या उन्हें हाशिए पर रखने की परिपाटी नयी नहीं है, पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में 2014 में आयी सरकार के दौर में उन्हें अलग-थलग करने का सिलसिला बहुत तेज़ी से बाधा है. यह फ़ॉल्ट लाइन भी इस चुनाव में बहुत उभरकर सामने आया है. पिछले चुनाव में सबके विकास की बात करनेवाली भाजपा हिन्दुत्व के मुख्य एजेंडे पर लौट आयी है. कश्मीर, पाकिस्तान, युद्ध और आतंकवाद वास्तव में किन्हीं असली मुद्दों को इंगित करनेवाले शब्द नहीं हैं, बल्कि सांप्रदायिक राजनीति द्वारा एक ख़ास समुदाय को निशाना बनाने के कूट शब्द हैं. इनमें अब नागरिकता का सवाल भी जोड़ा जा रहा है.

सामाजिक भेदभाव के साथ आर्थिक विषमता का सवाल बेहद अहम है. नव-उदारवादी नीतियों के कारण आबादी के कुछ हिस्से के पास धन के जमाव और शेष के शोषण की निर्बाध प्रक्रिया चल रही है. आदिवासियों की रिहायश को संसाधनों की लूट के लिए छीना जाना अब तो समाचारों में भी उल्लिखित नहीं होता है. पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का सबसे अधिक ख़ामियाज़ा ग़रीब और कम आमदनी के लोगों को ही भुगतना पड़ रहा है. इन कारणों से प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता का नुक़सान भी उन्हीं को उठाना पड़ रहा है.

कृषि संकट के समाधान के एक प्रयास के रूप में क़र्ज़ माफ़ी के वादे और दावे पिछले साल के विधानसभा चुनाव से इस लोकसभा चुनाव तक गूँज रहे हैं. मौजूदा लोकसभा के आख़िरी दिनों में आपाधापी में बिना किसी गंभीर सोच-विचार के ग़रीब तबके के लिए नौकरियों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव पारित किया गया था. अगर इन्हें ठीक से लागू किया जाता है, तब भी इन दोनों ही उपायों से बहुत थोड़े लोग लाभान्वित होंगे. लेकिन इन उपायों से सरकारें रोज़गार सृजित करने और किसानी की मुश्किलों को दूर करने के ठोस उपाय करने से बच जाती हैं. इससे जो संकट पैदा हो रहा है, वह सामाजिक और सांस्कृतिक रूपों में बाहर निकल रहा है तथा पूर्ववर्ती दरारें बढ़ती जा रही हैं. सरकारी क्षेत्र की नौकरियां लगातार कम हो रही हैं, पर संगठित समुदायों को लगता है कि आरक्षण से बेरोज़गारी हल हो जायेगी. सो, आरक्षण के लिए माँग उठती है. इन माँगों को तुष्ट करने के लिए सरकारी आदेशों से आरक्षण की घोषणा भी होती रही है, जो अदालतों में ख़ारिज़ हो जाती है.

दर्ज़नों पार्टियों के अलग-अलग गठबंधन विभिन्न समुदायों की आकांक्षाओं के पूरा न हो पाने और दरारों के उभरते जाने के ही नतीज़े हैं. पूर्वोत्तर, केरल और गोवा जैसे छोटे राज्यों में भी कई-कई पार्टियाँ हैं या दबाव समूह हैं. कोई भी पार्टी या संस्था अब अकेले किसी बड़े तबके- सवर्ण, पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी आदि- का अकेला प्रतिनिधि होने का दावा नहीं कर सकती है. ऐसे हर समूह में अनेक समूह हैं और वे अपनी जगह माँग और तलाश रहे हैं. इसका एक उदाहरण गठबंधनों के बड़े होते जाने और सामुदायिक नेताओं के उभरने के रूप में देखा जा सकता है.

हमारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ इन दरारों को पाटने में असफल रही हैं. संसद में सीटों का सीमित होना तथा नौकरशाही और न्यायपालिका के शीर्ष पर प्रतिनिधित्व की कमी ने इस बिखराव को बढ़ाया है. सत्ता ने अपने स्वार्थ के लिए इस स्थिति का न सिर्फ़ फ़ायदा उठाया है, बल्कि उसकी ख़ामियों को नज़रअन्दाज़ भी किया है. भाषा, पहनावा, खान-पान, आस्थाओं  आदि को लेकर भी यही रवैया रहा है. देश के विषम विकास ने पलायन की प्रक्रिया को भी तेज़ किया है. सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव और तनाव का यह एक बड़ा कारण है. क्षेत्रीय पहचान को लेकर आपसी हिंसा की घटनाएँ बहुत अधिक संख्या में घटित हो रही हैं.

अब समय आ गया है कि फ़ॉल्ट लाइन को लेकर व्यापक बहस हो और यह बहस ईमानदारी से हो. छोटे-बड़े समूहों और पहचानों को हर स्तर पर समायोजित करने के प्रयास बहुत ज़रूरी हैं. धरती के फ़ॉल्ट लाइन जब आपस में टकराते हैं, तो उसका नतीज़ा भूकंप और सुनामी के रूप में हमारे सामने आता है. जब देश के सामाजिक और सांस्कृतिक दरारें टकराती हैं, तो विखंडन का ख़तरा पैदा होता है. ज़रूरी नहीं है कि विखंडन हमेशा अलगाव के आग्रह के रूप में सामने आए- कभी वह विलगन भी हो सकता है और कभी विध्वंसक भी.


लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और मीडियाविजिल के स्‍तंभकार हैं

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