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मुक्ति की ओर सहयात्रा : ‘नारी मुक्ति’ के बिना पुरुष भी मुक्त कहाँ !

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अंतर्राष्ट्रीयमहिला दिवस की बधाई

 

प्रो. लाल बहादुर वर्मा

 

8 मार्च को हर साल हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं- करीब-करीब एक रुटीन की तरह. “हम” से हमारा मतलब है मुख्यत: महिलायें, महिलाओं में भी मुख्यत: शहरी और शिक्षित महिलायें. ( कुछ वर्ष पहले जौनपुर के एक गाँव में महिला दिवस पर उत्प्ला शुक्ला ने गाँव की महिलाओं की तीन टांग की दौड़ करवायी थी तो आशा की किरण फूटी थी.) यह सच है कि पिछले सौ सालों में नारी मुक्ति का दायरा बढ़ा है. जब भी अवसर मिला है नारियों ने अपनी क्षमताओं और संभावनाओं का परिचय दिया है. पर मूल बात यह है कि क्या महिलाओं का अपने और पुरुषों के बारे में और पुरुषों का अपने और महिलाओं के बारे में दृष्टिकोण वास्तव में बदला है? सार्त्र की याद आती है जिन्होंने निश्चित ही किसी दार्शनिक और उदास क्षणों में कहा होगा “ luscachang, plus ca change, plus cela meme chose – चीजें जितना बदलती हैं उतना ही वही रह जाती हैं.

समाज की मुख्य धुरी है नारी-पुरुष सम्बन्ध जो घर से बाहर तक विविध रूपों में अभिव्यक्त होते हैं. उन्हीं में वैयक्तिकता, सामाजिकता, संस्कृति, यहाँ तक कि राजनीति भी ढेरों निहितार्थों के साथ अभिव्यक्त होते हैं. हमारा मानना है कि किसी “दिवस” पर उस दिन मनाये जा रहे विषय की मूल बात पर अवश्य नजर डाली जानी चाहिये. जैसे स्वतंत्रता दिवस पर इस बात पर कि हमारी स्वतंत्रता की स्थिति क्या है, मजदूर दिवस पर मजदूर की और बाल दिवस पर बच्चों की स्थिति पर गौर करना अपेक्षित होना चाहिए आदि.

यहाँ हम नारी दिवस पर ही ध्यान केन्द्रित करें तो लगेगा कि आंकड़ों में साल-दर-साल नारियों की स्थिति बेहतर होती जा रही है. पर आपको क्या यह नहीं लगता कि वास्तव में नारी की पीड़ा और गहरी होती जा रही है. नारी पहले भी उत्पीडित अपमानित होती थी – शोषण तो आम बात थी. आज की स्थिति को एक उदाहरण से समझें: पहले नारी प्राय: अनुपस्थित या परदे में दिखती थी, आज वह हर जगह उपस्थित है. वह मतदाता है, चालक है, संचालक है, विद्यार्थी है, शिक्षक है, दार्शनिक है, विचारक है, उद्यमी है, साहित्यकर्मी है, यहाँ तक कि अर्थशास्त्री और बैंकर भी है, धर्मगुरु भी है. यह नितांत सकारात्मक और उत्साहवर्धक है. पर ज़रा गौर करिए उसकी उपस्थिति का सबसे बड़ा पक्ष क्या है- वह सबसे अधिक आज भी “सेक्स सिम्बल” की तरह उपस्थित है. आज की सबसे निर्याणक सच्चाई है बाज़ार और बाज़ार की सबसे बड़ी सच्चाई है किसी भी सामान को बेचने में सबसे अधिक नारी देह का इस्तेमाल. विडंबना यह है कि इसका विरोध अधिकांशत: नारी भी नहीं करती. मैंने विश्विद्यालय के महिला छात्रावास की प्रबुद्ध छात्राओं से सुना है कि वहां सपनों पर विश्वसुन्दारियों का राज होता है. उनका राज तो पुरुष छात्रावास के सपनों पर भी होता ही है. पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही छात्राएं यह नहीं समझ सकती कि बढ़ती जा रही सौन्दर्य प्रतियोगिताएं केवल बाज़ार के प्रपंच हैं? हम यह जानते हैं कि मीडिया और सत्ता पर हावी बाज़ार सामान्य व्यक्ति को विवेकशील बनने नहीं दे रहा. पर अंतत: इस चक्रव्यूह को तोड़ना तो पडेगा ही.

इस सम्बन्ध में मुख्य समस्या मुक्ति की धारणा की सही समझ का अभाव है और समस्या के समाधान के लिए एक समग्र और सर्वव्यापी उपाय का अभाव है. मुक्ति निर्बंध नहीं होती. दूसरे, मुक्ति अविभाज्य होती है. जब तक समाज में एक भी व्यक्ति मजबूर और उत्पीडित है पूरा समाज पूरी तरह मुक्त नहीं कहा जा सकता. शासक समुदाय ही व्यक्तियों और समुदायों के अलग-अलग मुक्ति की बात कर सकता है. इस सन्दर्भ में दो टूक बात यही है कि जब तक नारी समुदाय मुक्त नहीं है तब तक पुरुष समुदाय और उसका कोई हिस्सा कभी पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता. विस्तार में गए बिना यहाँ यही कहा जा सकता है कि नारियों और पुरुषों को अपनी मुक्ति के लिए साथ-साथ प्रयास करना चाहिए. यह एक लम्बी संघर्ष-यात्रा है. इसमें सत्ता, व्यवस्था, मूल्य-मान्यताएं, धर्म और संस्कार सभी एक -एक कर या साथ-साथ आड़े आते रहेंगे. पर आशा की किरण यह है कि इसमें दरारें पड़ती जा रही हैं. उन्हें लगातार बढाने की ज़रूरत है. इस संघर्ष-यात्रा का पहला किन्तु निर्याणक मोर्चा घर-घर में खुलना चाहिए. जहां संघर्ष नहीं सह्भागिता के साथ पारिवारिक जनतंत्र कायम किया जा सके. जब तक जनतंत्र सभी मानवीय सम्बंधों में चरितार्थ और लागू नहीं होता कहीं भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकता.
इस चेतना को कार्यान्वित करने के लिए किसी भी नारीवादी कार्यक्रम केवल नारियों का दायित्व समझने की आदत को छोड़ना पडेगा. उदाहरण के लिए नारी दिवस के कार्यक्रम केवल नारियों द्वारा नहीं आयोजित होने चाहिए. पुरुषों को उसमे मेहमानों की तरह नहीं आयोजकों की तरह इस तरह शामिल होना चाहिए ताकि यह ना लगे कि कार्यक्रम नारियों द्वारा आयोजित है.

 



प्रतिष्ठित इतिहासकार प्रो.लालबहादुर वर्मा ने देश -विदेश में शिक्षण किया है। ‘इतिहासबोध’ पत्रिका के संपादक-प्रकाशक होने के साथ सामाजिक-राजनीतिक विषयों के चर्चित टिप्‍पणीकार हैं। साथ ही मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी ।