Home काॅलम रोज़ ब रोज़: इंसान परेशान इधर भी हैं, उधर भी!

रोज़ ब रोज़: इंसान परेशान इधर भी हैं, उधर भी!

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कई साल पहले दुनिया-ए-फ़ानी को विदा कह गए एक व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की महान पुलिस ने गिरफ़्तारी का नोटिस भेजा सीएए- एनआरसी के खिलाफ़ आंदोलन मे भागीदारी के लिए तो उधर शामली में भजन गायक अजय पाठक की सपरिवार हत्या उन्हीं के शिष्य ने कर दी। एक पुलिस अधिकारी पाकिस्तान चले जाओ का आदेश देते नज़र आए तो कानपुर की मशहूर आई.आई.टी के छात्र भी जेएनयू, दिल्ली विवि, जामिया, अलीगढ़, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी वगैरह-वगैरह के छात्रों के बाद एंटी नेशनल की श्रेणी मे शामिल हुए। बिहार में अब बांस के लट्ठ और मोबाइल फोन भी खतरनाक हथियारों मे शामिल हुए और तीन घरेलू महिलाएं जेल गईं। तो ज़ाहिर है कि नया साल जेल के उन अँधेरे कोनों में जब बनारस, लखनऊ, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में आवाज़ उठाने के कसूरवार साथियों के क़रीब गया होगा तो फ़ैज़ की उदास नज़्म – ज़िंदां की एक शाम – बिखर गई होगी। 

फ़ैज़ की याद करता हूँ तो उनके भतीजे सलमान तासीर की याद आती है। मौसा होते थे उनके फ़ैज़। बाप मोहम्मद दीन तासीर कश्मीर मे प्रताप कॉलेज के प्रिंसिपल रहे। फ़ैज़ और एलिस की शादी उनके यहाँ ही हुई निकाहनामा लिखा था शेख अब्दुल्ला ने और जगह दी थी महाराज हरि सिंह ने। सलमान जब जन्मे 1944 में तो तासीर साहब शिमले आ गए थे। विभाजन के बाद पाकिस्तान चुना। बाप जल्द ही गुज़र गए तो पले फ़ैज़ साहब के साये में। रौशनख्याल सलमान, भुट्टो की पार्टी से जुड़े। मिनिस्टर रहे और फिर पंजाब जैसे सूबे के राज्यपाल। आप उन्हें तवलीन सिंह के पार्टनर और आतिश तासीर के पिता की तरह भी याद कर सकते हैं। कट्टरपंथ की लगातार मुखालिफ़त करने वाले तासीर अहमदियाओं के पक्ष मे बोलने के कारण पहले ही निशाने पर थे लेकिन जब उन्होंने एक टीवी शो पर ईशनिंदा क़ानून की आलोचना करते हुए एक ग़रीब ईसाई महिला आशिया बीबी के पक्ष मे आवाज़ उठाई तो 4 जनवरी, 2011 को इस्लामाबाद के अपने घर के पास कोहसर बाज़ार में, अपने एक मित्र के साथ दोपहर का भोजन करके लौटते समय, उन्हें उनके ही एक अंगरक्षक मलिक मुमताज़ क़ादरी ने मार डाला। पंजाब के रहने वाले क़ादरी ने उनकी हत्या के बाद स्वीकार किया कि इसके पीछे तासीर द्वारा ईशनिंदा क़ानून का विरोध किया जाना ही था। डॉन में छपी एक ख़बर के अनुसार क़ादरी के संबंध बरेलवी आंदोलन से जुड़े एक धार्मिक संगठन ‘दावत-ए-इस्लामी’ से थे। क़ादरी के पक्ष में पाकिस्तान के कट्टरपंथी धड़ों ने जम के शोर मचाया और तासीर को बदनाम करने की हरचंद कोशिश हुई। यहाँ तक कि जब वहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी दी क़ादरी को तो उसका जनाज़ा हीरो की तरह निकाला गया जबकि तासीर साहब की अंतिम प्रार्थना पढ़ने से कई मौलवियों ने मना कर दिया था।

ओरहान पामुक के मशहूर उपन्यास ‘स्नो’ में एक प्रसंग है। देश में सर उठा रहे दक्षिणपंथ के दौर में एक छोटे से कस्बे में ‘हिजाब पहनने वाली लड़कियों को कालेज में प्रतिबंधित करने’ वाले सरकारी आदेश का सख़्ती से पालन करने वाले कालेज के निदेशक की हत्या के इरादे से आया एक धर्मांध युवा उनसे पूछता है – ‘क्या संविधान के बनाये नियम ख़ुदा के बनाये नियम से ऊपर हैं?’ निदेशक के तमाम तर्कों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता और वह उसकी हत्या कर देता है। जिस माहौल में हम जी रहे हैं इन दिनों, इस प्रसंग का बार-बार याद आना स्वाभाविक है। एक भीड़ है जिसका एजेंडा रोज़ एक संगठन का आई.टी सेल तय करता है। वही बताता है कि क्या देशभक्ति है और क्या देशद्रोह। वह बताता है कि पढ़ने-लिखने वाले लोग गद्दार हैं, इतिहास की किताबें बेकार और संविधान का कोई मतलब नहीं। वही बताता है कि उत्तर प्रदेश मे ‘पाकिस्तान जाओ’ कहने वाला सच्चा पुलिसवाला है और संघ कार्यकर्ताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाला पुलिस अफसर भ्रष्ट। वह यह भी बताता है कि  रोज़गार, खेती-किसानी, मंहगाई ये सअब बेकार के मुद्दे हैं और हिन्दू-मुस्लिम असली मुद्दा। वह बताता है कि कि रहना हिंदुस्तान मे है लेकिन दिन-रात चिंता पाकिस्तान की करनी है। वह बलात्कार और माँ-बहन की गाली को पवित्रता बख्शता है और पढ़ने-लिखने को बेकार की कवायद बताता है। वह आपको गड्ढे मे धकेलता है जहाँ आप यह देख ही नहीं पाते कि आपकी क़ीमत पर किनका खजाना भरा जा रहा है। आप देशभक्ति समझकर जो कर रहे हैं उसके शोर मे चुपचाप देश बेचा जा रहा है। आप पवित्र समझकर जो कुछ कर रहे हैं उसकी आड़ मे सारे काले खेल खेले जा रहे हैं।

निदा फ़ाज़ली गए थे नब्बे के दशक मे पाकिस्तान। लौटकर एक ग़ज़ल कही जिसका एक शेर है – हिन्दू भी मज़े मे हैं, मुसलमाँ मज़े मे/ इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी। इसी ग़ज़ल का एक और शेर है – खूंखार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग है/ इंसान में हैवान यहाँ भी वहाँ भी। तो हालात बदले नहीं बदतर हुए हैं। एक तरफ़ नहीं, दोनों तरफ़। ज़िद है कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या/ला इलाह इल्ल अल्लाह।’ यह नारा लगा था कश्मीर मे। नतीजा वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दू और प्रगतिशील मुसलमान भी खामोश कर दिए गए। इंसानी इतिहास के कुछ सबसे क्रूरतम विस्थापनों मे से एक हुआ पहले, तो फिर क्रूरतम दमन। दोनों ने झेला। यहाँ लगेगा तो क्या होगा? पहले ही एक कोने मे समेट दिए गए अल्पसंख्यक और अकेले कर दिए जाएँगे। हम जैसों को तो खैर अकेला होना ही है हर हाल मे। निज़ाम ए मुस्तफा बने या हिन्दू राष्ट्र। प्रगतिशील तो पहला निशाना होंगे। सारी दुनिया ने देखा है। तो जोड़ने की जगह तोड़ने की ये बातें आखिर मे किसके काम आएंगी? उन्हीं के जिनसे लड़ने के दावे हैं। खतरा मुसलमान पर मानेंगे तो मुश्किल होगी खतरा संविधान पर मानेंगे तो लड़ाई बड़ी होगी। संविधान की छतरी तले सब सुरक्षित होंगे, वह उड़ी तो कोई नहीं बचेगा। बात इतनी सी है, जटिल दिखती हुई सरल, सरल दिखती हुई उलझी। समझ पाए तो इतिहास रचा ही जाएगा, न समझे तो बर्बादी सबके सामने बहुत साफ़ है ही। 

यूँ ही उलझती रही है ज़ुल्म से खल्क .. बकौल फ़ैज़ – ‘लेकिन अब ज़ुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं/ इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं’ शर्त  इतनी सी है मगर कि इतिहास के सबक याद रहें, मिलकर लड़ें। कुछ दोस्त आजाद हुए हैं जेल से कुछ बाक़ी हैं। एक जंग जारी है और तमाम बाकी हैं। नया साल आया है और बकौल वीरेन डँगवाल – आएंगे उजले दिन ज़रूर।    




 


(साप्ताहिक स्तम्भ रोज़-ब-रोज़ के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय हिंदी के चर्चित कवि और लेखक हैं। )

 



 

 

1 COMMENT

  1. अरण्य रंजन

    तथ्यात्मक और तर्कसंगत आलेख पढ़कर कई संशय साफ हुए हैं। इस दौर में जब मीडिया पर विश्वास करना स्वयम के साथ विश्वासघात करने जैसा है। आप लोग मशाल जलाये हुए हम जैसे सुदूर क्षेत्रों में रह रहे लोगों के लिए दृष्टि बन रहे हैं। अशोक भाई जी हमेशा ही तथ्यों और तर्कों की बनाई से बेहतरीन रचना करते हैं जो दिमाग के खाचों को तोडकर नया आकार देते हैं।

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