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नाला गैस : मोदी ने गोबर को हलुआ कहा, मीडिया ने चखकर पुष्टि की!

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विष्णु राजगढ़िया

 

देश में बुद्धिहीनता का भयावह दौर चल रहा है।  देश का प्रधानमंत्री अगर गोबर को हलुआ कह दे, तो वाह-वाही होने लगती है। कुछ मीडिया वाले फौरन गोबर को चखकर बता देंगे कि यह वाकई हलुआ है।

10 अगस्त को विश्व जैव-इंधन दिवस पर दिल्ली में विशेषज्ञों के बीच आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने अजीब किस्से सुनाए। कहा- एक शहर में नाले के पास एक व्यक्ति चाय बेचता था। उसके मन में विचार आया कि गंदे नाले से निकली गैस का इस्तेमाल करे। उसने एक बर्तन में छेद करके पाइप लगा दिया। अब गटर से जो गैस निकलती थी उससे वह चाय बनाने लगा।

इस पर कार्यक्रम में मौजूद बायोफ्यूल विशेषज्ञों ने जमकर तालियां बजाई। उत्साहित होकर मोदी ने दूसरा किस्सा सुनाया- “गुजरात में एक आदमी ट्रैक्टर की ट्यूब को स्कूटर से बांधकर ले जा रहा था। हवा से भरा ट्यूब काफी बड़ा था। वह रसोई के कचरे और मवेशियों के गोबर से बायोगैस प्लांट में गैस बनाता था। उस गैस को ट्यूब में भरकर खेत ले जाता और पानी का पंप चलाता था।

बायोफ्यूल विशेषज्ञों ने इस पर भी तालियां बजाई। ऐसा लगा मानो स्वर्ग से देवतागण अब पुष्पवर्षा करेंगे।

जाहिर है कि दोनों किस्से चंडूखाने की गप थे। बायोफ्यूल का वैज्ञानिक तरीके से काफी उपयोग हो रहा है। लेकिन मोदी जी ने जिस तरह बताया, वैसा असंभव है।

इस पर मीडिया को सच बताना चाहिए। लेकिन गोदी मीडिया के जमाने में गोबर को हलवा साबित करने का दायित्व मीडिया पर है।

आज तक के वेब पोर्टल ने रायपुर निवासी श्याम राव शिर्के की स्टोरी लगाई- “यह है वो शख्स जो नाले से जलाता है चूल्हा”.

स्टोरी में बार-बार दावा किया गया कि प्रधानमंत्री ने इसी व्यक्ति का किस्सा सुनाया है। जबकि मोदी ने तो चाय वाले की कहानी सुनाई थी। रायपुर का यह आदमी चाय वाला नहीं बल्कि साधारण मैकेनिक है।

जागरण के वेबपोर्टल ने भी रायपुर के उसी श्याम राव को मोदी का कथानायक बताया। इसमें भी उसने जो किस्सा सुनाया, उसका मोदी के किस्से से कोई संबंध नहीं। उसने चाय बनाने की कोई बात नहीं कही। बताया कि उसने किसी बर्तन नहीं बल्कि ड्रम में ‘पानी के बुलबुले’ इकट्ठा करने की बात कही। इसका उपयोग किसी घर में चार-पांच माह तक खाना बनाने के लिए किया।

अगर वाकई श्याम राव को इसमें सफलता मिली, तो उसने इसे बंद क्यों कर दिया, इस पर गोदी मीडिया चुप है। जागरण वेब पोर्टल के अनुसार छत्तीसगढ़ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने श्याम राव को प्रोजेक्ट आगे बढ़ाने के लिए कुछ राशि दी। उसके प्रोजेक्ट के पेपर को भी उच्च अधिकारियों के पास भेजा गया। लेकिन कोई प्रगति नहीं होने से निराश होकर दो साल से श्याम राव इस प्रोजेक्ट को भूल चुका था। यहाँ तक कि उसके उपकरणों को नगर निगम वालों ने कूड़ा बताकर फेंक दिया।

अब मोदी के ऊंटपटांग किस्से से जुड़ने के बाद श्याम राव में नया उत्साह आ गया है। संभव है, उन्हें अपना प्रयोग करने के लिए कोई आर्थिक सहायता भी मिल जाए। लेकिन असल सवाल तो यह है कि मोदी जी ने जिस मॉडल की बात कही, उसमें सिर्फ एक बर्तन और एक पाइप चाहिए। ऐसा करके वह क्यों नहीं बड़ी संख्या में लोगों को आसान और मुफ्त ईंधन दिलाने का व्यवसाय कर लेता। भारत सरकार क्यों नहीं उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देने के बदले एक बर्तन और पाइप दे देती? गंदे नालों की कोई कमी तो है नहीं।

दरअसल यह बात समझ रहे हैं कि मोदी जी के किस्से में कोई दम नहीं। लेकिन नपुंसकता का शिकार वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी समुदाय खामोश बैठा है, अथवा दांत निपोर रहा है। चापलूसी में अवसर तलाशता मीडिया ऐसी बुद्धिहीनता को वैधता दिलाने के लिये रायपुर के किसी श्याम राव को खोज निकालता है। भले ही उसका मोदी के किस्से से दूर का भी वास्ता न हो। मोदी ने जब गोबर को हलुआ कह दिया, तो कह दिया। मीडिया उसे चखकर चटखारे लेगा और हलुआ के स्वाद की पुष्टि करेगा।

देश में वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत तलाशने चाहिए। उन पर देशज प्रयोगों को बढ़ावा मिलना चाहिए। किसी चाय वाले ने वाकई कोई प्रयोग किया हो, तो उसे भी सामने लाना चाहिए। लेकिन ऐसी बुद्धिहीनता वाली बातों से तो अवैज्ञानिकता का ही प्रसार होगा। इससे वास्तविक नवाचार को नुकसान होगा। आत्ममुग्धता का शिकार भारतीय जनमानस मानसिक पंगु बना रहेगा।

प्रसंगवश, एक बात समझना जरूरी है। क्या वाकई मोदी इतने भोले हैं कि उन्हें इस किस्से की असलियत नहीं मालूम होगी? वह अच्छी तरह जानते हैं कि एक अवैज्ञानिक और अतार्किक बात बोल रहे हैं। लेकिन अभी देश में ऐसा ही बुद्धिहीनता का माहौल बनाना है जिसमें बुद्धिजीवियों को गोली मार देने की बात सहज तौर पर कही जा सके। सचेतन रूप से बुद्धिहीनता का यह प्रसार ज्यादा खतरनाक है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।