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चुनाव चर्चा : मीडिया की बासी कढ़ी में उबाल और 1999 का ‘अटल’ इलेक्शन !

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चन्द्र प्रकाश झा

भारत की 17वीं लोकसभा के चुनाव सांविधिक तौर पर अगले वर्ष मई माह से पहले ही कराए जाने हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजदीकी हल्के में कुछ दबी-दबी सी चर्चा है कि लोकसभा चुनाव, 2018 में ही मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक जैसे राज्यों की विधान सभा के निर्धारित चुनाव के समय ही कराए  जा सकते हैं. साथ ही, उन राज्यों की विधानसभा के चुनाव भी इसी के साथ कराए जा सकते हैं जिनका मौजूदा कार्यकाल अगले बरस खत्म होने वाला है.

इस चर्चा को खुद मोदी जी ने भारत के 69 वें  गणतंत्र दिवस के ऐन पहले “एक राष्ट्र एक चुनाव”  का नया पैंतरा अपना कर बल दिया तो चुनाव की तैयारी को लेकर मीडिया में खबरें आने लगीं . इस चर्चा के मद्देनजर एक समाचार वेबसाइट, ‘स्क्रॉल’ ने हाल में खबर दी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी जी के समर्थन में शामिल ‘थिंक टैंक’ में से एक के कर्ताधर्ता, राजेश जैन  ने खुल कर कह दिया कि नई लोकसभा और उपरोक्त तकरीबन आठ राज्यों की विधान सभाओं के भी चुनाव एकसाथ जल्द से जल्द कराना मुफ़ीद रहेगा।

मोदी जी के खास माने जाने वाले, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा वर्ष 2018-19 के लिए संसद में गत एक फरवरी को पेश बजट को आम तौर पर चुनावी बजट कहा गया है. जाहिर-सी बात है कि भारत के संविधान के तहत चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने का एकमेव अधिकार निर्वाचन आयोग को  है। मीडिया, चुनावी खबरें और  चुनाव-पूर्व -सर्वेक्षण से लेकर एग्जिट पोल तक की खबरें क्यों और कैसे -कैसे देता रहा है और आगे भी देगा, इस पर गंभीर नजर की दरकार है। बहरहाल, एक किस्सा कुछ पुराना।

बारहवीं लोकसभा में 21 मार्च 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट के अंतर से विश्वास-मत प्रस्ताव हार गई. इसके कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रपति ने विधिवेत्ताओं के परामर्श से खूब विचार कर कि ऐसे में कोई स्थिर वैकल्पिक सरकार नहीं बन सकती है, निर्वाचन अायोग को 13 वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव कराने के अादेश दे दिए.

चुनाव की तैयारियां तभी से शुरू हो गई थी. प्रारंभ में ऐसा लगा कि चुनाव जल्दी हो जाएंगे. सत्तारूढ़ रष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व करने वाली भारतीय जनता पार्टी की पुरजोर मांग थी कि चुनाव मई-जून तक संपन्न करा लिए जाएं.

समाचार माध्यमों और विशेषकर संवाद समितियों ने चुनावी खबरों के लिए अपनी कमर कसनी शुरू कर दी. अनेक भाषाई समाचारपत्रों में विभिन्न लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के भूगोल और भारत की आज़ादी के बाद के चुनावी इतिहास की सांख्यकी-आधारित खबरें छपनी भी लगीं. बहुतेरे संवाददाताओं के बीच यह अाम धारणा थी कि ‘अबकी बार अटल सरकार’ के कायम भाजपा के नारे के साथ ही कदमताल कर लिया जाए तो ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी क्योंकि 1998 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान संकलित समाचार, सर्वेक्षण और अांकड़े बहुत उपयोगी होंगे. बस उनमें थोड़ी और बातें, खबरें जोड़ कर काम चल जाएगा.

मै तब लखनऊ में पदस्थापित था और निजी कारणों से कुछ दिनों के लिए हैदराबाद गया था. मेरी न्यूज़ एजेसी के वहां के कार्यालय में एक दिन एक प्रमुख समाचारपत्र के प्रतिनिधि कम्प्यूटर में सुरक्षित पिछले चुनावी समाचार और अांकड़ों को मांगने पहुंचे. संयोग से उन्हें वह सब कुछ कम्प्यूटर फ्लापियों में मिल गया जो वह मांगने अाये थे. लगा कि सूचना प्रोद्योगिकी ने हमारा काम कितना अासान बना दिया है.

मेरे लखनऊ लौटते -लौटते निर्वाचन अायोग ने घोषणा कर दी थी कि चुनाव सितंबर-अक्तूबर में होंगे. सबने सोचा काफी वक़्त मिल गया है. चुनावी खबरों की और तैयारी में मदद मिलेगी. मैंने उत्तर प्रदेश के सभी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में अांकड़ें और अन्य सूचनाएं एकत्रित कर उन्हें भावी उपयोग के लिए कम्प्यूटर में भरना शुरू कर दिया. मुख्य संपादक जी का निर्देश था कि राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से अधिकृत आंकड़ों के दस्तावेज की प्रति हासिल कर लूं क्योंकि उन्हें इंडिया टुडे द्वारा सिफोलोजिस्ट डॉक्टर प्रणव रॉय और अन्य द्वारा संपादित ( तब 500 रुपये लागत की भारी-भरकम चुनावी अंग्रेजी पुस्तक) ‘इंडिया डिसाइड्स’ की प्रामाणिकता में तनिक संदेह था और निर्वाचन आयोग के वेबसाइट पर भी सारे  आवश्यक आंकड़ें तब तक सहज उपलब्ध नहीं थे .

मुख्य संपादक जी को पता था कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी नूर मोहम्मद से मेरी अकादमिक सोहबत थी। वो पीएचडी का अर्से से अधूरा अपना शोध पूरा करना चाहते थे। वह इसी लालसा से 1996 में गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू होने के पहले, विशेष आग्रह कर एक अतिव्यस्त विभाग से यह सोच निर्वाचन विभाग में तबादला करा के आए थे कि इस विभाग में कोई ज्यादा कामकाज तो होता नहीं, सो उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में अपनी बढ़िया नौकरी बरकरार रखते हुए पीएचडी का शोध पूरा करने में वक़्त की ख़ास किल्लत नहीं होगी. उनका शोध पूरा हुआ या नहीं, इसकी ठोस जानकारी नहीं है पर उन्हें इस विभाग में शायद ही ज्यादा वक़्त मिला होगा क्योंकि एक-के-बाद -एक चुनाव का सिलसिला शुरू हो गया। बाद में राज्य से केंद्र की सेवा में प्रतिनियुक्ति पर निर्वाचन आयोग का उप-आयुक्त बन उन्हें नई दिल्ली जाना पड़ गया.

बहरहाल, किस्सा नई दिल्ली का नहीं लखनऊ का और वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया के कामकाज का है जिसे अपनी बची-खुची स्मरण शक्ति के सहारे  यथासंभव तथ्यपरक प्रथम पुरुष में लिपिबद्ध करने की कोशिश करते हुए मुझे यह स्वीकार करना ही चाहिए कि मैंने अपने सम्पादक को संतुष्ट रखने के  लिए  उत्तर प्रदेश निर्वाचन  विभाग कार्यालय में चुनावी आंकड़ों के दस्तावेज की तब उपलब्ध एकमात्र फ़ाइल को फोटोकॉपी कराने के लिए एक बाबू से जिस गुपचुप तरीके से हासिल की, वह कत्तई नैतिक और उचित नहीं था. युद्ध और मोहब्बत में सब कुछ जायज भले मान लें हम, चुनाव बहुत पवित्र प्रक्रिया है और इसमें कुछ भी नाजायज नहीं किया जाना चाहिए।

मै मूलतः हिंदी में कार्य करता रहा हूँ. लेकिन उस  बार के चुनाव ने मुझे ‘ द्विभाषी ‘ पत्रकार बना दिया. कारण यह था कि कम्प्यूटर पर हिंदी के बजाय अंग्रेजी में काम करना अासान लगा. तब यूनीकोड नहीं था. टाइपिंग से लेकर सॉफ्टवेयर तक सभी चीजें अंग्रेजी के ज्यादा अनुकूल थी. इंटरनेट पर निर्वाचन अायोग की वेबसाइट से लेकर अन्य चुनावी वेबसाइटों पर उपलब्ध ज्यादातर जानकारी अंग्रेजी में ही थी. इन सबको डाउनलोड कर मैं पहले कट -कॉपी -पेस्ट  कर आंकड़े जुटा लेता था. फिर उन आंकड़ों के उपयोग से अपनी रिपोर्ट तैयार कर लेता था .फिर खुद ही कागज पर कलम से लिख उनका हिंदी रूपांतरण भी कर लेता था। इसे अपनी लागत से कुछ ही अधिक में थोक खबरें बेचनी वाली हमारी कंपनी का टेलीप्रिंटर ऑपरेटर सहयोगी टाइप करके एक खास तरह के छिद्रदार कागजी टेप में भर कर  इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिगनल्स के जरिये ,सरकार के डाक-तार विभाग से लीज पर लिए टेलीप्रिंटर लाइन से सैंकड़ों अखबारों और अन्य ग्राहकों को संप्रेषित कर देता था.

हुआ यूं कि 1998 में ही कारगिल प्रकरण के कारण लोक सभा का चुनाव द्रुत ताल से विलंबित ताल मैं आ गया, यानि चुनाव कार्यक्रम में देरी हो गई और चुनाव की खबरें समाचारपत्रों  को देने को में मेरी सारी तैयारियां धरीं रह गईं.  लेकिन चुनाव कार्यक्रमों की निर्वाचन अायोग द्वारा घोषणा किए जाने के साथ ही चुनाव की खबरों की रेल, फिर पटरी पर अा गई. कम्प्यूटर में कुछ माह पहले भरे हमारे चुनावी आंकड़े और समाचार काम अाने लगे.

एक रोचक किस्सा यूं रहा. 1996 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट से प्रत्याशी एवं भाजपा नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में मैने एक प्रोफाइल तैयार किया था. वह 1998 में भी काम अाया था. 1999 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब वह पहली बार लखनऊ अाये तो उसी पुराने प्रोफाइल में तनिक परिवर्तन कर और ऊर्दू का एक शेर जोड़  कर मेरा काम चल गया। अलबत्ता इस बार मैने उस प्रोफाइल का अंग्रेजी तर्जुमा भी कर दिया। बहरहाल , वो शेर जिसका इस्तेमाल कर भाजपा वालों ने पोस्टर भी निकाले,वह ये था –

” अास्मा में ताब क्या हमसे छुड़ाए लखनऊ / लखनऊ हम पर फिदा हम फ़िदा-ए-लखनऊ “.

प्रोफाइल के अंग्रेजी स्वरूप में ये अंश रोमन में लिख उसका भावानुवाद कर दिया था. प्रोफाइल के दिल्ली में अनुदित ऊर्दू स्वरूप में इस अंश को शुद्ध रूप से लिख चार चांद लगा दिए गए.अगली सुबह संपादक जी ने दिल्ली घर  फोन कर कहा- ” वाह क्या बात है.पीएम की तुम्हारी बनाई प्रोफाइल देशभर के लगभग सभी अखबारों में झमाझम छपी है.वेल डन. वी अार प्राउड अॉफ यू “. उन्हें क्या पता था कि मै बासी कढ़ी में उबाल ले अाया था  !!

( मीडिया विजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार, चंद्र प्रकाश झा ने तैयार की है जिन्हे मीडिया हल्कों में सिर्फ सीपी कहते हैं।  सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें , रिपोर्ट , विश्लेषण  , फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है। सीपी की इस श्रृंखला की कड़ियाँ हम चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव बाद भी पेश करते रहेंगे।)


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