Home काॅलम आज के हिंदी अखबारों के संपादकीय: 08 मार्च, 2018

आज के हिंदी अखबारों के संपादकीय: 08 मार्च, 2018

SHARE
नवभारत टाइम्स

नफरत की मूरतें
वैचारिक नेताओं की मूर्तियां तोड़ने का सिलसिला पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन घटनाओं पर नाराजगी व्यक्त की है। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवायजरी जारी करते हुए कहा है कि ऐसी किसी भी घटना पर कड़ी कार्रवाई की जाए। त्रिपुरा में बीजेपी की जीत के बाद वहां रूसी क्रांति के नायक लेनिन की दो मूर्तियां बुलडोजर लगाकर ढहा दी गईं। मंगलवार रात तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद-विरोधी नेता पेरियार की और कोलकाता में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया। फिर बुधवार की सुबह मेरठ में लगी बीआर आंबेडकर की एक मूर्ति क्षतिग्रस्त मिली। चुनाव के बाद विजयी दलों द्वारा अपनी जीत के अति उत्साह में हिंसा करने की घटनाएं इधर काफी बढ़ गई हैं, लेकिन त्रिपुरा की जीत के बाद बीजेपी से जुड़े लोग अभी जो कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। इसे तात्कालिक उन्माद भर मानकर किनारे नहीं किया जा सकता। सत्तारूढ़ पार्टी का अतीत ऐसा नहीं रहा है, लेकिन अभी तो वह अपनी हर जीत के बाद कुछ ऐसा दिखाती है, जैसे वह अपने विचारों और नीतियों को ताकत के बल पर ही लागू कराएगी और जो भी उससे असहमत होगा, उसे सबक सिखा दिया जाएगा। ऐसा सिर्फ निचले कार्यकर्ताओं के बर्ताव से जाहिर नहीं होता। पार्टी के बड़े नेता और सहयोगी संगठनों के शीर्ष लोग भी उनके सुर में सुर मिलाते हैं। पार्टी आलाकमान ऐसे बयानों पर कभी-कभार नाराजगी जाहिर कर देता है, लेकिन कोई गंभीर कदम नहीं उठाता। मूर्तिध्वंस का मामला ही लें तो शुरू में लगा कि यह किसी स्थानीय कार्यकर्ता की खुराफात हो सकती है। लेकिन बीजेपी के कई नेताओं ने घुमा-फिराकर इसे सही ठहराया। वे यह कहकर इस कृत्य को जायज ठहरा रहे हैं कि त्रिपुरावासी वामपंथी शासन से घृणा करते रहे हैं, मूर्ति गिराना इसी की अभिव्यक्ति है। लोकतंत्र में असहमति जताने का सबसे अच्छा तरीका वोटिंग है। त्रिपुरा की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। इसके बाद मूर्ति को तोड़ना नफरत भड़काने की कसरत के सिवा और क्या है/ और इसे पेरियार से लेकर आंबेडकर तक खींचने का क्या तर्क हो सकता है/ क्या बीजेपी के लोग यह बताना चाहते हैं कि वे देश में अब तक चले सारे सामाजिक आंदोलनों को मटियामेट कर देंगे/ अगर ऐसा कुछ है तो उन्हें इसके दूरगामी नतीजों का आकलन कर लेना चाहिए। एक सभ्य समाज अपने इतिहास को संजो कर रखता है, भले ही वह उसके वर्तमान से मेल खाता हो या नहीं। इस तरह मूर्तियों की तोड़फोड़ के जरिए प्रतिगामी ध्रुवीकरण का प्रयास देश के लिए नुकसानदेह है। प्रधानमंत्री इससे चिंतित हैं तो इसे यहीं रोक दें।


जनसत्ता

घोटाले और जवाबदेही

पंजाब नेशनल बैंक में हुए अरबों रुपए के घोटाले को लेकर जांच और पूछताछ का दायरा बैंकों के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंच चुका है। सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय के बाद अब वित्त मंत्रालय के तहत आने वाला गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआइओ) भी तेजी से जांच में जुट गया है। इस महकमे ने बुधवार को पीएनबी के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी से पूछताछ की। इससे पहले देश के दो सबसे बड़े निजी बैंकों- आइसीआइसीआइ और एक्सिस बैंक के प्रमुखों को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा। एसएफआइओ उन सभी बैंकों के प्रमुखों से भी पूछताछ करेगा, जिन्होंने नीरव मोदी-मेहुल चोकसी को कर्ज दिया। हालांकि जांच की जटिल प्रक्रिया और रफ्तार को देखते हुए लगता नहीं कि बहुत जल्दी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा। लेकिन हैरानी की बात है कि कर्ज लेकर भागने वालों ने जांच एजंसियों और बैंक प्रबंधनों को जिस तरह धता बताते हुए जांच में सहयोग देने से इनकार कर दिया है, उससे निपटने का रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।

 पीएनबी घोटाला आखिर है कितना बड़ा है, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। पहले ग्यारह हजार चार सौ करोड़ था, फिर बारह हजार सात सौ करोड़ तक पहुंच गया। अब सीबीआइ का कहना है कि यह घोटाला और बड़ा हो सकता है। यह सारे एलओयू यानी लैटर ऑफ अंडरटेकिंग मिलने के बाद ही पता चलेगा। मालूम चला है कि कई एलओयू मोदी-चोकसी की कंपनियों को लौटा दिए गए थे। इन एलओयू के जरिए ही सारा घोटाला चलता रहा। ऐसे में यह सवाल गौण हो जाता है कि घोटाला कितना बड़ा है। बड़ा सवाल है कि कैसे इतने सालों से कुछ लोग बैंक अफसरों के साथ सांठगांठ से लूट मचाते रहे और किसी को भनक तक नहीं लगी। यह बैंकिंग व्यवस्था के खोखलेपन को दर्शाता है। यह बैंकों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। इस घोटाले का असली साजिशकर्ता गीताजंलि समूह का उपाध्यक्ष भी गिरफ्तार हो चुका है। कुल मिलाकर अब तक बीस लोग पकड़े गए हैं। लेकिन असली सूत्रधार कौन हैं और उनके तार कहां जुड़े हैं, यह पता लगा पाना जांच एजंसियों के लिए बड़ी चुनौती है।

आखिर इतने बड़े घोटाले का जिम्मेदार है कौन? किसको जवाबदेह ठहराया जाए? सरकार और बैंक प्रबंधनों को इस बारे में सोचना होगा। बैंकों का नियामक रिजर्व बैंक जिस तरह काम कर रहा है, उससे भी संदेह तो पैदा होता है। घोटाला सामने आने के बाद पंजाब नेशनल बैंक ने वित्त मंत्रालय को सौंपी रिपोर्ट में बताया था कि रिजर्व बैंक ने नौ साल से बैंक का ऑडिट नहीं किया था। रिजर्व बैंक को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह किसी भी बैंक खाते की कभी भी जांच कर सकता है। रिजर्व बैंक के पास अपने ऑडिटर होते हैं। ऐसे में इस सवाल का जवाब कौन देगा कि इतने लंबे समय से पीएनबी का ऑडिट क्यों नहीं हुआ? बैंक का शीर्ष प्रबंधन आखिर क्या करता रहा? ये ऐसे सवाल हैं, जिनमें जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर जवाबदेही तय कर दी जाए, तो शायद ऐसे घोटाले न हों और जांच एजंसियों के लिए नतीजे पर पहुंचना आसान होगा। जिस तरह सरकार, बैंक प्रबंधन और जांच एजंसियां अब चौकस हुई हैं, अगर पहले से ही ऐसी सतर्कता बरती जाती और कड़े नियमों का पालन होता तो ऐसे घोटालों से बचा जा सकता था।


अमर उजाला

शिक्षकों की परीक्षा का हाल

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) 2017 की उत्तर कुंजी को खारिज करते हुए प्रदेश सरकार को नई मेरिट लिस्ट बनाने का जो निर्देश दिया है, वह शिक्षा तंत्र से जुड़ी गंभीर गड़बड़ियों की ओर ही इशारा करता है। इतना ही नहीं, अदालत ने आगामी 12 मार्च को प्रस्तावित टीईटी की परीक्षा टालने के लिए भी कहा है, क्योंकि पिछली परीक्षा से संबंधित तमाम विसंगतियों को एक महीने में पूरा करना होगा। यह बेहद क्षुब्ध करने वाली बात है कि शिक्षा की दुर्दशा से संबंधित सच्चाइयां इस प्रदेश का पीछा नहीं छोड़ रहीं। विगत अक्तूबर में हुई टीईटी की परीक्षा की उत्तर कुंजी में 14 सवालों के जवाब गलत थे। तीन सौ से अधिक अभ्यर्थियों ने आपत्तियां दर्ज कर विवादित प्रश्नों को सही करवाने और उन्हें ग्रेस अंक देने की मांग की थी। लेकिन विशेषज्ञ समिति से उन शिकायतों की जांच करवाए बिना प्राधिकरण ने उन आपत्तियों को खारिज कर दिया, हालांकि विगत नवंबर में संशोधित उत्तर कुंजी जारी जरूर की गई। इस पर अभ्यर्थियों ने अदालत की शरण ली। विद्रूप सिर्फ यही नहीं कि शिक्षकों के लिए होने वाली परीक्षा की उत्तर कुंजी गलत थी, बल्कि उसकी शिकायत को गंभीरता से लेना उससे भी बड़ी विडंबना था। चूंकि परीक्षा से संबंधित प्रश्नपत्र संबंधित एजेंसियों को दे दिए जाने की परिपाटी है, ऐसे में परीक्षा प्राधिकरण ने गलत उत्तर कुंजी की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसी पर थोप दी। अदालत ने अपने फैसले में नियामक प्राधिकरण को उसके कामचलाऊ रवैये के लिए स्वाभाविक ही लताड़ लगाई है। चूँकि विवादास्पद 14 सवालों को हटाकर अब नई मेरिट लिस्ट बननी है, ऐसे में, जो 65,000 अभ्यर्थी परीक्षा में पास हुए थे, उनमें से आने का नुकसान होना तय है। टीईटी की इस महीने होने वाली परीक्षा का टलना तो झटका है ही। अलबत्ता यह प्रसंग उत्तर प्रदेश सरकार के लिए भी एक सबक होना चाहिए, जो इसी महीने सत्ता में अपने एक साल पूरे कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भ्रष्टाचार, कुशासन और अव्यवस्था खत्म कर प्रदेश की नई छवि गढ़ने की अपनी प्रतिबद्धता बार-बार दोहराई है। उम्मीद करनी चाहिए कि देश के सबसे बड़े प्रदेश में शिक्षकों की नियुक्ति में विसंगतियों का यह अंतिम उदाहरण होगा।


हिंदुस्तान

तिब्बत की उलझन

भारत और चीन के रिश्तों में तमाम उलझने हैं और कई तरह की परेशानियां भी हैं। इन रिश्तों की सबसे संवेदनशील नस हैं- तिब्बती नेता दलाई लामा। भारत के लिए भी और चीन के लिए भी। यहां तक कि खुद दलाई लामा के लिए भी यह एक बड़ी उलझन का बिंदु है कि जब बात भारत और चीन के रिश्तों की चल रही हो, तो वह अपने आप को कहां और कैसे रखकर देखें? भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है और उसने दलाई लामा व उनके अनुयाइयों को शरणार्थी का दर्जा दे रखा है। ऐसे शरणार्थी, जिन्हें अपने धर्म व संस्कृति के पालन की तो पूरी आजादी है, लेकिन अपनी राजनीति चलाने की नहीं। दूसरी तरफ, दलाई लामा भले ही वक्त जरूरत अपने स्टैंड को बदलते रहे हों, लेकिन वह और उनके अनुयाई इस उम्मीद में ही भारत में अपना वक्त गुजार रहे हैं कि एक दिन तिब्बत चीन के चंगुल से आजाद होगा और वे अपनी आजाद मातृभूमि में लौट सकेंगे। भले ही कुछ लोगों, या शायद पूरी दुनिया को यह सपना भर लगता हो, लेकिन सपने ही कुछ लोगों के जीवन की हकीकत होते हैं। आज हम भले लाख कहें कि चीन ने तिब्बत को हड़प लिया था, पर चीन ने हर तरह से तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा बना लिया है। उसकी दिक्कत सिर्फ दलाई लामा और तिब्बत से निर्वासित वे लोग हैं, जो भारत समेत दुनिया भर में सब को उस इतिहास की याद दिलाते रहते हैं। इसलिए चीन दलाई लामा का विरोध जताने का कोई मौका नहीं छोड़ता। जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था, तो चीन ने विरोध जताया था, जब वह अरुणाचल प्रदेश जाते हैं, तो चीन विरोध जताता है, जब वह किसी देश में जाकर वहां के नेताओं से मिलते हैं, तो चीन विरोध करना नहीं भूलता। यह बात अलग है कि चीन का यह आरोप किसी को हजम नहीं होता कि दलाई लामा तिब्बत के लोगों को चीन के खिलाफ भड़काते हैं।

दलाई लामा को लेकर चीन की यह संवेदनशीलता भारत और चीन के रिश्तों की सबसे बड़ी बाधा मानी जाती है। इस समय एक संयोग यह बना है कि जब भारत चीन से अपने विवादों को निपटाने की कोशिश कर रहा है, तो उसी समय दलाई लामा और उनके अनुयाइयों के भारत में आगमन के 60 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर भारत में रह रहे तिब्बतियों ने कई तरह के आयोजनों की योजना बनाई है। इन्हीं में से एक आयोजन भारत को धन्यवाद देने के लिए इसी महीने होना था। लेकिन भारत सरकार फिलहाल इस मुद्दे से खुद को दूर रखना चाहती है, इसलिए उसकी कुछ कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि अब यह कार्यक्रम दिल्ली की बजाय दलाई लामा के मुख्यालय धर्मशाला में होगा। जाहिर है कि सरकार यह चाहती है कि चीन से रिश्ते सुधारने की कोशिश में उसकी संवेदनशीलता को आहत होने से रोका जाए। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है।

यह सच है कि चीन ने तिब्बत में जो किया या तिब्बतियों के साथ जो हुआ, उस पर आंसू बहाए जा सकते हैं। लेकिन राजनय और कूटनीति सिर्फ भावनाओं से नहीं चलते। इतिहास में जो हुआ, उसे हम नहीं बदल सकते, लेकिन उसकी वजह से हमें जो वर्तमान मिला है, उसी से हमें भविष्य का रास्ता निकालना होता है। भारत, चीन व तिब्बतियों के भविष्य का रास्ता पिछले तनावों व घावों को हवा देकर नहीं निकलेगा। भारत सरकार के कदम को हमें इसी नजरिये से देखना होगा।


राजस्थान पत्रिका

कैसी गुड गवर्नेंस?

आग लगने पर ही कुआं खोदने वाले को दूरदर्शी तो किसी भी सूरत में नहीं माना जा सकता। फिर भले वह कोई व्यक्ति हो अथवा सरकार। सरकारी बैंक से हजारों-करोड़ रुपए कर्ज लेकर विदेश भाग जाने के मामले सामने आए तो वित्त मंत्रालय भी नींद से जागता लग रहा है। नित नए निर्देश जारी हो रहे हैं। वित्त मंत्रालय का नया निर्देश पचास करोड़ से अधिक कर्ज लेने वालों का पासपोर्ट ब्यौरा लेने के बारे में है। कर्जा लेने वाले फार्म में भी संशोधन के सुझाव दिए गए हैं। अहम सवाल ये कि आखिर पंजाब नेशनल बैंक से हजारों-करोड़ के घोटाले के बाद ही वित्त मंत्रालय को ये सब क्यों सूझ रहा है? बैंक से कर्ज लेकर विदेश भाग जाने का मामला नया नहीं है। पहले भी ऐसे मामले समय-समय पर उजागर होते रहे हैं। तब वित्त मंत्रालय क्यों नहीं चेता? निर्देश जारी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने से देश का भला न तो आज तक हुआ है और न होने वाला। असल सवाल जवाबदेही का है। कर्ज  लेकर जमा नहीं कराने को लेकर किसी की तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। ऐसा कैसे संभव है कि सालों तक कोई कारोबारी एक ही बैंक से करोड़ों रुपए का कर्ज लेकर हजम करता रहे और पकड़ में नहीं आए? मामला उजागर होने में दस साल लग जाएं तो इसे ‘दाल में काला’ नहीं मान सकते, पूरी दाल ही काली मानी जाएगी। मतलब वित्त मंत्रालय और बैंक के तमाम अधिकारी छोटे अफसरों पर गाज गिराकर बड़ों को बचाने की परम्परा से ही घोटालों का इतना बड़ा स्वरुप होता है। कर्ज देते समय गारंटी के रूप में कुछ रखने की परम्परा तो पुरानी है। कर्ज वसूली के लिए गारंटी देने वाले को भी बुलाया जाता है। तमाम शर्तें और नियम लागू किए जाते हैं। बावजूद इसके इतने बड़े घोटाले, सिस्टम को ध्वस्त कर ही जाते हैं। जाहिर है ये सब बिना मिलीभगत के नहीं हो सकता। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि घोटाले हर सरकारों में होते रहे हैं लेकिन इसे रोकने के पुख्ता इंतजाम होते कभी नजर नहीं आए। क्यों ना कुंआ आग लगने से पहले ही खोद लिया जाए? आखिर बैंकों का डूबने वाला हजारों-करोड़ रुपया होता तो आम आदमी का ही है। सरकारें बात तो काले कालेधन को विदेश से वापस लाने की करती हैं लेकिन यहां तो सफेद धन धड़ल्ले से बाहर जा रहा है। इसे ‘गुड गवर्नेंस’ कैसे माना जाए?


दैनिक जागरण

मूर्ति भंजन

त्रिपुरा में भाजपा की प्रबल जीत के बाद वामपंथी विचारधारा के प्रतीक और रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा को जिस तरह ढहाया गया उसकी निंदा ही की जा सकती है। यह सही है कि त्रिपुरा में वाम दलों के शासन से लोग उकता गए थे और लेनिन की प्रतिमा को गिराकर उन्होंने एक तरह से अपने असंतोष को ही प्रकट किया, लेकिन उनका तरीका अनुचित और अवांछित ही कहा जाएगा। किसी को भी वैसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जैसा त्रिपुरा में भाजपा समर्थकों ने जबरन अपने हाथों में ले लिया और बुलडोजर लेकर लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया। लोकतंत्र में इस तरह की मनमानी के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। ऐसी मनमानी न केवल भारतीय मूल्यों और मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि कानून के शासन को भी नीचा दिखाने वाली है। आखिर मूर्ति भंजकों से पीड़ित देश में उस तरह किसी प्रतिमा का ध्वंस कैसे किया जा सकता है जैसे त्रिपुरा में किया गया? इसके दुष्परिणाम सामने आने ही थे और वे आए भी। त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा नष्ट किए जाने के जवाब में कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को नष्ट-भ्रष्ट करने की कोशिश की गई। विडंबना यह है कि यह कृत्य उन्होंने किया जो लेनिन की प्रतिमा ढहाए जाने का विरोध कर रहे थे। एक प्रतिमा के ध्वंस के जवाब में किसी अन्य की प्रतिमा को नष्ट करने की कोशिश उन्माद के अलावा और कुछ नहीं। देश को इस उन्माद से बचाने की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों की है। नि:संदेह जो सत्ता में हैं उनकी अधिक है। यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा और तमिलनाडु में पेरियार की प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की निंदा की। उम्मीद है त्रिपुरा के भाजपा समर्थक यह समङोंगे कि उन्होंने अपनी पार्टी की शानदार जीत का जश्न फीका करने का ही काम किया।1इसमें संदेह नहीं कि वामदलों के लिए लेनिन एक क्रांतिकारी नेता हैं, लेकिन उन्हें यह भी स्मरण रहे तो बेहतर कि दुनिया लेनिन को उनकी ही नजर से नहीं देखती और इसका कारण यह है कि रूसी क्रांति के दौरान बहुत से लोग मारे गए थे। इन लोगों की मौत के लिए लेनिन ही जिम्मेदार थे, जो यह मानते थे कि विरोधियों को कुचले बगैर क्रांति नहीं आ सकती। यही कारण रहा कि सोवियत संघ के विघटन के बाद कई देशों में लेनिन की प्रतिमाओं को ढहाया गया। ऐसा लगता है कि त्रिपुरा में भाजपा की जीत से उत्साहित लोग यह भूल गए कि यह काम वहां की सरकारों अथवा स्थानीय प्रशासन की ओर से किया गया, न कि भीड़ के द्वारा। जब किसी सड़क, पार्क आदि का नाम बदलने का काम भी एक तय प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है तो फिर किसी प्रतिमा को हटाने-गिराने का काम भीड़ कैसे कर सकती है? नि:संदेह वाम दल लेनिन से प्रेरणा लेने और उनके गुण गाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन वे इस देश पर उनकी विचारधारा जबरन नहीं थोप सकते। दुर्भाग्य से उन्होंने यही किया है और इसी कारण जहां-जहां उनकी मौजूदगी है वहां-वहां राजनीतिक हत्याएं अधिक होती हैं।


प्रभात खबर

हिंसा स्वीकार्य नहीं

त्रिपुरा में चुनाव के चार दिन बाद भी जीत के जश्न में उन्मादी भीड़ हिंसा पर उतारू है. विचार के प्रतीक के रूप में खड़ी की गयी मूर्तियां ढही जा रही हैं और विचारधारा के आधार पर शत्रु मान लिये गये लोगों के साथ हिंसा की जा रही है. हिंसा के साथ एक मुश्किल मुश्किल यह है कि वह किसी एक जगह ठहरी नहीं रहती. तीव्र संचार-सूचना के इस दौर में तो खैर हिंसा का कहीं सीमित रहना संभव ही नहीं. इस कड़ी में तमिलनाडु और बंगाल की घटनाओं को रखा जा सकता है. बहरहाल, राजनीतिक प्रतिशोध के उभरते हिंसक ज्वार के बीच उम्मीद की एक किरण नजर आ रही है. सत्ता के शीर्ष से हिंसा के ऐसे संगठित व्यवहार की निंदा की गयी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मूर्तियों के तोड़-फोड़ और हिंसा के बरताव की निंदा करते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह को मामले पर नजर रखने की हिदायत दी है. गृह मंत्री ने राज्य सरकारों को सामान्य स्थिति बहाल करने का निर्देश दिया है. हिंसा और उपद्रव को किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. कभी-कभी यह तर्क भी दिया जाता है कि किसी व्यवस्था में समाये अन्याय के खात्मे के लिए हिंसा का सहारा लेना एक सीमा तक उचित है. लेकिन औचित्य की तुला पर यह तर्क भी कमजोर है, क्योंकि इसमें भविष्य की मनोवांछित कल्पना के आधार पर वर्तमान के हिंसक व्यवहार को सही कहने की कोशिश है. आखिर यह कैसे सिद्ध किया जा सकता है कि हिंसक गतिविधियों के सहारे जिस समाज या व्यवस्था की स्थापना की कोशिश की जा रही है, यह अपने साकार रूप में हर तरह से न्यायपूर्ण ही होगा? व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को सबसे ऊंचा मूल्य माननेवाले लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो हिंसक व्यवहार के पक्ष में कोई अकाट्य तर्क ही नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उद्देश्य न्यायपूर्ण समाज-रचना का हो या व्यक्तिगत धरातल पर अपनी क्षमताओं के विकास का- लोकतंत्र में हर प्रयास या गतिविधि विधि-सम्मत दायरे में ही होनी चाहिए. चुनाव या राजनीतिक गतिविधियां विभिन्न राजनीतिक सिद्धांतों और विचारों के तार्किक टकराव के अवसर होते हैं. जनता अपनी समझ से अपने नुमाइंदों का चयन करती है. निर्वाचित दलों या प्रतिनिधियों का ध्यान बेहतर सरकार देने की दिशा में होना चाहिए. विपक्ष का काम है कि वह सत्ता पक्ष की खामियों को चिह्नित करे तथा सकारात्मक आलोचना से सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों में सुधार का दबाव बनाये. मौजूदा माहौल में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर मुस्तैदी दिखाने के साथ राजनीतिक मोर्चे पर एका कायम करने की भी जरूरत है. सभी राजनीतिक दलों तथा नागरिक संस्थाओं को व्यापक हितों को सामने रखते हुए स्थिति को सामान्य बनाने की दिशा में प्रयत्न करना होगा और यह सीख लेनी होगी कि चुनावों को लोगों की राजनीतिक पसंद के इजहार का मौका मानकर लड़ा जाये, न कि आमने-सामने की एक खूनी जंग. ध्यान रहे, एक स्वस्थ लोकतंत्र के बिना विकास और समृद्धि की आकांक्षाएं भी अधूरी रह जायेंगी.


 देशबन्धु

किसका बनेगा तीसरा मोर्चा

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 13 मार्च को सभी विपक्षी दलों के नेताओं को रात्रिभोज पर बुलाया है। लेकिन इनमें से कितने भोज में शामिल होते हैं, यह देखने वाली बात है। ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी की यह डिनर डिप्लोमेसी 2019 के आम चुनाव के पहले विपक्षी एकजुटता कायम करने के प्रयास का हिस्सा है। वे पहले भी विपक्ष के नेताओं से मेल-मुलाकात करती रही हैं। दरअसल जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे विभिन्न दलों के बीच राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पिछले चुनावों में भाजपा ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी और उसके बाद उसकी जीत का ग्राफ बढ़ता ही गया। एक के बाद एक राज्यों पर केसरिया रंग छाने लगा। ऐसे में न केवल राष्ट्रीय दल, बल्कि क्षेत्रीय दल भी अपनी प्रासंगिकता को लेकर चिंता में पड़ते जा रहे हैं।

मोदी और शाह की जोड़ी केवल चुनाव जीतने की रणनीति नहीं बनाती है, बल्कि इस सिद्धांत पर चलती है कि या तो हम जीतेंगे या जीतने वालों के साथ हो जाएंगे और इन दोनों में से कुछ न हुआ तो किसी भी तरह जोड़-तोड़ कर सत्ता हथिया ही लेंगे। बस दिल्ली और पंजाब में भाजपा यह तिकड़म नहीं चल पाई, क्योंकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने क्लीन स्वीप किया था और पंजाब में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के साथ अकालियों की बुरी हार हुई थी। हम रहेंगे और बस हम ही रहेंगे, वाली भाजपाई सोच ने उन सभी दलों को चिंता में डाल दिया है, जो एनडीए का हिस्सा नहीं हैं।

हालांकि एनडीए के कुछ घटक दलों की यह शिकायत है कि मोदी-शाह के आगे उनकी कोई पूछ-परख नहीं होती। कुछ नेता ऐसे जरूर हैं, जो मान-अपमान की परवाह किए बगैर यूपीए में भी शामिल रहे, फिर एनडीए में आ गए। ऐसे नेताओं को केवल सत्ता की मलाई से मतलब रहता है। लेकिन जिन्हें अब भी अस्मिता और आत्मसम्मान का लिहाज है, वे नई राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। हाल ही में तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने तीसरे मोर्चे की संभावनाओं का नया जिक्र छेड़ा। उन्होंने गैर भाजेपा, गैर कांग्रेस मोर्चे के साथ राजनीति में गुणवत्तापूर्ण बदलाव की बात भी की। आज के समय में राजनीति में गुणवत्ता का जिक्र अनूठा लगता है, क्योंकि इससे पहले राजनैतिक मूल्यों में इतनी गिरावट शायद ही आई हो।

अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी बदलाव वाली राजनीति के मंत्र से ही सत्ता हासिल की थी। लेकिन आज की तारीख में आप भी अन्य दलों की तरह ही हो गई है, जिसके राजनैतिक मापदंड सुविधानुसार बदल जाते हैं। ऐसे में चंद्रशेखर राव किस तरह के गुणवत्तापूर्ण बदलाव की बात कर रहे हैं, यह फिलहाल समझना कठिन है। बहरहाल, उन्होंने जिस तीसरे मोर्चे की चर्चा छेड़ी, उसमें ममता बनर्जी, अजीत जोगी, हेमंत सोरेन, असद्दुदीन ओवैसी की सहमति उन्हें मिल रही है। लेकिन इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है, क्योंकि इन सबके अपने-अपने निहित स्वार्थ हैं।

ममता बनर्जी के अलावा फिलहाल किसी का जनाधार भी इतना ज्यादा नहीं है कि भाजपा के सामने चुनौती बन सके। फिर इस संभावित तीसरे मोर्चे में घटक दलों के आपसी समीकरण भी समझने होंगे। राव चाहते हैं कि माकपा इसमें शामिल हो, लेकिन फिर ममता बनर्जी को इससे तकलीफ हो सकती है। उधर सोनिया गांधी भी ममता बनर्जी को अपने साथ लाना चाहती हैं। अजीत जोगी के लिए यह बात कही जाती है कि वे कांग्रेस का विरोध कर भाजपा को फायदा पहुंचाते हैं, ऐसे में तीसरे मोर्चे में अपनी विश्वसनीयता वे कैसे कायम करेंगे? हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा भी पहले एनडीए और फिर यूपीए का हिस्सा रह चुकी हैं, तो अब इस तीसरे मोर्चे में उनका क्या रूख रहेगा? राव के तीसरे मोर्चे और सोनिया के तीसरे मोर्चे के बीच सपा, बसपा जैसे दल कैसी भूमिका निभाएंगे? अभी उप्र में उपचुनाव के पहले सपा-बसपा साथ आ गए हैं। जबकि पिछले चुनाव में सपा-कांग्रेस एकसाथ थे और बसपा विरोध में थी।

उधर तमिल राजनीति में भी द्रमुक, अन्नाद्रमुक के अलावा रजनीकांत, कमल हासन जैसे नए चेहरे राजनीति के तीसरे मोर्चे को प्रभावित कर सकते हैं। कर्नाटक में चुनाव परिणाम तय करेंगे कि जद एस किस पाले में जाती है। अभी तेलगुदेशम पार्टी एनडीए में है, लेकिन आंध्र की अनदेखी के नाम पर नाराज भी है, तो क्या वह आगे भी एनडीए का हिस्सा रहेगी? कुल मिलाकर कई तरह के जोड़-घटाना, गुणा-भाग चुनावों के पहले होगा और नए समीकरण बनेंगे। लेकिन इनका असर तभी जोरदार होगा, जब वे महज भाजपा विरोध के नाम पर इक_े न होकर व्यापक हितों और दूरगामी सोच को लेकर आगे बढ़ेंगे, जब वे देश के सामने सशक्त विकल्प प्रस्तुत करेंगे। इसके लिए तमाम दलों को पहले अपने क्षुद्र स्वार्थ और फौरी लाभ का लालच छोड़ना होगा। बड़ा बनने के लिए बड़ी लकीर खींचें, दूसरे की लकीर को मिटाकर छोटा करने की प्रवृत्ति छोड़ें, तभी तीसरे मोर्चे का असल लाभ मिलेगा।