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आज के हिंदी/अंग्रेजी अखबारों के संपादकीय: 26 अप्रैल,2018

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नवभारत टाइम्स

संकट नहीं अवसर
अमेरिकी सरकार भारतीय आईटी सेक्टर पर एक और हथौड़ा चलाने जा रही है। एच-1 बी वीजा में कई बदलाव करने के बाद ट्रंप प्रशासन अब एच-4 वीजाधारकों को काम करने की अनुमति देने वाला अधिनियम समाप्त करने पर विचार कर रहा है। एच-4 वीजा एच-1 बी वीजाधारकों के पति या पत्नी को दिया जाता है। ओबामा सरकार ने एच-4 वीजाधारकों को वर्क परमिट दिया था। इससे पहले वे वहां नौकरी नहीं कर सकते थे। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट की हालिया स्टडी के मुताबिक अमेरिका ने एच-1 बी वीजाहोल्डर्स के 71,000 से ज्यादा जीवनसाथियों को एंप्लॉयमेंट ऑथराइजेशन डॉक्युमेंट्स जारी किए हैं, जिनमें 90 फीसदी भारतीय हैं। वहां आईटी प्रफेशनल्स को कई बार अस्थायी बेरोजगारी का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे में जीवनसाथी के पास कोई रोजगार हो तो परिवार को आर्थिक संकट नहीं झेलना पड़ता। यह सुविधा अब अचानक खत्म हो जाएगी। ट्रंप ऐसे फैसले ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इनका घातक असर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई बड़े अमेरिकी उद्यमी और नामी-गिरामी लोग उनकी वीजा नीति का विरोध करते रहे हैं। फेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट समेत कई बड़ी आईटी कंपनियों ने ट्रंप के ताजा प्रस्ताव को अमेरिकी हितों के लिए नुकसानदेह बताया है। उनका कहना है कि इस फैसले से अमेरिका में काम कर रहे लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर होंगे, जिसका सीधा असर देश की इकॉनमी पर पड़ेगा। बहरहाल, हमें इससे परेशान होने की बजाय वीजा की धमकियों का कोई स्थायी हल ढूंढना चाहिए। इस संकट को हमें एक अवसर में बदलना होगा। भारतीय कंपनियों को हर अर्थ में अपना दायरा बढ़ाना चाहिए। जो कंपनियां सेवा क्षेत्र में काम कर रही हैं, वे प्रॉडक्ट और प्लैटफॉर्म बनाने में उतरें तो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत इस मामले में चीन से सीख सकता है, जिसने गूगल और फेसबुक को ब्लॉक करके बाइडू, वीचैट, वीबो और अलीबाबा जैसी अपनी कंपनियों को उनकी टक्कर में ला दिया। आज भारत के डिजिटल विज्ञापनों पर गूगल और फेसबुक का दबदबा है। आखिर हम कब तक अमेरिकी टेक कंपनियों की डिजिटल कॉलोनी बने रहेंगे/ हमें भारतीय स्टार्टअप कंपनियों को बढ़ावा देना होगा, ताकि वे इनकी जगह ले सकें। देश में कॉम्पिटिटिव माहौल बने तो भारतीय प्रतिभाएं आगे बढ़ेंगी। स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया को व्यापक पैमाने पर जमीन पर उतारने के लिए सरकार को भी आगे आना होगा। पूरी तैयारी के साथ हम इस काम में उतरें तो अगले कुछ सालों में भारतीय प्रफेशनल्स को कभी इस तो कभी उस देश में वीजा कटौती के खौफ से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा।


जनसत्ता

मलेरिया की मार

मलेरिया आज भी भारत के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है। कहने को इससे निपटने के लिए तमाम सरकारी कार्यक्रम और अभियान चलते रहे, पर सब बेनतीजा साबित हुए। यह गंभीर चिंता का विषय है। राजधानी दिल्ली में साल में आठ महीने मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं। दूसरे राज्यों में भी हर साल ये बीमारियां फैलती हैं। मच्छरों से होने वाली इन बीमारियों की रोकथाम में सरकारें नाकाम रही हैं। मलेरिया को लेकर भारत की स्थिति आज भी गंभीर है। भारत आज भी दुनिया के उन पंद्रह देशों में शुमार है, जहां मलेरिया के सबसे ज्यादा मामले आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में भारत चौथा देश है, जहां मलेरिया से सबसे ज्यादा लोग मरते हैं। दुनिया में हर साल मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में सात फीसद अकेले भारत में होती हैं। नाइजीरिया पहले स्थान पर है, जहां मलेरिया सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी बना हुआ है। ज्यादातर विकासशील देशों, जिनमें अफ्रीकी देशों की संख्या ज्यादा है, में मलेरिया से होने वाली मौतों का आंकड़ा आज भी चौंकाने वाला है।

सवाल है कि भारत मच्छर जनित बीमारियों, खासकर मलेरिया से निपट क्यों नहीं पा रहा? मलेरिया के खात्मे के लिए बने कार्यक्रम और अभियान आखिर क्यों ध्वस्त हो रहे हैं? ऐसी नाकामियां हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र की खामियों की ओर इशारा करती हैं। ये नीतिगत भी हैं और सरकारी स्तर पर नीतियों के अमल को लेकर भी। मलेरिया उन्मूलन के लिए जो राष्ट्रीय कार्यक्रम बना, वह क्यों नहीं सिरे नहीं चढ़ पाया? जाहिर है, इन पर अमल के लिए सरकारों को जो गंभीरता दिखानी चाहिए थी, उसमें कहीं न कहीं कमी अवश्य रही। इन सबसे लगता है कि मलेरिया के खात्मे की मूल दिशा ही प्रश्नांकित रही है। सरकार का मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम कामयाब नहीं हो पाया था, जो 2013 में बंद कर दिया गया।

भारत आखिर मलेरिया से मुक्ति कैसे पाएगा? डब्ल्यूएचओ ने दुनिया से मलेरिया का खात्मा करने के लिए 2030 तक की समय-सीमा रखी है। भारत को भी अगले बारह साल में इस लक्ष्य को हासिल करना है। आम आदमी को जीने के लिए स्वस्थ वातावरण मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है। मच्छरों के पनपने के लिए नमी और गंदगी सबसे अनुकूल होते हैं। मलेरिया से निपटने में स्वच्छता का अभाव एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। स्वच्छता के मामले में भी भारत की स्थिति दयनीय है। साफ-सफाई को लेकर लोगों में जागरूकता की बेहद कमी है। दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन और सरकारों की लापरवाही भी इसके लिए जिम्मेदार है। भारत में आज भी कूड़ा प्रबंधन की ठोस योजना नहीं है।


हिंदुस्तान

बाबा को आजीवन जेल
भले ही आसाराम को उम्रकैद की सजा निचली अदालत से हुई और वह मन के किसी कोने में ऊपरी अदालत से राहत की कोई उम्मीद लगाए बैठे हों, लेकिन जिस तरह बीते पांच साल में उनकी ढिठाई के कसबल अदालत की सख्ती से टूटे हैं, वह देश की कानून-व्यवस्था पर भरोसा बढ़ाने वाला है। यह बताता है कि धर्म और अध्यात्म को गंदा धंधा बना देने वाले फर्जी बाबाओं के दिन अब लद चुके हैं। सत्तर के दशक में साबरमती तट के छोटे से आश्रम से निकलकर 19 देशों में 400 से ज्यादा आश्रमों, चार करोड़ से ज्यादा भक्तों और दस हजार करोड़ से भी ज्यादा संपत्ति का स्वामी बने आसाराम एक ऐसा नाम है, जो अध्यात्म की डगर पर सरपट दौड़ता रहा। उनके आगे नतमस्तक बडे़-बड़े राजनेता, उद्योगपति और सफेदपोश इस सरपट में उनकी राह आसान करते दिखे। वह एक ऐसे आभामंडल के स्वामी थे कि जब अपने ही शिष्य की नाबालिग बच्ची से बलात्कार के मामले में गिरफ्तार हुए, तो भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। वह अराजकता का ऐसा उदाहरण बने कि उनके जेल जाने और मुकदमा शुरू होते ही तमाम और मामले तो खुले ही, मामलों के गवाहों पर जानलेवा हमले भी शुरू हो गए। उनके एक निजी सहायक और आश्रम के एक विश्वासपात्र रसोइए की हत्या भी कर दी गई। कई और हत्याएं हुईं। कई गवाह तो अब तक लापता हैं।

आसाराम की कहानी, संतई की छोटी सी कुटिया से निकलकर अर्श तक पहुंचे जादुई फितरत वाले उस इंसान के भहराकर फर्श पर गिरने की कहानी है, जिसे संभलने का भी वक्त नहीं मिलता। सच है कि जब सामने आंखें मूंदे भक्तों का विशाल और अथाह समुद्र हो, तो अपने सारे बुरे काम ढके हुए दिखते हैं। यही आसाराम के साथ भी हुआ। यह चार दशक की संतई के सफर में खडे़ हुए विशाल साम्राज्य के ढहने की कहानी भी है। उस संत का साम्राज्य ढहने की कहानी, जो अपने आचरण में इतना निरंकुश हो चुका था कि जिस वक्त पूरा देश निर्भया गैंगरेप जैसे जघन्य मामले पर आंदोलित था, उसके बयान ने उसके भक्तों को भी थोड़ी देर के लिए ही सही, विचलित कर दिया था।


दैनिक जागरण

डिजिटल युग की चुनौती
डाटा चोरी मामले में कैंब्रिज एनालिटिका और फेसबुक को दूसरा नोटिस देने की नौबत आई तो इसका मतलब है कि पहली नोटिस से बात नहीं बनी। ऐसा लगता है कि ये दोनों कंपनियां अपनी जवाबदेही को लेकर गंभीर नहीं। एक ओर जहां कैंब्रिज एनालिटिका ने कामचलाऊ जवाब देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली वहीं दूसरी ओर फेसबुक खेद जताने और भविष्य में ऐसा न होने देने का आश्वासन भर देने तक सीमित रही। यह ठीक है कि भारत सरकार ने दूसरी नोटिस जारी कर यह संकेत दिया कि वह कोई सख्त फैसला भी ले सकती है, लेकिन केवल इतने से काम चलने वाला नहीं है। यह वक्त की मांग है कि सरकार डाटा चोरी रोकने के लिए कोई ठोस कानून बनाए। ऐसे कोई कानून इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि कल को कोई अन्य कंपनी वैसा ही काम कर सकती है जैसा फेसबुक की लापरवाही से कैंब्रिज एनालिटिका ने किया। चूंकि अब यह खतरा बढ़ गया है कि लोगों को डाटा चुराकर और राजनीतिक, सामाजिक मामलों में उनकी रुचि जानकर उन्हें मिथ्या प्रचार से प्रभावित करने का काम किया जा सकता है इसलिए फेसबुक और कैंब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियों को किन्हीं नियम-कानूनों में बांधने की जरूरत है। सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती और न ही उसे करना चाहिए कि नियम-कानूनों के अभाव में राजनीतिक एवं गैर राजनीतिक संगठनों के लिए काम करने वाली कंपनिया चुनावों को प्रभावित करने और यहां तक कि किसी संवेदनशील मसले पर लोगों को उकसाने या बरगलाने का भी काम कर सकती हैं। जब यह स्पष्ट हो गया है कि इस तरह का काम होने लगा है तब फिर भारत को डाटा सुरक्षा के मामले में वैसे ही कानून बनाने चाहिए जैसे यूरोपीय समुदाय ने बनाए हैं। यह ठीक नहीं कि फेसबुक की ओर से यह कहा जा रहा है कि वह डाटा सुरक्षा के वैसे प्रबंध नहीं कर सकती जैसे उसने यूरोपीय समुदाय के लिए किए हैं। क्या इसका यह मतलब नहीं कि वह भारत को दोयम दर्जे के देश के तौर पर देख रही है और वह भी तब जब भारत एक बड़ी डिजिटल ताकत के तौर पर उभर रहा है? 1डाटा चोरी रोकने के लिए सक्षम कानून बनाने के साथ ही यह भी समझने की आवश्यकता है कि मुफ्त में सूचनाएं और जानकारी प्रदान करने वाली इंटरनेट आधारित कंपनियां उपभोक्ताओं का डाटा किसी न किसी रूप में इस्तेमाल करती ही हैं। शायद इसीलिए यह कहा गया है कि लोग जिन सेवाओं का मूल्य नहीं चुकाते उनके उत्पाद वे स्वयं होते हैं। डिजिटल युग की इस हकीकत के बावजूद उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए कि उनकी निजी जानकारी का उपयोग कौन किसलिए कर रहा है? इस मामले में यह भी ध्यान रहे कि आज के डिजिटल युग में ऐसी अपेक्षा का कोई मतलब नहीं कि डाटा यानी निजी जानकारी का किसी भी रूप में कहीं कोई इस्तेमाल ही न होने पाए। आधार पहचान पत्र के मामले में कुछ लोग इसी अपेक्षा के साथ कुतर्क करने में लगे हुए हैं। डाटा के मामले में निजता के अधिकार को जरूरत से ज्यादा खींचना एक तरह की डिजिटल अज्ञानता ही है।


दैनिक भास्कर

आसाराम प्रकरण से हमारी व्यवस्था के लिए सबक
देशभर से महिलाओं और बालिकाओं पर दुराचार संबंधी बढ़ती खबरों के बीच ऐसे ही मामले में आसाराम बापू को अदालत से उम्रकैद की सजा मिलने से कानून और न्याय व्यवस्था में भरोसा और मजबूत होगा। सराहना उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की उस नाबालिग के परिवार की भी करनी होगी, जिसने सारी धमकियों के बीच अपनी लड़ाई जारी रखी। आसाराम उन बड़े बाबाओं में से है जो हाल के दिनों में कड़ी कानूनी व न्यायिक कार्रवाई के भागी बने हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता नहीं कि देश में ऐसे बाबाओं के प्रति जनसाधारण का जुनून कुछ कम हुआ हो। दरअसल, इसकी जड़ंे कहीं ओर हैं। भारत के आर्थिक विकास की कितनी ही बात की जाए पर लगता नहीं कि यह अार्थिक तरक्की अामजन को सामाजिक न्याय व समानता देने में सफल रही है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि शासन के अधिकृत संस्थान अपनी जिम्मेदारियां निभाने में नाकाम रहे हैं। इसके कारण एक तरफ ऐसे बाबाओं को कानून से ऊपर अपनी सत्ता चलाने का मौका मिलता है तो दूसरी तरफ न्याय व राहत की तलाश में जनसाधारण इनकी ओर आकर्षित होते हैं। जितना देश समृद्ध होता जा रहा है। उसी अनुपात में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जिन्हें महसूस होता है कि वे पीछे छोड़ दिए हैं। यहां कार्ल मार्क्स का यह कहना सही है कि धर्म आम लोगों के लिए अफीम अाज के समय में उसे अपनी सारी समस्याओं का समाधान इसी में नज़र आता है। सामाजिक विषमता के अलावा यह प्रवृत्ति शिक्षा की कमजोर गुणवत्ता की ओर भी इशारा करती है। वरना आमजन के साथ उच्चशिक्षित और समृद्ध तबका भी क्यों ऐसे बाबाओं के पीछे भागता। हमारी शिक्षा व्यवस्था समाज में अंधविश्वास व कुरीतियों के खिलाफ एक वैज्ञानिक सोच का वातावरण बनाने में नाकाम रही है, क्योंकि इसे अच्छा नागरिक बनाने की बजाय अच्छा कॅरिअर बनाने की दिशा में मोड़ दिया गया है। आप अगर गौर से देखेंगे तो ऐसे बाबाओं के पास आध्यात्मिक ज्ञान पाने के लिए जाने वाले बहुत ही कम होंगे, अधिसंख्य लोग आर्थिक व सेहत संबंधी समस्याओं और अंधविश्वास के कारण जाते हैं। जाहिर है इसका संबंध आर्थिक विषमता व स्वास्थ्य व शिक्षा की कमजोर व्यवस्था है। इन्हें मजबूत बनाकर ही हम ऐसे स्वस्थ्य व वैज्ञानिक सोच वाले समाज का निर्माण कर सकते हैं, जहां ऐसे बाबाओं के लिए कोई स्थान नहीं होगा।


प्रभात खबर

कांत की गलतबयानी

अहम और जवाबदेह पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे कुछ कहने से पहले यह इत्मीनान कर लें कि उनके बयान से मुद्दों की संजीदगी कम न हो और न ही उससे सुननेवाले के सम्मान को ठेस लगे. बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों को देश के पिछड़ेपन का कारण बतानेवाले वक्तव्य में नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कांत से इस लिहाज से भारी चूक हुई है. भारत के विषम विकास की समस्या का विश्लेषण करते हुए इसके मूल कारणों की पहचान करना सबसे जरूरी है. नीति आयोग के प्रमुख अधिकारी होने के नाते आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के समाधान का उत्तरदायित्व उनके ऊपर है. उन्हें तो यह बताना चाहिए कि प्राकृतिक और मानव संसाधनों से भरे-पूरे राज्य अगर आजादी के सात दशकों तक विभिन्न सूचकांकों में निचले पायदानों पर हैं, तो इसका कारण योजनाओं और नीतियों की विसंगतियां हैं, विकास योजनाओं के लिए समुचित धन के आवंटन का अभाव है तथा संसाधनों की सही भरपाई का न होना है. सर्वाधिक अविकसित 101 जिलों को आगे बढ़ाने की नीति आयोग की एक योजना में इन जिलों को ‘पिछड़ा’ या ‘अविकसित’ नहीं, बल्कि ‘विकास का अभिलाषी’ कहा गया था. यह कहा जाना किसी क्षेत्र के विकास क्षमता पर भरोसा जताना है. यह विशेषण आगे बढ़ने के लिए आमंत्रण और आश्वासन है.

इससे सीख लेते हुए अमिताभ कांत पिछड़े राज्यों को देश के विकास में बाधक बनने का दोषी ठहराने की जगह इनके लिए विशेष प्रयासों की जरूरत पर जोर दे सकते थे. विकास की राह में मौजूद चुनौतियों को पहचानने और विकास की परिकल्पना को नीतियों में ढालने की जिम्मेदारी नीति आयोग की है और इस नाते आयोग से उम्मीद यह है कि वह भारत में गुजरे सालों में अपनाये गये विकास के मॉडल की समीक्षा कर रणनीति बनाये. विभिन्न पंचवर्षीय एवं अन्य योजनाओं में देश के कुछ इलाकों को खेती और उद्योग के मामले में ज्यादा तरजीह मिली. आखिर उत्तर प्रदेश या बिहार के बरक्स पंजाब, हरियाणा या दक्षिणी राज्य कोई रातों-रात तो आगे नहीं बढ़े हैं! अनेक विचारकों के मुताबिक, भारत आंतरिक उपनिवेशीकरण का शिकार है. कई इलाकों के साथ ईमानदार सलूक नहीं हुआ है. यह रवैया आज भी जारी है. पिछड़े जिले विकास का मॉडल कहे जानेवाले केरल (वायनाड, इडुक्की) और गुजरात (मोरबी, नर्मदा) में भी हैं. विकास की जरूरत सिर्फ पिछड़े राज्यों को ही नहीं, बल्कि समूचे देश को है. विकास के मानदंडों पर देश बांटने की मंशा अच्छी नहीं है. बेमतलब बयानबाजी से परहेज करते हुए नीति-नियामकों को समावेशी और संतुलित विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. उम्मीद है कि अमिताभ कांत अपनी गलती को सुधारते हुए ऐसी योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने को प्राथमिकता देंगे जो देश के हर हिस्से को संपन्न और समृद्ध बनाने के संकल्प को साकार कर सकें.


देशबंधु

आश्रमों में मासूमों का शिकार
नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम दोषी पाया गया है। उसके साथ उसके छिंदवाड़ा आश्रम का डायरेक्टर शरतचंद्र और वहां की वार्डन शिल्पी को भी जोधपुर की अदालत ने दोषी करार दिया है। आसाराम को उम्रकैद की सजा मिली है, जबकि शरतचंद्र और शिल्पी को 20 -20 साल की सजा सुनाई गयी है। आसाराम पर आरोप था कि जोधपुर के निकट मनाई आश्रम में इलाज के लिए लायी गई 16 बरस की नाबालिग का उसने बलात्कार किया था। दरअसल लड़की के माता-पिता आसाराम के भक्त थे और उसे इलाज के लिए वहां लेकर गए थे।

कठुआ में मंदिर में हुए गैंगरेप से संवेदनशील समाज स्तब्ध रह गया और सवाल उठाए जाने लगे कि देवी के स्थान पर ऐसा घिनौना अपराध कैसे किया जा सकता है? लेकिन आसाराम से लेकर, रामरहीम, नित्यानंद, रामपाल, वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे दर्जनों बाबाओं ने अपराध के लिए धर्म को ही सबसे आसान माध्यम माना। और कमजोर तबके की, महिलाओं, नाबालिग लड़कियों को अपना शिकार बनाया। प्राचीन भारत की गौरवगाथा करते वक्त गुरु-शिष्य परंपरा, आश्रमों आदि का बखान हम बड़े गर्व से करते हैं। लेकिन आज इन ढोंगी साधु-संतों ने आश्रमों को मोगैंबो और शाकाल के अड्डों से भी भयावह जगह बना दी है।

फिल्मों के इन खलनायकों के बारे में तो पता था कि ये बुरे लोग हैं, लेकिन बलात्कारी बाबाओं के बारे में पता होने के बाद भी उन्हें बचाने की कुटिल चालें चली जाती रहीं। इन तमाम बाबाओं को सत्ता का भरपूर संरक्षण हासिल रहा। मुख्यमंत्रियों से लेकर, कद्दावर नेता जब इन फर्जी संतों के आगे सिर झुकाएं तो भला जनता उनसे प्रभावित क्यों न होगी। यही कारण है कि राम रहीम या रामपाल की गिरफ्तारी में पुलिस-प्रशासन को अड़चनें आईं। अभी आसाराम पर फैसला आने के पहले भी किसी भी किस्म की अराजकता से बचने के लिए जोधपुर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। बलात्कार पीड़िताओं के लिए भले दो आंसू न ढलकें, लेकिन इन ढोंगी बाबाओं के लिए भक्त जैसे प्राण न्यौछावर करने तैयार रहते हैं, उसे देखकर लगता है कि आखिर किस तरह के कपटी, बनावटी समाज में हम रह रहे हैं। और हमारी राजनीति कितनी गलित हो चुकी है।

बीते चार सालों में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जी-तोड़ कोशिश की गई है। लेकिन इन चार सालों में फर्जी बाबाओं के बारे में निंदा के कितने शब्द हिंदुत्व के रक्षकों ने कहे हैं? आखिर अधर्मियों को बचाकर कौन से धर्म की रक्षा की जा सकती है? बात करें आसाराम की, तो उसके पैरों पर झुकने वालों में कई कद्दावर नेता रहे हैं, जो आज रसूखदार पदों पर रहे हैं। सत्ता में बैठे लोगों के सहारे ही आसाराम ने देश के कई राज्यों में जमीनें हड़पीं या जबरन दान में ले ली। विदेशों में भी संपत्ति बनाई। और इन जमीनों पर बने आश्रमों में न जाने कितने किस्म के गैरकानूनी कामों को अंजाम दिया। अगर कुछ पीड़िताएं जान जोखिम में डालकर आसाराम के खिलाफ आवाज न उठातीं तो न जाने कितनी और बच्चियां, युवतियां, महिलाएं उसके आश्रमों में शिकार बनतीं। दरअसल आस्था के नाम पर आसाराम जैसे ठगों ने भारत की जनता का खूब शोषण किया है।

राजनेता भी शायद ऐसा ही चाहते हैं कि जनता की धर्मभीरूता का फायदा उठाते रहें, ताकि उनकी दुकानदारी चलती रही। इसलिए जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन जैसी सुविधाओं से वंचित रखने के नित नए षड्यंत्र हो रहे हैं। कहने को भारत में लोककल्याणकारी सरकार है, लेकिन उसकी नीतियां, योजनाएं चंद बड़े व्यापारिक घरानों के लिए फायदेमंद होती है और शेष जनता को ये लोग खैरात बांटते हैं। दो-तीन रुपए में राशन देकर या थोड़ा बहुत दवाइयां मुफ्त में बंटवाकर ढोल पीटते हैं कि जनता को इतने करोड़ की सौगात दी। अरे भाई, जनता का पैसा आप जनता पर ही खर्च करें तो इसमें वाहवाही किस बाात की है। कई तरह के सुखों-सुविधाओं से वंचित जनता थोड़ी राहत पाने के लिए धर्म की शरण में जाती है और अंधश्रद्धा का शिकार बनती है। आसाराम किस्म के लोग इस अंधश्रद्धा का पूरा लाभ उठाते हैं। अगर जनता को वैज्ञानिक चेतना से संपन्न किया जाए। उसे अपना हक पाने के लिए जागरूक किया जाए। तो शायद उसका शोषण बंद हो। लेकिन फिर अधर्म का व्यापार चौपट हो जाएगा।

विद्यार्थी उत्तीर्ण होने की चिंता में पढ़ाई से ज्यादा पूजा करने में मन लगाता है। गृहणियां पुत्र की इच्छा के लिए व्रत करती है। बेरोजगार नौकरी पाने के लिए टोटके आजमाता है। अगर सरकार इन्हें सामाजिक समस्या मानती तो ऐसी अंधश्रद्धा खत्म होती। लेकिन सरकार फिलहाल महाभारत काल में इंटरनेट और महामानवों की खोज को बढ़ावा देने में लगी है। इन हालात में एक आसाराम को सजा मिल भी गई, तो क्या सैकड़ों अभी अपने आश्रमों में मासूमों का शिकार करने तैयार बैठे हैं।


The Times of India

Asaram’s Fall
The stiff sentence awarded to Asaram for raping a minor girl is an important systemic success after the policing failures in Kathua and Unnao rape cases that needed public outrage to force a course correction. Though the offence was committed in Jodhpur in August 2013 the girl’s parents approached Delhi police, which accepted the complaint, recorded her statement before a magistrate, and used a procedure called Zero FIR – publicised in January that year following the post-Nirbhaya protests – to transfer the case to Jodhpur forcing the police there to arrest Asaram.

Asaram was among the first high profile accused to be booked under the Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO), which became law only a year earlier but was taking time to gain familiarity and acceptance even within the police force. However, Asaram’s case also reveals limitations in the absence of policing reforms. Three witnesses were killed and four others attacked, exposing the lax protection that witnesses receive.
Witnesses turning hostile affect the integrity of the trial and raise questions about the investigation conducted by police. The least police can do is ensure that accused do not intimidate witnesses. Giving truthful witness to a crime should not have to be an act of courage but the fundamental duty of every citizen. That we have to sing the praises of brave witnesses is ironically a stinging indictment of the system’s weaknesses. The rule of law must come first if the state is to gain the upper hand against criminalisation and communalisation of politics.

The likes of Asaram and Gur meet Ram Rahim Singh tur ned their talent for swindling gullible people into a mega industry through generous grants and support from politicians. In turn politicians outsource vote gathering to cult leaders, hoping to garner captive vote banks. This is the source of cult leaders’ power, and why they can get away with dastardly crimes. Thankfully, in this case, Asaram has been brought to book for at least some of them. In the coming days state governments must be vigilant to ensure there is no repeat of the violence witnessed in Panchkula after Ram Rahim’s conviction. It is indeed a great relief that one more rapist, a VIP with political endorsements to boot, has been put away. If conviction rates shoot up, it achieves its own deterrence and pre-empts the need for drastic laws.


The Indian Express

The Confession
At the Aligarh Muslim University on Sunday, responding to a question from a student on Congress complicity in communal violence against Muslims down the years, senior Congress leader and former Union minister Salman Khurshid admitted that “there is blood on our hands”. The controversy that Khurshid’s comments sparked was predictable — and disappointing. The Congress spokesperson rushed to distance the party from its leader, recycling rehearsed pieties about an unassailable Congress virtue: “Everyone must know… the Congress is the only party which has worked towards… carrying all sections of the people together…” The BJP spokesperson seized Khurshid’s statement with glee, calling it an admission of a “dark truth of the Congress”. The response of both his own party and that of its principal opponent lets down the possibilities and openings contained in Khurshid’s remarks. After all, in a country where political parties and players seldom look back to own blame and ask forgiveness, in a public culture which holds up the electoral win or loss every five years as the only day of reckoning, to know right from wrong, Khurshid was joining what seemed to be a frank conversation about the scars of the past that mark the future.

Of course, Khurshid himself may not have entirely intended a radical departure from his party’s congealed position of silence, prevarication and ambivalence on communal violence that day in Aligarh. It can also be said that confessions and admissions are overrated, anyway — that what matters more is whether the processes of law and justice have taken their due course. Having said that, however, the fact that there are so few political apologies for grotesque communal wrongs — be it at Hashimpura 1987, Maliana 1987, Gujarat 2002 or Muzaffarnagar 2013— points to a continuing abdication and absence. There is a concerted attempt, across parties, from Congress to SP to BJP, to paint these incidents as disembodied events in which there are victims but no one is responsible, no one is to be held guilty. In this scenario, Prime Minister Manmohan Singh’s apology in Rajya Sabha in 2005 for the terrible violence against Sikhs in the wake of Indira Gandhi’s assassination in 1984 was rare, though extremely belated. He was apologising, he said, because we cannot rewrite the past, “but as human beings we have the will power and we have the ability to write a better future for all of us”.

Salman Khurshid’s remarks could have nudged his own party and others to look back in order to look ahead. That they have only brought on a war of labels on the eve of the Karnataka election will remain a testament to the lack of courage across parties.


The New Indian Express

The Fight Over Ambedkar and His Words
Think of it as an extension of the tussle unfolding between India’s political blocs, and the social blocs they represent on the ground. The figure in contention is B R Ambedkar, legal scholar, historian, social messiah, trenchant critic of the dharmashastras that underpinned the traditional Hindu society and above all, the prime author and guiding spirit of our Constitution.

If Manu was the lawgiver of classical India, it’s an abiding poetic justice that it fell upon a man who would have been deemed beyond the pale of society in ancient India to write the law for the modern, democratic nation. But who holds the legal rights to the lawgiver and his words? The Centre has announced its intention to reprint the collected works of Ambedkar. The old copyrights would have lapsed since over 60 years have passed after Ambedkar’s death, it says.

Ambedkar’s ideas do need a wider circulation for a generation that is familiar with him only as an iconic presence, not as a living mind who dissected the unique workings of power in India and offered ways out of the morass. But any entity or institution arrogating to itself the right to do so, by virtue of Ambedkar’s specific value for the Dalit movement, also makes a power statement. To say Ambedkar is more than a Dalit messiah and a true national thought leader is accurate, but to use that argument in a proprietorial way may be fraught with risk. Recently, after all, we saw Ambedkar statues in UP being clad in saffron.

The Hindutva ideological stream has some natural incongruence with Babasaheb’s thoughts, and is internally pulled apart by a dual tendency: one away from caste, one towards its default savarna position. Prakash Ambedkar, the holder of his grandfather’s intellectual estate, insists the rights are with Maharashtra state and, since the collected works came out only in the 1970s, the copyright has not lapsed. A bitter fight over the legacy may be inevitable, but more than anything else it’s the right to interpret Ambedkar that is being claimed. Babasaheb may himself have had an opinion on that, and we may guess at it.

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