Home काॅलम आज के हिंदी अखबारों के संपादकीय: 21 मार्च, 2018

आज के हिंदी अखबारों के संपादकीय: 21 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

नेता चाहिए जबर्दस्त

करीब दो दशकों से रूस पर शासन कर रहे हो व्लादीमीर पुतिन ने बतौर राष्ट्रपति छह वर्षों का एक और कार्यकाल हासिल कर लिया है। रविवार को इस पद के लिए हुए चुनाव में उन्हें करीब 77 फ़ीसदी वोट मिले जबकि उनके सबसे करीबी  प्रतिद्वंद्वी पावेल ग्रूदिनिन को 11.83 फीसदी। उनके सबके मुखर विरोधी अलेक्सी नैवलनी को कानूनी आधार पर चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था, लिहाजा पूतिन का जीतना पहले से ही तय माना जा रहा था। बहरहाल, इस विराट जीत ने उन्हें विश्व मध्यप्रदेश के बेहद मजबूत नेता के रूप में दोबारा स्थापित कर दिया है। इससे पहले चीन में राष्ट्रपति शी चिनफिंग दो कार्य काल की समय सीमा समाप्त करवा कर अपने लिए आजीवन राष्ट्रपति बने रहने की राह खुलवा चुके हैं। उनकी इस पहल से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इतने खुश हुए कि कह बैठे, अगर संभव हो तो वह अमेरिका में भी अपने लिए ऐसी ही कोई व्यवस्था करवाना चाहेंगे। कहा जा सकता है कि यह टिप्पणी उन्होंने मजाक में ही की थी, जिसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, लेकिन बतौर राष्ट्रपति उनके कई कदम इस टिप्पणी की गंभीरता की ओर इशारा करते हैं। मजबूत नेता का ट्रेंड इधर पूरी दुनिया में जोर पकड़ रहा है। चीन में तो खैर लोकतंत्र नहीं, एक पार्टी का शासन है। रूस में भी लोकतंत्र को जड़ें जमाने का ज्यादा मौका नहीं मिला है। मगर अमेरिका को तो पिछले ढाई सौ वर्षों से पूरी दुनिया के लिए लोकतंत्र की मिसाल माना जाता रहा है। वहां की तमाम संस्थाएं संवैधानिक से अपना-अपना काम करती आ रही हैं। इसके बावजूद वहां हम एक ऐसा राष्ट्रपति देख रहे हैं, जिसका लोकतांत्रिक तौर-तरीकों में खास यकीन नहीं लगता। जो न केवल प्रेस की स्वतंत्रता का खुलेआम उपहास करता है, बल्कि संवैधानिक पदों पर लोगों को यूं चुटकी बजाते बाहर का रास्ता दिखाता है कि अतीत के शहंशाह भी शरमा जाएं। सबसे बड़ी बात यह कि ऐसा नेता कोई और अलोकतांत्रिक तरीका अपनाकर नहीं बल्कि आम वोटरों का विश्वास जीतकर, उनकी पसंद बनकर एक पद तक पहुंचा है। अन्य देशों में भी आम लोगों के बीच ऐसे मजबूत नेताओं का आकर्षण बढ़ रहा है, जो दुनिया के मंच पर अपना दबदबा कायम करते दिखें। देश की संवैधानिक संस्थाएं मजबूत हों, जनता का शासन में दखल बढ़े, आम लोगों की जीवन दशा बेहतर होती जाए, इस बात का आग्रह जनता के स्तर पर भी लगातार कम हो रहा है। कहना कठिन है कि सत्ता के केंद्रीकरण के इस आग्रह का हर जगह पूंजी और संपदा के अतिशय केंद्रीकरण के साथ कोई रिश्ता है या नहीं। हर जगह ऐसे नेता उभर रहे हैं जो घरेलू और अन्य देशों के बारे में आक्रामक बयान देते हों, जिनकी देहभाषा ऐसी हो कि वे किसी की परवाह नहीं करते और सबको सबक सिखा सकते हैं। इस विश्वव्यापी रुझान के साथ दुनिया कितने दिन शांति से रह पाएगी, देखने की बात है।


 जनसत्ता

त्रासद सच

इराक में पौने चार साल पहले जिन चालीस भारतीय नागरिकों का अपहरण हुआ था, उसकी हकीकत अब सामने आई है कि उनमें से उनतालीस लोग मारे जा चुके हैं। तब एक व्यक्ति अपनी पहचान बदल कर बच निकला था। कट्टरपंथी संगठन आइएस यानी इस्लामिक स्टेट ने इन लोगों की हत्या कर एक गांव में दफना दिया था। सरकार इस खबर पर क्या रुख अपनाती है, यह आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन जिन घरों के नौजवान मारे गए, वे गहरे सदमे हैं। उन तमाम लोगों के परिवार वाले ज्यादा आहत इसलिए हैं कि सरकार ने शुरू में एक तरह से झूठ बोला और इस मसले पर देश को अंधेरे में रखा। अभी तक सरकार कहती आई थी कि इराक में लापता भारतीय सुरक्षित हैं। लेकिन अब डीएनए जांच से इन मौतों की पुष्टि हो जाने के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को राज्यसभा में बयान देकर अगवा भारतीयों के मारे जाने के बारे में बताया। हालांकि लंबे समय से सरकार इस मुद्दे पर घिरी थी। मगर इतने संवेदनशील मामले में उसका अब तक का रवैया हैरान करने वाला है।

सवाल है कि जो तथ्य अब सामने आए हैं, क्या उनके बारे में सरकार को सचमुच पता नहीं था? अब जिस तरह यह मामला सामने आया और समय-समय पर इसकी परतें खुलती गर्इं, उससे स्पष्ट है कि अगवा भारतीयों की हत्या के संकेत सरकार को पहले ही मिल चुके थे। उनमें एक जो शख्स बच निकला था, उसने बताया था कि बाकी लोगों को आइएस ने मार डाला है। हालांकि विदेश मंत्री ने तर्क दिया है कि जब तक नागरिकों की मौत की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक उन्हें मृत घोषित नहीं किया जा सकता था। विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने इराक जाकर वहां भारतीय राजदूत और इराकी अधिकारियों के साथ बैठकें कर खोजबीन का काम किया था। तब बदूश शहर के पास एक कब्र से जो उनतालीस शव और परिचय पत्र, कड़े, लंबे बाल आदि मिले, वे काफी कुछ बताने के लिए पर्याप्त थे। इसके बावजूद पिछले साल जब मारे गए लोगों के परिजन विदेश मंत्री से मिले, तब भी उन्हें यह भरोसा दिया गया था कि अगवा लोग सुरक्षित हैं। ये सारे तथ्य और घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि सरकार शायद सच्चाई को देश के सामने रखने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।

अब विदेश मंत्री का यह कहना भारत सरकार की सीमा को बताता है कि ‘इराक में सबूत जुटाना बहुत ही मुश्किल था। एक निर्मम आतंकी संगठन आइएसआइएस और सामूहिक कब्रें..। शवों का ढेर था। इनमें से अपने लोगों के शवों का पता लगाना, उन्हें जांच के लिए बगदाद भेजना आसान नहीं था’। यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। अगर एक बचा हुआ व्यक्ति सच नहीं बताता कि लोगों को आइएस ने मार डाला है तो सरकार के पास क्या कोई ऐसा तरीका था, जिससे इराक में वह अपने लोगों का पता लगा पाती? इसके अलावा, जब कोई देश खुद गंभीर संकटों से जूझ रहा हो और अपने ही नागरिकों की रक्षा नहीं कर पा रहा हो, तो ऐसे में अपने नागरिकों को वहां जाने से रोकने के हर इंतजाम किए जाने चाहिए। चोरी-छिपे दूसरे देशों में इस तरह जाना इतना आसान नहीं होता। फिर भी अगर लोग कोई गलत रास्ता अख्तियार करके दूसरे देशों में जाते हैं तो उन्हें रोकने के कड़े बंदोबस्त होने चाहिए। या फिर जिन एजेंसियों के जरिए लोग ऐसे देशों में रोजगार के लिए जा रहे हैं, उन पर निगरानी और शिकंजा कसा जाए।


हिन्दुस्तान

भयावह त्रासदी

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के लिए भी यह आसान नहीं रहा होगा। इराक  में काम करने गए 39 भारतीय कर्मचारियों के मारे जाने की खबर उन्होंने कितने भरे मन से दी होगी, इसे समझा जा सकता है। खासकर तब, जब पिछले तकरीबन चार साल से वह इन लोगों के परिजनों और साथ में पूरे देश को सरकार की तरफ से यह आश्वासन दे रही थीं कि इन लोगों को बचा लिया जाएगा। हालांकि जैसे-जैसे समय निकलता जा रहा था, ये आश्वासन भी अपना अर्थ खोते जा रहे थे। ऐसा नहीं है कि भारत सरकार ने इसके लिए कोशिश नहीं की होगी। लेकिन इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने जिस क्षेत्र में यह वारदात की, वहां भारत सरकार तो दूर, उस समय इराक सरकार तक की पहुंच भी नहीं थी। वह ऐसा क्षेत्र था, जहां न भारत की कूटनीति कुछ काम कर सकती थी और न ही भारत की सैन्य ताकत। यहां तक कि उस इलाके में भारत की खुफिया उपस्थिति भी नहीं थी। हालांकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि सरकार इस मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठी थी। इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाले मोसुल इलाके से उसी दौरान भारत ने जिस तरह केरल की नर्सों को मुक्त कराया और उन्हें भारत वापस लाने में सफलता हासिल की गई, वह बताता है कि सरकार इस मसले पर लगातार सक्रिय थी। लेकिन इन 39 लोगों के मामले में यह सक्रियता भी किसी काम नहीं आ सकी। आतंकवादी संगठन ने निर्माण मजदूरों के तौर पर वहां काम करने गए इन लोगों की न  सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उनके शवों को एक सामूहिक कब्र में  दफ्न कर दिया।

यह मामला सिर्फ सरकार के प्रयासों का और उनके अंजाम तक न पहुंच पाने का ही नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और हमारे नौजवानों के बारे में भी काफी कुछ कहता है। खबरों में बताया गया है कि ये सारे नौजवान महज 35 हजार रुपये महीने की नौकरी के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हो गए, और एक ऐसे इलाके में पहुंच गए, जिसे आज भी मौत की घाटी माना जाता है। यह बताता है कि हमारे नौजवानों पर जीवन-यापन के दबाव कितने बड़े हैं और उनके विकल्प कितने सीमित हैं। ऐसे विकल्प कोई जान-बूझकर नहीं, बल्कि मजबूरी में ही चुनता है। यही बात इन 39 लोगों के बारे में भी कही जा सकती है और केरल की उन लड़कियों के बारे में भी, जो नर्स की नौकरी करने के लिए युद्धग्रस्त क्षेत्र जाने को तैयार हो गई थीं।

सरकार अपनी तरफ से लगातार ऐसी चेतावनी जारी करती रहती है कि भारतीयों को कामकाज या नौकरी के सिलसिले में किन क्षेत्रों में जाना चाहिए और किन क्षेत्रों में नहीं। यह काम भी अपने आप में जरूरी है, लेकिन अब लगता है कि सिर्फ इतना ही पर्याप्त नहीं है। सरकार को उन एजेंटों और दलालों पर भी लगाम कसनी होगी, जो युद्धग्रस्त और अशांत क्षेत्रों के लिए नौजवानों की भर्ती करते हैं। यह भी मुमकिन है कि बहुत से मामलों में इन नौजवानों को यह ठीक से बताया ही न जाता हो कि उन्हें किस क्षेत्र में या कैसी जगह पर तैनात किया जाएगा। हालांकि सबसे बेहतर तो यही है कि नौजवानों के लिए देश में ही रोजगार के सम्मानजनक और पर्याप्त अवसर पैदा किए जाएं। जब तक यह नहीं हो सकता, उन्हें किसी भी तरह के खतरे से बचाना समाज और सरकार, दोनों की जिम्मेदारी है। अब जब देश के 39 बहादुर नौजवानों की मौत की खबर हमें मिली है, तो यह संकल्प हमें लेना ही होगा।


अमर उजाला

बांटने वाली राजनीति

कर्नाटक में सिद्धारमैया की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने संबंधी जो प्रस्ताव पारित किया है, वह न केवल राजनीतिक रूप से घातक, बल्कि विभाजनकारी भी साबित हो सकता है। कर्नाटक की आबादी में लिंगायत समुदाय की हिस्सेदारी 17 फीसदी के करीब है और करीब सौ विधानसभा सीटों पर उनका अच्छा-खासा प्रभाव है, लिहाजा इस कदम के राजनीतिक निहितार्थ एकदम स्पष्ट हैं। दरअसल लिंगायत समुदाय में भाजपा की खासी पैठ रही है और उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी एस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से आते हैं। 2008 में पहली बार कर्नाटक में भाजपा ने जब सरकार बनाई थी, तो उसे मिले बहुमत में इस समुदाय के योगदान को अहम माना गया था। दूसरी ओर गिने-चुने राज्यों तक सिमट चुकी कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता को बचाए रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना । चाहती। लेकिन उसने जो रास्ता चुना है, उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। और फिर कर्नाटक मंत्रिमंडल ने जिस नागमोहन कमेटी की सिफारिशों को मंजूर किया है, उसके अमल में आने के लिए न केवल केंद्र की मंजूरी, बल्कि संविधान में संशोधन भी करना होगा। जाहिर है, यह सिर्फ एक राजनीतिक चालाकी के अलावा कुछ और नहीं है, जिसके जरिये कांग्रेस तात्कालिक चुनावी लाभ उठाना चाहती है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लिंगायत समुदाय कर्नाटक में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल है और इस समुदाय के लोगों को वे सारी सुविधाएं मिलती हैं, जो ओबीसी के तहत संविधान में दर्ज हैं। लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदायों में आपस में भी मतभेद हैं, और इनमें ऐसे वर्ग भी हैं, जो एक-दूसरे को भिन्न मानते हैं। 12 वीं सदी के संत बासवेश्वर के अनुयायी लिंगायत खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं और खुद की अलग धार्मिक पहचान चाहते हैं; जाहिर है, यह एक संवेदनशील मसला है, जिस पर व्यापक सहमति बनाने के बाद ही कोई कदम उठाया जाना चाहिए। इसकी आड़ में पहचान की जो राजनीति की जा रही है, उसके घातक परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि आने वाले समय में दूसरे राज्यों से भी भिन्न-भिन्न समुदाय ऐसी मांगों को लेकर मुखर हो सकते हैं।


राजस्थान पत्रिका

नाइक की नजीर

गोवा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शांताराम नाइक को बहुत-बहुत बधाई। नाइक ने वो काम कर दिखाया, जिसकी उम्मीद भारतीय राजनेताओं से तो की ही नहीं जा सकती। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण से प्रभावित होकर नाइक ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे डाला। इसलिए ताकि राहुल की सोच के अनुसार कोई युवा गोवा प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाल सके। नाइक की उम्र अभी 72 साल है। उनसे बड़ी आयु के अनेक राजनेता संसद से लेकर विधानसभाओं और पार्टी संगठनों में सक्रिय हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में मोतीलाल वोरा (89), मनमोहन सिंह (85) और एंटनी (77) सरीखे बुजुर्ग नेता सक्रिय हैं। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी (89) और अकाली दल में प्रकाश सिंह बादल (89) अब भी राजनीति में सक्रिय हैं। अन्य दूसरे दलों में भी 80 साल से अधिक आयु के अनेक नेता महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। लाख टके की बात ये है कि अपनी मर्जी से कोई नेता पद छोड़ना नहीं चाहता। ऐसे दौर में नाइक के पद त्याग को एक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है।
भारतीय राजनीति में 72 साल की उम्र कोई मायने नहीं रखती। नाइक ने अपने नेता के विचारों को महत्व देने के लिए दूसरे नेताओं के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय तथ्य ये है कि नाइक को आठ महीने पहले ही गोवा प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। देखने में आता है कि हर राजनीतिक दल युवाओं को आगे लाने की बात तो करते हैं लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं देते। कांग्रेस के महाधिवेशन में राहुल गांधी ने संगठन में युवाओं को महत्व देने की बात की है। ये तो भविष्य बताएगा कि राहुल अपनी बात को कितना महत्व देते हैं लेकिन नाइक ने अपनी पार्टी के साथ-साथ दूसरे दलों के बुजुर्ग नेताओं पर मानसिक दबाव जरूर बना दिया है। इस दबाव के बहाने ही सही बुजुर्ग नेता यदि युवाओं के लिए जगह बनाते हैं तो ये भारतीय राजनीति के लिए अच्छा होगा। अच्छा तो यही हो कि देश की संसद ही एक कानून पारित करे जिसमें चुनाव लड़ने की अधिकतम आयु तय हो। राजनीतिक दलों में काम करने वाले पदाधिकारियों की अधिकतम उम्र भी निर्धारित की जानी चाहिए।


दैनिक भास्कर

सिद्धारमैया की उदार सोशल इंजीनियरिंग का जोखिम

कर्नाटक के कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आगामी चुनाव में भाजपा का मुकाबला करने के लिए लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश करके जोखिम भरा दांव खेला है। न्यायमूर्ति नागामोहन दास की रिपोर्ट को आधार बनाकर सिद्धारमैया मंत्रिमंडल ने यह सिफारिश केंद्र को भेजकर भाजपा का सिरदर्द बढ़ा दिया है। वजह साफ है राज्य में 17 प्रतिशत आबादी वाला लिंगायत समुदाय विधानसभा की 224 में से करीब 100 सीटों को प्रभावित करता है, जो भाजपा का परंपरागत समर्थक माना जाता है। भाजपा के राज्य अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा और दूसरे प्रमुख नेता जगदीश शेट्‌टार भी लिंगायत हैं। भाजपा लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक मानने का विरोध करती रही है। दक्षिण के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और केरल तक फैले इस समुदाय की वर्चस्वशाली जाति वीरशैव भी अल्पसंख्यक दर्जे के विरुद्ध रही है। राज्य सरकार ने न सिर्फ लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक माना है बल्कि वीरशैवों को भी उनके समुदाय का हिस्सा माना है। इसलिए यह फैसला भाजपा के परंपरागत मतदाताओं में विभाजन पैदा करेगा और कांग्रेस को उम्मीद है कि उसे इसका लाभ मिलेगा। कुल 92 उपजातियों में बंटे लिंगायत समुदाय में इस बात पर अंतर्संघर्ष चल रहा है कि 12वीं सदी के उनके धर्मगुरु बसवन्ना की असली शिक्षाएं क्या हैं। बसवन्ना जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के साथ ब्राह्मणवादी संस्कारों के विरुद्ध थे। लिंगायतों का कहना है कि आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर काबिज वीरशैव बसवन्ना की शिक्षाओं के विरुद्ध उन पर ब्राह्मणवादी संस्कार लाद रहे हैं। बसवन्ना शिव के उपासक थे लेकिन, उनके शिव हिंदू धर्म के शिव से भिन्न हैं। ताराचंद और हुमायूं कबीर जैसे विद्वानों ने शव को दफनाने वाले लिंगायतों पर हिंदू धर्म से ज्यादा इस्लाम का प्रभाव देखा था। हालांकि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में उसे खारिज करते हुए इसे बौद्ध और संत परंपरा से जोड़ा था। ऊपर से देखने पर कांग्रेस का यह फैसला भले ही वोट की राजनीति से प्रेरित लगे लेकिन, आंतरिक रूप से यह भारतीय समाज की उदार परंपरा को वैधता देने वाला एक कदम है। देश की उदार और क्रांतिकारी परंपराओं पर प्रहार और अनुदार परंपराओं की स्थापना में लगी भाजपा के समक्ष यह निर्णय दुविधा और चुनौती पैदा करने वाला है।


दैनिक जागरण

कठोर कानून में सुधार

एक अर्से से यह महसूस किया जा रहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति प्रताड़ना निवारण अधिनियम अर्थात एससी-एससी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है, लेकिन इस बारे में सरकार के स्तर पर कोई पहल इसलिए नहीं हो पा रही थी कि कहीं उसकी मनमानी व्याख्या करके उसे राजनीतिक तूल न दे दिया जाए। इन स्थितियों में इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया था कि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करके कुछ ऐसे उपाय करता ताकि यह अधिनियम बदला लेने का जरिया बनने से बचे। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि प्रताड़ना की शिकायत मिलते ही न तो तत्काल उसे एफआइआर में तब्दील किया जाएगा और न ही आरोपित की तुरंत गिरफ्तारी होगी। उसने यह भी स्पष्ट किया कि न केवल आरोपित सरकारी कर्मचारियों, बल्कि आम नागरिकों के खिलाफ भी सक्षम पुलिस अधिकारी की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। ऐसा कोई प्रावधान केवल इसलिए आवश्यक नहीं था कि एससी-एसटी एक्ट को बेजा इस्तेमाल किया जा रहा था, बल्कि इसलिए भी था, क्योंकि कानून का तकाजा भी यही कहता है। इस एक्ट का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा था, यह इससे समझा जा सकता है कि अकेले 2016 में दलित प्रताड़ना के 5347 मामले झूठे पाए गए। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग जातीय विद्वेष बढ़ाने का काम कर रहा था। कानून के शासन की प्रतिष्ठा के लिए जहां यह जरूरी है कि अपराधी बचने न पाएं वहीं यह भी कि निदरेष सताए न जाएं। यह भी अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि एससी-एसटी एक्ट के तहत अभियुक्त को जमानत दिया जाना भी संभव है। जमानत पाने की राह साफ करने की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि अपने देश में पुलिस की जांच और अदालती कार्यवाही में देरी किसी से छिपी नहीं। कई बार यह देरी आरोपित व्यक्तियों को बहुत भारी पड़ती है।1एससी-एसटी एक्ट की अनावश्यक कठोरता को कम करके सुप्रीम कोर्ट ने इसे दमनकारी कानून का पर्याय होने से बचाया है। बेहतर हो कि इस तरह के अन्य कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा की जाए जो अपनी कठोरता के कारण दमनकारी कानून कहे जाने लगे हैं और जिनका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी हो रहा है। इसमें संदेह है कि यह काम सरकार कर सकती है, क्योंकि विपक्षी दल संकीर्ण राजनीतिक लाभ के फेर में उसे संबंधित वर्ग या समुदाय का बैरी करार दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद किसी को भी इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने का काम किया गया है। पुलिस और राज्य सरकारों के साथ ही राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज के उन तत्वों का दुस्साहस न बढ़ने पाए जो अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रताड़ित करते रहते हैं। एससी-एसटी एक्ट का अस्तित्व यही बताता है कि भारतीय समाज को जातीय द्वेष की भावना से मुक्त होना शेष हैं। इसमें दोराय नहीं कि एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा था, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि दलितों और जनजातियों के उत्पीड़न के मामले सामने आते ही रहते हैं।


प्रभात खबर

योजनाओं पर ग्रहण

विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाना कई कारकों पर निर्भर करता है. समुचित धन की कमी, संबंधित संस्थाओं में तालमेल का अभाव, तकनीकी और वित्तीय मदद का ठीक से हासिल न होना, कमजोर राजनीतिक संकल्प-शक्ति तथा नौकरशाही की लापरवाही परियोजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में बाधक होते हैं.

शहरी विकास, स्वच्छता तथा आवास से जुड़ी महत्वपूर्ण योजनाएं इन्हीं अवरोधों का सामना कर रही हैं. संसद की स्थायी समिति (शहरी विकास) की रिपोर्ट के मुताबिक छह महत्वाकांक्षी परियोजनाओं- अमृत (पेयजल आपूर्ति और नालियों का निर्माण), हृदय (ऐतिहासिक धरोहरों को केंद्र में रखकर शहरी विकास), स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय शहरी जीविका मिशन तथा प्रधानमंत्री आवास योजना में धन की कमी और उपलब्ध धन के इस्तेमाल में ढीलापन से निर्धारित अवधि में लक्ष्य हासिल कर पाने की संभावना नहीं है.

इन छह योजनाओं के लिए करीब साढ़े 48,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गयी थी, पर अभी तक 36 हजार करोड़ रुपये से कुछ अधिक राशि ही जारी हुई है. उसमें से भी मात्र 21.6 फीसदी (7850.72 करोड़ रुपये) ही खर्च हो सका है. रिपोर्ट में स्मार्ट सिटी मिशन के क्रियान्वयन की आलोचना करते हुए कहा गया है कि शहरी विकास की शेष योजनाओं की तुलना में स्मार्ट सिटी मिशन की गति ज्यादा धीमी है.

इसके लिए अब तक 9943 करोड़ रुपये जारी हुए हैं, पर खर्च महज 1.83 फीसदी (182 करोड़ रुपये) ही हुआ है. स्थायी समिति की रिपोर्ट से असहमत सरकार का तर्क है कि खर्च हुई राशि के आधार पर क्रियान्वयन की गति का आकलन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि खर्च का पक्का हिसाब योजना पूरी होने पर ही किया जा सकता है और इस बाबत परियोजनाओं के प्रबंधक प्रमाणपत्र जारी कर दें. तकनीकी तौर पर यह तर्क सही है.

किसी परियोजना का क्रियान्वयन कर रही कंपनी को पूरा भुगतान अंतिम तौर पर काम की समाप्ति के बाद ही होता है. लेकिन, यह जानना भी जरूरी है कि कोई विकास योजना चरणबद्ध तरीके से पूरा हो रही है या नहीं. योजना के अंतर्गत नियत लक्ष्य को तय समय सीमा के भीतर हासिल करने के लिहाज से समय-समय पर आकलन और अंकेक्षण भी जरूरी है. अंकेक्षण (ऑडिट) का एक प्रचलित तरीका है योजना पर खर्च की गयी वास्तविक राशि को मूल्यांकन का आधार बनाना. भारत में शहरीकरण की गति बहुत तेज है.

तकरीबन 32 प्रतिशत आबादी अब शहरों में रहती है. इसमें बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो बेहतर शिक्षा, रोजगार और सुविधाओं के लिए शहरी इलाकों में बसना निश्चित करते हैं. ऐसे लोगों में अधिकतर बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. इस वंचना का समाधान मानव विकास के लिहाज से देश के सामने एक चुनौती है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि आनेवाले महीनों में केंद्र सरकार बेहतर प्रबंधन और पूंजी उपलब्धता के जरिये महत्वाकांक्षी योजनाओं के अमल में आ रही बाधाओं को दूर करने के कदम उठायेगी.


 देशबन्धु

हताश युवा, अंधकारमय भविष्य

देश का प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू इस वक्त एक गंभीर विवाद से गुजर रहा है। यहां स्कूल आफ लाइफ साइंसेज के एक प्रोफेसर अतुल जौहरी पर कुछ छात्राओं ने यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया है। पहले एक छात्रा ने कथित अभद्रता की शिकायत की, उसके बाद कुछ और छात्राएं भी अपनी शिकायतों के साथ सामने आईं। इन आरोपों से प्रोफेसर जौहरी इन्कार करते हैं और उनका कहना है कि अटेंडेंस मामले में विश्वविद्यालय की सख्ती से बचने के लिए उन पर छात्राओं ने ये इल्जाम लगाए हैं। इस प्रकरण में सच का पता निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है। लेकिन फिलहाल जो स्थिति है, उससे यही लग रहा है कि जेएनयू प्रशासन जांच और कार्रवाई की इच्छा ही नहीं रखता है। कोई भी संस्थान हो, अगर वहां यौन उत्पीड़न जैसी गंभीर शिकायत कोईर् महिला करती है, तो न्याय का पहला तकाजा यही है कि आरोपी को जांच पूरी होने तक वहां से दूर किया जाए, तााकि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल शिकायतकर्ताओं पर न कर सके।  इस मामले में दिल्ली पुलिस ने आखिरकार अतुल जौहरी को गिरफ्तार कर लिया है, वही बाद में उन्हें कोर्ट से जमानत भी मिल गयी है।

इधर जेएनयू के एक अन्य प्रोफेसर कदम ने 17 छात्रों के खिलाफ यह एफआईआर दर्ज करवाई है कि छात्रों ने प्रदर्शन के दौरान उनसे दुर्व्यवहार किया। बहरहाल, शिकायतकर्ता छात्राओं के साथ खड़े छात्रसंघ ने आरोप लगाया है कि विवि प्रशासन ने छात्राओं से बंद कमरे में पूछताछ की और इस दौरान किसी को उनसे मिलने नहीं दिया गया। यह आरोप भी है कि बंद कमरे में शिकायतकर्ताओं पर शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया।

गौरतलब है कि अभी तक इस तरह के मामलों में जेएनयू के छात्र विवि के भीतर की एक संस्था जीएसकैश (जेंडर सेंसेटाइजेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्युअल हैरेसमेंट) में शिकायत दर्ज करवाते थे, लेकिन वर्तमान जेएनयू प्रशासन ने जीएसकैश जैसी मजबूत संस्था को भंग करके एक इंटरनल कंप्लेन कमिटी (आईसीसी) का गठन कर दिया। इसके सभी सदस्य प्रशासन द्वारा चुने होते हैं जबकि जीएसकैश के सदस्य मनोनीत और निर्वाचित दोनों होते थे और इसमें जेएनयू के छात्रों, शिक्षकों के साथ-साथ कर्मचारियों और अधिकारियों के भी प्रतिनिधि होते थे। इसमें हर केस की सुनवाई के लिए एक खास प्रक्रिया और नियमों का पालन होता था। इस वजह से कोई छात्र, कर्मचारी या शिक्षक बेझिझक इसमें जाकर अपनी शिकायतों और दिक्कतों को बताते थे।

प्रशासनिक व्यवस्था में कौन सी समिति बनानी है, कौन सी भंग करनी है, यह जेएनयू प्रशासन का अधिकार है, लेकिन उसे कम से कम यह ध्यान तो रखना चाहिए कि व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें किसी को पक्षपात महसूस न हो। अभी तो यह साफ नजर आ रहा है कि छात्रों की शिकायतों को अनुशासनहीनता करार देना ही प्रशासन की प्राथमिकता है। एक प्रोफेसर पर, जिस पर अध्यापन के साथ-साथ कई और प्रशासनिक जिम्मेदारियां हैं, अगर यौन शोषण का गंभीर आरोप है, तो उसे पहले ही निलंबित कर देना चाहिए था। प्रो. अतुल जौहरी को प्रशासन के करीब माना जाता है, अटेंडेंस मामले में उन्होंने खुलकर जेएनयू प्रशासन के फैसले का पक्ष लिया था। ऐसे में यह संदेह उपजना स्वाभाविक है कि प्रशासन उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा है। इस मामले को भाजपा बनाम वामपंथ की राजनीति में घसीटने की कोशिश भी हो रही है, जो दर्शाता है कि कैसे एक बेहतरीन शैक्षणिक संस्थान को धीरे-धीरे बदनाम किया जा रहा है।

जेएनयू के इस गंभीर मसले का हल अभी निकला नहीं है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्राओं ने अपनी मांगों के लिए आवाज उठाई। यहां की छात्राएं अपने छात्रावासों के बाहर निकलने के समय, खाने की खराब गुणवत्ता के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं। छात्राओं की मांग है कि लड़कों की तर्ज पर लड़कियों को भी रात को छात्रावास से बाहर निकलने की आजादी होनी चाहिए। यहां लड़कियों के हॉस्टल का गेट रात आठ बजे बंद कर दिया जाता है। जिसके कारण कैंपस में लैब, सेमिनार आदि में छात्राएं भाग नहीं ले पाती हैं, क्योंकि हॉस्टल से देर शाम लेट होने पर आवेदन लिखवाने के साथ अभिभावकों को जानकारी दी जाती है। छात्राओं का कहना है कि हम विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आए हैं, इस पर हम  पर पाबंदियाँ लगाना गलत है। देश की राजधानी दिल्ली अभी कुछ दिनों से एसएससी पेपर लीक मामले में भी हजारों छात्रों का विरोध प्रदर्शन देख रही है।

जिसमें अन्ना हजारे से लेकर राहुल गांधी तक सब छात्रों के बीच पहुंच गए, लेकिन मोदी सरकार अब भी उनकी नाराजगी दूर करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। इधर मंगलवार सुबह देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कई ट्रेनें हजारों छात्रों के प्रदर्शन के कारण थम गईं, लाखों यात्री फंस गए और चार-पांच घंटे बाद छात्रों को पटरियों से हटाया जा सका। ये नौजवान नौकरी की मांग लेकर पटरियों पर बैठे थे। दरअसल रेलवे में अप्रेंटिस छात्रों पक्की नौकरी को लेकर प्रदर्शन करने मजबूर हो गए। रेलवे ने 20 पर्सेंट सीटें अप्रेंटिस कर चुके छात्रों के लिए आरक्षित की हैं। जबकि छात्रों की मांग है कि इस 20 पर्सेंट की सीमा को हटाएं। हजारों छात्र सुबह-सुबह पटरियों पर बैठ गए और इनके इक_ा होने की खबर सरकार को नहीं हुई, इससे बड़ी प्रशासनिक लापरवाही और क्या होगी?

दिल्ली से मुंबई तक परीक्षा, नौकरी, लैंगिक समानता और सुरक्षा इन तमाम मुद्दों पर देश के नौजवान आक्रोशित होकर सड़कों पर हैं और मोदी सरकार को युवाओं की यह हताशा नजर नहींआ रही है। हर भाषण में नरेन्द्र मोदी भारत की युवा शक्ति के गीत गाते हैं। पर इस कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि ऐसे निराश, हताश, परेशान युवाओं से देश का भविष्य कैसा बनेगा? प्रधानमंत्री युवाओं की नहीं सुन रहे, पाल क्रूगमैन की तो सुन लें।