Home काॅलम आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 14 मार्च, 2018

आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 14 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

डिनर पार्टी की राजनीति

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी द्वारा अपने आवास 10, जनपथ पर 17 विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधियों को दी गई डिनर पार्टी स्वाभाविक ही चर्चा में है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद भले छोड़ दिया हो, पर वह न केवल कांग्रेस संसदीय दल की बल्कि यूपीए की चेयरपर्सन भी हैं। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने के बाद यह पहला मौका है जब सोनिया गांधी की तरफ से एक बड़ी राजनीतिक पहल की गई है। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि यह डिनर पार्टी 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले विपक्ष की तमाम पार्टियों के बीच एकजुटता लाने, उनमें सहयोग और समन्वय की भावना मजबूत करने की एक कवायद है। इस दावत में शामिल होने को लेकर कई विपक्षी दलों के नेताओं में जो असमंजस दिखता रहा, उसके पीछे भी वजह यही है। कोई कुछ कहे या न कहे, समझ सभी रहे हैं कि यह बीजेपी विरोधी राजनीति के केंद्र में कांग्रेस को स्थापित करने की कोशिश है। चूंकि इसी के समानांतर एक गैर-बीजेपी गैर-कांग्रेस मोर्चा बनाने की कोशिशें भी जारी हैं, इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों को बहुत सोच-समझ कर आगे बढ़ना होगा। ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय स्तर पर कांग्रेस को अपना चुनावी प्रतिद्वंद्वी मानती हैं। ऐसे में उनका यह डर स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से नजदीकी कहीं उन्हें अपने वोटरों की नजर में संदिग्ध न बना दे। जहां तक बीजेपी या एनडीए से दूरी दिखाने का सवाल है तो मुस्लिम वोट खींचने के लिए इन दलों को यह जरूरी लगता है। लेकिन वह काम तीसरा मोर्चा बनाने से भी हो जाता है। ऐसे में कांग्रेस को बीच में क्यों लाया जाए? बीजेपी या एनडीए का विरोध करने की जिम्मेदारी इस तीसरे मोर्चे के बैनर तले अपने-अपने इलाकों में खुद ये दल ही क्यों न करें? इससे बीजेपी का विरोध भी हो जाएगा और कांग्रेस के मजबूत होने का डर भी निकल जाएगा। दिलचस्प है कि ये दोनों विरोधी राजनीतिक प्रक्रियाएं साथ-साथ चल रही हैं। कहा जा रहा है कि चूंकि कांग्रेस कमजोर नजर आ रही है, इसलिए तीसरे मोर्चे की कवायद अपने आप जोर पकड़ती जा रही है। लेकिन इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस को कमजोर ही रखने के लिए तीसरे मोर्चे को परवान चढ़ाया जा रहा है। मामले का तीसरा पहलू यह है कि लोकतंत्र में सब कुछ पार्टियों के हाथ में नहीं होता। कुछ बातें जनता के हाथ में भी होती हैं। इन राजनीतिक गोलबंदियों का संभावित आकार भी अंतिम रूप से इसी बात पर निर्भर करेगा कि जन-दबाव की दिशा क्या रहती है। डिनर पार्टी की अपनी अहमियत है। ऐसी पहलकदमियां विपक्षी दलों में तालमेल बनाए रखने में मददगार होती हैं। लेकिन कांग्रेस को अगर विपक्षी खेमे का नेतृत्व अपने पास बनाए रखना है तो यह काम वह जन आंदोलनों के साथ जाकर ही कर पाएगी।


जनसत्ता

तपेदिक की चुनौती

सरकार ने आठ साल के भीतर यानी सन 2025 तक भारत से तपेदिक (टीबी) का खात्मा कर देने का जो संकल्प किया है, वह अगर जमीन पर उतर सका तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए वरदान साबित हो सकता है। यों इस मसले पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, लेकिन हर साल लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए जरूरी है कि तपेदिक के खात्मे की दिशा में सरकार अब संजीदगी से काम करे। देश से तपेदिक का नामोनिशान मिटाने के लिए प्रधानमंत्री ने रणनीतिक योजनाओं के अमल पर जोर दिया है, साथ ही राज्य सरकारों को भी हिदायत दी है कि इस अभियान को कामयाब बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाए। यह वाकई गंभीर बात है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत में तपेदिक जैसी बीमारी से हर साल लाखों लोग मर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने खुद माना। कि तपेदिक पर रोक लगाने के लिए अब तक जो कुछ हुआ, उसमें कामयाबी हासिल नहीं हुई। यह नाकामी हमारी व्यवस्था में खामियों का नतीजा है, जिसकी वजह से आज भी आमजन तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि तपेदिक के खात्मे का अभियान कैसे कामयाब हो पाएगा?

दुनिया में तपेदिक के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के एक चौथाई से ज्यादा तपेदिक मरीज भारत में हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है, फिर भी वहां तपेदिक के मरीजों की संख्या हमसे एक तिहाई कम है। 2015 में भारत में तपेदिक से तकरीबन पांच लाख लोगों की मौत हुई थी। इसी साल इस बीमारी के अट्ठाईस लाख नए मामले सामने आए। डब्ल्यूएचओ के सर्वे और आंकड़े के मुताबिक भारत में तपेदिक अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ी महामारी है। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट-2016 पर नजर डालें तो दुनिया में तपेदिक के जो एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आए, उनमें चौंसठ फीसद मामले भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, चीन और दक्षिण अफ्रीका के थे और इनमें भारत शीर्ष पर था। मामला कुल मिला कर गंभीर और हैरान करने वाला इसलिए है कि हर साल इतनी बड़ी तादाद में लोगों के तपेदिक से मरने और लाखों नए मरीज सामने आने के बावजूद हम इस महामारी से निपट पाने में पूरी तरह अक्षम साबित हुए हैं।
तपेदिक कोई ऐसी लाइलाज बीमारी या महामारी नहीं है जिस पर काबू न पाया जा सके। पोलियो, चेचक जैसी महामारियों तक का सफाया हो सकता है तो फिर तपेदिक का क्यों नहीं? लेकिन बीमारी से भी बड़ी समस्या उस बीमार तंत्र और व्यवस्था से जुड़ी है, जिसे इस महामारी को मिटाना है। शहरों और महानगरों में कूड़े-कचरे के पहाड़ इस बीमारी को फैला रहे हैं। वायु प्रदूषण इस बीमारी के प्रमुख कारणों में एक है। आंकड़े तो अस्पतालों में दर्ज हो चुके मरीजों की । तादाद बताते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी तादाद उन मरीजों की है जो अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। भारत में एक और खतरनाक पहलू सामने आया है। अब ऐसे तपेदिक मरीजों की तादाद भी बढ़ रही है। जो एचआइवी से ग्रस्त हैं। इसलिए ऐसे मरीजों तक पहुंच बनाने के लिए सरकारी मशीनरी को पहल करनी पड़ेगी। खासतौर से देश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के साथ शहरों की झुग्गी बस्तियों को निगरानी के दायरे में लाना होगा। अगर तपेदिक को मिटाने का संकल्प पूरा करना है तो पल्स पोलियो अभियान का आदर्श सामने रखना होगा और घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करना होगा।


हिन्दुस्तान

सांसत में हवाई उड़ान

तो क्या मान लिया जाए कि बीते कुछ महीनों से हम अपनी उड़ान सेवा कंपनियों की अराजकता और ईश्वरीय सत्ता के भरोसे हवाई यात्र कर रहे थे, जिसे विराम सोमवार की उस अचानक घटी घटना के बाद मिला, जब इंडिगो के एक विमान का इंजन अचानक हवा में खराब हो गया और उसे अहमदाबाद में इमरजेंसी लैंडिंग करानी पड़ी। बीते दो सप्ताह में उड़ान के दौरान इंजन में खराबी की यह तीसरी घटना थी, जिसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि सब कुछ जानते-बूझते विमानन कंपनियां आखिर लोगों की जिंदगियों से खिलवाड़ कैसे कर सकती हैं? क्योंकि इससे पहले 5 मार्च को इंडिगो की मुंबई उड़ान और 24 फरवरी को गो एयर की लेह उड़ान में भी ऐसी ही मुश्किल आ चुकी थी। यह तो अच्छा हुआ कि देर से ही सही, सोमवार की घटना पर नागरिक विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) को अचानक होश आ गया और उसने पैट एंड विटनी इंजन वाले 11 ए-320 नियो विमान तत्काल खड़े करा दिए, जिनमें से आठ विमान इंडिगो और तीन गो एयर के हैं। अचानक उठाए गए कदम का नतीजा था कि तमाम उड़ानें रद्द हुईं और हजारों यात्री हवाई अड्डों पर फंसकर रह गए। कहने में हर्ज नहीं कि यदि सस्ती उड़ान सेवा देकर जनता की फ्लाइट कहलाने और सबसे ज्यादा उड़ान भरने का दम भरने वाली एयर लाइंस ने अतीत से सबक लिया होता, तो इस स्थिति से बचा जा सकता था। अब एयर लाइंस चाहे जितनी सफाई दे कि उसकी उड़ानें रद्द नहीं हुईं, लेकिन कोई तर्क संतुष्ट नहीं करता कि आखिर खड़े किए गए 11 विमानों के यात्री कहां गए होंगे और उड़ानों को लेकर अचानक इतनी अफरा-तफरी यूं ही तो नहीं मची होगी। सिर्फ अनुमान भी लगाएं, तो एक एयरक्राफ्ट हर दिन कम से कम सात से आठ उड़ानें भरता है और अगर 11 एयरक्राफ्ट अचानक खड़े हो गए, तो मान लेना चाहिए कि कम से कम अस्सी से नब्बे उड़ानें तो रद्द हुईं ही। एयर लाइंस इसे तकनीकी मामला मान रही हैं। हम भी मान लेते हैं कि यह महज तकनीक का मामला होगा और यह भी कि रफ्तार की राह में तकनीकी रोड़े आते ही रहते हैं। यह भी अच्छा है कि डीजीसीए लगातार सक्रिय है और उड़ानों पर उसकी पैनी नजर है। वह अपनी पीठ ठोक सकता है कि कुछ अप्रिय होने से पहले ही इतना बड़ा फैसला लेकर उसने बड़ा काम किया है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल भी है कि जब कुछ ही दिन पहले दो बार और बीते साल में भी कई बार ऐसी ही खराबी के कारण कई विमान उड़ान से हटाने पड़े थे, तब ही यह पीठ ठोकू फैसला क्यों नहीं कर लिया गया? हमारे देश में विमानन कंपनियों का हाल वैसे भी बहुत अच्छा नहीं है। इनकी मनमानी, खराब सेवा, स्टाफ के बर्ताव की शिकायतें आम हैं। यात्रियों से अशालीन व्यवहार और मार-पीट जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं और प्राय: संतोषजनक कारवाई होती नहीं दिखती। समय आ गया है, जब विमानन कंपनियां और डीजीसीए जैसी जिम्मेदार संस्थाएं इस सबको गंभीरता से लें और यात्रियों को बार-बार होने वाली ऐसी अराजकता से निजात दिलाएं। सच यही है कि अगर यह छोटा मामला होता, तो एक साथ इतने विमान खड़े करने का फैसला तो न ही लेना पड़ता। यह तकनीक से आगे दुश्वारियों से नजर फेरकर उन्हें खतरनाक अंजाम तक पहुंचाने वाली लापरवाही का मामला भी है।


अमर उजाला

जमीन घोटाले की आंच

हरियाणा की पिछली सरकार द्वारा मानेसर जमीन अधिग्रहण रद्द करने के मनमाने फैसले को पलटकर सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को करारा झटका दिया है, बल्कि अब उस मामले में सीबीआई की कार्रवाई के गति पकड़ने की भी उम्मीद पैदा हुई है, जो पहले ही इस सिलसिले में अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। शीर्ष अदालत ने पूर्ववर्ती हुड्डा सरकार के उस फैसले फैसले उस फैसले फैसले पूर्ववर्ती हुड्डा सरकार के उस फैसले फैसले उस फैसले फैसले पर जैसी तीखी टिप्पणियां की हैं, वही इस मामले की गंभीरता के बारे में बताने के लिए काफी है। दरअसल बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए हुड्डा सरकार ने मानेसर और पास के गांव की जमीनों के अधिग्रहण के लिए अगस्त, 2004 में अधिसूचना जारी की और फिर बाद में अधिसूचना रद्द कर दी थी। उस दौरान बिल्डरों ने किसानों की बेशकीमती जमीन कम दाम में खरीदकर ऊंचे दामों पर बेच दी। बिल्डरों और सरकारी तंत्र की इस मिलीभगत के खिलाफ किसान अदालत में गए, क्योंकि अधिग्रहण का डर दिखाकर उनकी जमीन औने-पौने दाम में खरीद ली गई थी। किसान को जिस जमीन के लिए प्रति एकड़ कुछ लाख रुपये मिले, उसी जमीन को बिचौलियों ने आगे बेचकर लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये कमाए! यह सीधे-सीधे सरकारी तंत्र और बिल्डरों के बीच मिलीभगत का खेल था, क्योंकि बिल्डर जानते थे कि जमीन अधिग्रहण की अधिसूचना रद्द होने वाली है। यह किसानों की बेशकीमती जमीन की लूट का ज्वलंत उदाहरण है, जिसमें सत्ता सहभागी बनी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फैसला पलट देने के बावजूद बेशक किसानों को उनकी जमीन अब वापस नहीं मिलेगी, लेकिन इस फैसले से यह भरोसा तो मजबूत हुआ है कि सत्ता का दुरुपयोग करने वाले भी बख्शे नहीं जाएंगे, चाहे वे कितने भी ऊंचे रसूख वाले क्यों न हों। अदालत ने जहां अधिसूचित जमीन और उन पर बिल्डरों द्वारा बनाए गए ढांचे को कब्जे में लेकर हुडा/एचएचआईआईडीसी को सौंपने का प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है, वहीं उच्च न्यायालय में इससे जुड़े मामले को छह महीने में निपटाने तथा सीबीआई को हरेक लेन-देन और बिचौलियों की भूमिका की गहराई से जांच करने के लिए कहा है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद अब पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा की मुश्किलें तो बढ़ने वाली हैं ही, इस मामले से जुड़े दूसरे लोग और अधिकारी भी बख्शे नहीं जाएंगे।


दैनिक भास्कर

हथियारों के आयात में अव्वल रहना भी चिंता का कारण

दुनिया के हथियारों का सर्वाधिक 12 प्रतिशत हिस्सा आयात करके भारत का पहले स्थान पर आना आश्वस्त भी करता है और चिंता भी बढ़ाता है। आश्वस्त इसलिए करता है, क्योंकि भारतीय सेना के पास आधुनिक हथियारों और गोला बारूद की कमी की शिकायत उस समय जोरदार तरीके से की गई थी, जब मौजूदा रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने कार्यभार संभाला था। तब सरकार पर दबाव था कि वह रक्षा सौदों की पारदर्शिता के लिए देश की सुरक्षा के साथ समझौता न करे। इसलिए अगर भारत ने अपनी सुरक्षा आवश्यकता पूरी करने के लिए 2013 से 2017 के बीच वैश्विक शस्त्र आयात में 12 प्रतिशत भागीदारी की है और पिछले दस सालों में इस मोर्चे पर 24 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की है तो इससे यह साबित होता है कि एक राष्ट्र के रूप में हम कितने चौकस हैं। हालांकि, इससे यह भी साबित होता है कि हमारा पड़ोस हमें असुरक्षित करता है और तनाव देने के साथ हथियारों की होड़ पर मजबूर करता है। जाहिर सी बात है कि जिस देश के चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हों वह निश्चिंत होकर नहीं बैठ सकता। विडंबना यह है कि इस दौरान चीन और पाकिस्तान के हथियार आयात में क्रमशः 19 प्रतिशत और 36 प्रतिशत गिरावट आई है। चीन तो अपने हथियार स्वयं बना रहा है और वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार को निर्यात भी कर रहा है जबकि मेक इन इंडिया के तमाम दावों के बावजूद भारत अभी भी हथियारों का उत्पादन शुरू नहीं कर पाया है। स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की तरफ से जारी आंकड़े उन आलोचकों का भी मुंह बंद करते हैं जो रूस से बढ़ती दूरी और अमेरिका से नज़दीकी को मुद्‌दा बनाते हैं। आज

भी भारत का 62 प्रतिशत शस्त्र आयात रूस से ही होता है भले ही पिछले पांच वर्षों में अमेरिका से हथियारों का आयात बढ़कर 15 प्रतिशत तक आया है। आंकड़े दर्शाते हैं कि किस तरह एशिया और अफ्रीका के देश हथियार खरीद रहे हैं और अमेरिका और यूरोप के देश उन्हें बनाने-बेचने में लगे हैं। वे अपनी शांति और समृद्धि के लिए इधर अशांति निर्यात कर रहे हैं। अब चीन भी वही भूमिका अख्तियार कर रहा है। प्रधानमंत्री ने शपथ लेने के बाद केरल की एक रैली में भारत-पाक में हथियारों की होड़ कम करने और गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर धन व्यय का आह्वान किया था। विडंबना है कि उस आह्वान को कोई सुनने वाला नहीं है


राजस्थान पत्रिका

राहत भरे फैसले

आधार को बैंक खातों और मोबाइल से जोड़ने की अनिवार्यता की समय सीमा बढ़ाए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला करोड़ों लोगों को राहत देने वाला है। राहत की एक और खबर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने दी है। बैंक ने न्यूनतम शेष (मिनिमम बैलेंस) पर लगने वाले जुर्माने की राशि में 75 फीसदी कटौती की है। अदालत और बैंक के दोनों फैसले स्वागत योग्य हैं। लेकिन ये दोनों फैसले एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं, जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है। सवाल ये कि आधार की अनिवार्यता के मामले में जो राहत अदालत ने दी, वह सरकार ने क्यों नहीं दी। अदालत ने साफ कहा कि सरकार अनिवार्य आधार के लिए बाध्य नहीं कर सकती। सरकारों का काम जनता को परेशानियों से बचाना होता है न कि उन पर अनावश्यक बोझ लादना। आधार की अनिवार्यता का मामला सिर्फ बैंक खातों या मोबाइल से जोड़ने तक सीमित नहीं है। भविष्य निधि खातों, जीवन बीमा पॉलिसी, गैस कनेक्शन और रोजमर्रा की अन्य सुविधाओं को भी आधार से जोड़ने की अनिवार्यता की गई है।
सरकार अपनी सभी योजनाओं को आधार से जुड़कर जनता को लाभ पहुंचाने की इच्छा रखती होगी लेकिन ऐसा करने में आने वाली परेशानियों की तरफ से विचार करना चाहिए। सरकार को ऐसी अनिवार्यता लागू करने से पहले ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे व्यक्ति एक ही स्थान पर अपने आधार को सभी योजनाओं से जोड़ सके। पासपोर्ट के लिए आधार नम्बर की अनिवार्यता के चलते अनेक जगह पासपोर्ट अधिकारियों ने पासपोर्ट रिन्यू करने से इंकार तक कर दिया। सुप्रीम कोर्ट इन्हीं परेशानियों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इसी तरह बैंकों में न्यूनतम जमा से कम राशि होने पर लगाए जाने वाला जुर्माना भी ग्राहकों के साथ अन्याय है। एक तरफ बैंकों को करोड़ों-अरबों रुपए की कर्ज राशि वसूल नहीं हो रही, तो दूसरी तरफ बैंक प्रबंधन आम आदमी पर अलग-अलग तरह के शुल्क लगाकर परेशान कर रहा है। सरकार को चाहिए कि तमाम बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले इस तरह के शुल्कों पर नजर रखे। बैंकों को मनमानी करने की छूट किसी भी हालत में नहीं दी जानी चाहिए। बैंकों का प्रमुख उद्देश्य ग्राहकों को सुविधा पहुंचाना होना चाहिए, न कि लाभ कमाना।


दैनिक जागरण

विपक्षी एकता की होड़

विपक्षी एकता के मकसद से सोनिया गांधी की ओर से आयोजित बैठक यही बता रही है कि भाजपा के खिलाफ कोई मजबूत मोर्चा बनाने की होड़ तेज हो रही है। इसके पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता चंद्रशेखर राव विपक्षी एकता की पहल कर चुके हैं और उनके पहले शरद पवार एवं शरद यादव भी। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के साथ-साथ माकपा नेता सीताराम येचुरी भी विपक्षी दलों में एका के लिए सक्रिय हो चुके हैं। आने वाले दिनों में ऐसी सक्रियता देखने को मिलती ही रहेगी, क्योंकि लोकसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं और यह किसी से छिपा नहीं कि किस तरह प्रत्येक आम चुनाव के पहले तीसरे-चौथे मोर्चे के गठन की कवायद होती रही है। नि:संदेह यह नहीं कहा जा सकता कि पहले की तरह आगे भी विपक्षी एकता की कोशिश नाकाम रहेगी, लेकिन यह सवाल तो उठेगा ही कि आखिर विपक्षी दल एकजुट होकर क्या हासिल करना चाह रहे हैं? अगर वे यह सोच रहे हैं कि उनके एक साथ आ जाने से जनता उनके पीछे आ खड़ी होगी तो ऐसा शायद ही हो। इसके आसार इसलिए कम हैं, क्योंकि भाजपा को रोकने के नाम पर एक छतरी के नीचे आने की जरूरत जता रहे राजनीतिक दल यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर उनके पास देश की जनता को देने के लिए क्या है? जो विपक्षी नेता यह कह रहे हैं किमोदी सरकार के चलते देश रसातल में जा रहा है उन्हें यह समझ आना चाहिए कि जनता यह जानना चाह रही है कि वे अपने किन तौर-तरीकों से देश का उत्थान करेंगे?
वैकल्पिक नीतियों और कार्यक्रमों का उल्लेख करना तो दूर रहा, विपक्षी नेता कोई ठोस वैकल्पिक विचार तक पेश नहीं कर पा रहे हैं। इसके नाम पर कभी इस पर जोर दिया जाता है कि सब किसानों का कर्ज माफ होना चाहिए और कभी इस पर कि गरीबों को इस या उस मद में सब्सिडी अथवा रियायत मिलनी चाहिए। चंद दिन पहले ही जब महाराष्ट्र के किसान सड़कों पर उतरे तो विपक्षी दलों ने कर्ज माफी की उनकी मांग के पक्ष में खड़े होने में एक क्षण की देरी नहीं की, जबकि एक अर्से से बार-बार यह साबित हो रहा है कि कृषि कर्ज माफी एक बेहद खराब नीति और बुरा विचार है। विपक्षी दल गांव, गरीब, किसान, मजदूर के हित के नाम पर निर्धनता का जैसा महिमा मंडन कर रहे हैं उससे तो यह लगता ही नहीं कि वे किसी दूरगामी सोच से लैस हैं। ठोस वैकल्पिक नीति और विचार से हीन विपक्षी दल अपनी एका की जरूरत जता सकते हैं, लेकिन वे जनता का ध्यान आकर्षित नहीं कर सकते। विपक्षी दलों की समस्या केवल यही नहीं है कि वे कोई वैकल्पिक नजरिया पेश नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उनके बीच प्रधानमंत्री पद के दावेदार बढ़ते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि इनमें ज्यादातर वे हैं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बेहद संकीर्ण सोच रखते हैं। आखिर राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर क्षेत्रीय मसलों को तरजीह देने वाले देश का नेतृत्व करने का भरोसा कैसे दिला सकते हैं?


प्रभात खबर

मैंक्रों का दौरा

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के भारत दौरे और द्विपक्षीय समझौतों की अहमियत को वैश्विक स्तर पर बदलते शक्ति-संतुलन के संदर्भ में समझा जाना चाहिए. ब्रेक्जिट के बाद आर्थिक शक्ति के बतौर यूरोपीय संघ का भविष्य बहुत कुछ जर्मन नेता एंजेला मर्केल पर निर्भर माना जा रहा था, पर जर्मन राजनीति में उनका नेतृत्व कमजोर हुआ है. उदारवादी होने के नाते मैक्रों मजबूत नेता माने जाते हैं. उनके पास आर्थिक सुधार की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं. वे संरक्षणवाद के मुखर विरोधी हैं. ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के लिए विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग के आकांक्षी भारत के लिए उनका यह रुख अनुकूल है. जैतापुर परमाणु संयंत्र के लिए तकनीक मुहैया कराने की दिशा में प्रगति इसका एक संकेत है. अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और उसके अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के कुछ समझौतों से पीछे हटने से पैदा हुई वैश्विक चुनौतियों के साथ चीन के बढ़ते वर्चस्व से उत्पन्न एशिया-प्रशांत क्षेत्र की मौजूदा भू-राजनीति के संदर्भ में भी मैक्रों की यात्रा अहम है. जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते से अमेरिका के हाथ खींच लेने के बाद भारत और फ्रांस इस समझौते के तहत साझेदारी में काम करने की दिशा में अग्रसर हैं. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में फिलहाल 60 से ज्यादा देश शामिल हो चुके हैं. इस पहल के जरिये जीवाश्म-ईंधन पर निर्भर वैश्विक अर्थव्यवस्था के भीतर विकासशील देशों के लिए अपनी आर्थिक दावेदारी का एक नया आयेंगे और इसके लिए धन और वैकल्पिक मंच तैयार होने की संभावना को बल मिला है. राष्ट्रपति मैक्रों तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त घोषणा में यह तथ्य आया है कि सस्ते दर पर सौर-ऊर्जा हासिल करने के साधन उपलब्ध कराये जायेंगे और इसके लिए धन जुटाने की कोशिशें होंगी. भारत (1.4 अरब डॉलर) और फ्रांस (1.3 अरब डॉलर) इस उद्देश्य से निवेश के लिए तैयार है. दोनों देशों की परस्पर निकटता सघन होने का एक साझा बिंदु चीन है. उसकी ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना का एक हिस्सा पूर्वी यूरोप के देशों तथा रोमानिया, सर्बिया, स्लोवानिया जैसे बाल्कन मुल्कों से जुड़ता है. अगर चीनी परियोजना को कामयाबी मिलती है, यह यूरोपीय संघ के आर्थिक हितों और प्रभाव की कीमत पर होगा. हिंद महासागर में चीन के सामरिक और आर्थिक विस्तार के प्रति भारत की चिंता से फ्रांस इसी कारण सहमत है. पर, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का समीकरण जटिल और बहुपक्षीय होता है. मैक्रों चीन के साथ भी सहयोग के आकांक्षी हैं. अमेरिकी संरक्षणवाद बढ़ने पर यूरोप और चीन के संबंध गहरे होंगे. तनाव के बावजूद भारत और चीन के रिश्तों का एक पहलू वाणिज्यिक निकटता भी है. जैतापुर में तकनीक-हस्तांतरण की गति धीमी है. जलवायु परिवर्तन के लिए समुचित धन जुटाने की चुनौती भी है. हालांकि राष्ट्रपति मैक्रों के दौरे ने परस्पर सहयोग को नया आयाम दिया है, लेकिन दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग का भविष्य इन वास्तविकताओं को संज्ञान में लेकर ही बेहतर हो सकता है.


देशबन्धु

गठबंधन राजनीति के चमत्कार

भाजपानीत एनडीए में शामिल तेलुगूदेशम पार्टी के मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन तेदेपा ने गठबंधन अब भी छोड़ा नहीं है। दरअसल तेदेपा की मांग है कि आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा मिले। आम बजट में भी उसे आंध्र के लिए कुछ अच्छे पैकेज की उम्मीद थी। लेकिन जब उसे आशा के अनुरूप कुछ हासिल नहीं हुआ तो तेदेपा के सांसदों ने सरकार को घेरना शुरु किया। बजट सत्र के पहले और दूसरे दोनों हिस्सों में उसके सांसद सदन की कार्रवाई में बाधा डालते रहे और सदन के बाहर भी हंगामा करते रहे।

तेदेपा को उम्मीद थी कि मोदी सरकार उसकी बात सुनेगी, क्योंकि वह उसकी सहयोगी है। लेकिन यह उम्मीद जल्द ही खुशफहमी साबित हुई। पिछले दिनों वित्त मंत्री अरूण जेटली ने साफ-साफ कह दिया कि विशेष राज्य को केंद्रीय योजनाओं में 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से मिलता है। ऐसी ही मदद केंद्र करने के लिए संकल्पित है। लेकिन 14वें वित्त आयोग के बाद विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। 14 वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के बाद यह दर्जा पूर्वोत्तर और तीन पर्वतीय राज्यों के अलावा किसी और को नहीं मिल सकता। श्री जेटली के इस बयान से तेदेपा आहत तो बहुत हुई है, लेकिन अब भी वह एनडीए का हिस्सा बनी हुई है।

आंध्रप्रदेश में विपक्षी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस चाहती है कि तेदेपा केेंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए, लेकिन तेदेपा इसे अनैतिक मानती है। उसका कहना है कि हम गठबंधन दल हैं और हमारे कुछ नैतिक मूल्य हैं। तेदेपा के इस रवैये से भाजपा को फौरी राहत मिल सकती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से यह जाहिर हो गया है कि एनडीए में सभी के अच्छे दिन नहीं आए हैं। तेदेपा से काफी पहले शिवसेना लगातार भाजपा की नीतियों और फैसलों की आलोचना करती रही है। वह महाराष्ट्र और केेंद्र दोनों में भाजपा की सहयोगी है और दोनों ही जगह उसकी पटरी नहीं बैठ रही है। लेकिन शिवसेना के साथ हिंदुत्व की विचारधारा का जुड़ाव शायद उनके अलगाव पर भारी पड़ जाए और बाद में दोनों फिर गलबहियां करते दिखें। जहां तक सवाल आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का है, तो पहली बात यह तकनीकी कारणों से संभव नहीं है।

अगर इसके लिए नियमों में बदलाव किए जाएं तो फिर बिहार, उड़ीसा, झारखंड में भी ऐसी ही मांगें शुरु हो जाएंगी। तेदेपा की मांगों के आगे अगर मोदी सरकार झुक गई, तो बाद में अन्य घटक दल भी दबाव की राजनीति कर सकते हैं। इस वजह से तमाम हंगामे के बावजूद केेंद्र सरकार झुक नहीं रही है। लेकिन फिर भी तेदेपा विशेष राज्य के मुद्दे को छोड़ नहीं सकती। इस मुद्दे के इर्द-गिर्द राजनीति करना फिलहाल उसकी मजबूरी है।

आंध्र में प्रमुख विपक्षी दल जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर-कांग्रेस ने केंद्र को पांच अप्रैल तक विशेष राज्य की घोषणा का अल्टीमेटम दे रखा है। ऐसा नहीं होने पार्टी के सभी नौ सांसद और विधायक संबद्ध सदनों से इस्तीफा दे देंगे। इस अल्टीमेटम के बाद सत्तारूढ़ तेदेपा को मजबूरी में इस लड़ाई में रहना पड़ेगा, अन्यथा वाईएसआर कांग्रेस खुद को तेदेपा से ज्यादा जनता का वफादार बताएगी। आंध्रप्रदेश की इस लड़ाई के बाद अब 2019 की सियासी पहेली कुछ और उलझ गई है। हाल ही में एक कार्यक्रम में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक जैसी विचारधारा वाले दलों के साथ सरकार बनाने का दावा किया है। यानी वे गठबंधन के नए साथी तलाश रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी आंध्र के मुद्दे पर तेदेपा का साथ देने का वादा कर चुके हैं। तो क्या तेदेपा बाद में कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा हो सकती है?

उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा साथ आए हैं, तो क्या बाद में वे भी कांग्रेस से जुड़ सकते हैं? विधानसभा चुनाव में तो सपा-कांग्रेस साथ थे ही और अभी राज्यसभा के लिए बसपा का साथ देने का फैसला कांग्रेस ने किया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी आदि अलग तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं। उधर शरद पवार ने राकांपा के पत्ते अभी खोले नहीं हैं। उप्र-बिहार में उपचुनाव के नतीजे भी इस पहेली को उलझाने या सुलझाने के कारक बनेंगे। कुल मिलाकर 2019 के पहले कई समीकरण बनेंगे और जनता केर-बेर के संग होने, सांप-नेवले की दोस्ती होने के राजनीतिक चमत्कार देखेगी।

 

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