Home काॅलम आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 10 मार्च, 2018

आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 10 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

राहत की खबर

यह पूरी दुनिया के लिए राहत की खबर है कि मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन की मुलाकात हो सकती है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चुंग ईयू योंग ने अमेरिकी सत्ताशीर्ष से मुलाकात के बाद वाइट हाउस में पत्रकारों को यह जानकारी दी। उनके मुताबिक किम ने ट्रंप को बाकायदा न्योता भेजा था, जिसे ट्रंप ने स्वीकार कर लिया। योंग ने यह भी कहा कि किम ने भविष्य में परमाणु बम और मिसाइलों का परीक्षण न करने का आश्वासन भी दिया है। पहली नजर में इस पर यकीन नहीं होता, क्योंकि हाल तक तो ये दोनों नेता एक-दूसरे को बर्बाद करने की धमकी दे रहे थे। लेकिन किसी पक्ष से कोई खंडन न आने का यह अर्थ लगाया जा सकता है कि दोनों पक्षों ने अब व्यावहारिक रवैया अपना लिया है। इसके लिए दक्षिण  कोरिया के प्रयासों की सराहना करनी होगी, जिसने नॉर्थ कोरिया के साथ अपने पुराने तनाव को एक तरफ रखकर किम जोंग उन को वार्ता की टेबल पर आने के लिए प्रेरित किया। अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंध का फायदा उठाते हुए उसने ट्रंप को भी अपना रवैया नरम करने के लिए राजी कर लिया। उसका यह प्रयास व्यापक कोरियाई जनता के हित में है। संभव है, अमेरिकी प्रतिबंध ने भी किम को अपना रुख बदलने पर मजबूर किया हो। दूसरी तरफ अमेरिका को भी लगा हो कि इतनी गैर-बराबरी वाली लड़ाई से उसे कुछ हासिल नहीं होने वाला। किम को उन्हीं की भाषा में जवाब देने से ट्रंप की फजीहत हो रही थी। अमेरिका जैसे जिम्मेदार देश से यह अपेक्षा की जा रही थी कि वह जुबानी मैच खेलने के बजाय समझदारी का रास्ता अपनाएगा। बहरहाल, अमेरिका को अब यह भ्रम छोड़ ही देना चाहिए कि दुनिया में कहीं भी एटमी कार्यक्रमों का चलना या न चलना पूरी तरह उसकी मर्जी पर निर्भर करेगा। हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा हक है। रहा सवाल परमाणु हथियारों से विश्व पर मंडरा रहे खतरे का, तो इस मामले में भी पारदर्शिता और एकरूपता बरती जानी चाहिए। ऐसा कैसे हो सकता है कि कुछ देशों को हथियार बनाने से रोका जाए और बाकी बेरोकटोक इस विध्वंसक रास्ते पर बढ़ते रहें। परमाणु हथियारों का खतरा घटाना है तो पूरा विश्व इस बारे में एकजुट होकर कोई फैसला करे और उस पर अमल सुनिश्चित करे। फिलहाल इस चर्चा का कोई फायदा नहीं कि अमेरिका और नॉर्थ कोरिया में से कौन झुका और क्यों झुका। बेहतर है कि दोनों देशों में बातचीत का सिलसिला शुरू हो, नॉर्थ कोरियाई जनता का अलगाव खत्म हो और किम द्वारा हथियारों के दुरुपयोग की आशंका समाप्त की जाए। ट्रंप और किम जोंग की बातचीत के बाद नॉर्थ कोरिया के सामाजिक-आर्थिक विकास का नया रास्ता भी खुलेगा।


जनसत्ता

दुरुस्त आयद

इच्छामृत्यु या दयामृत्यु के पक्ष में शुक्रवार को आया सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक भी है और दूरगामी महत्त्व का भी। इस फैसले नेएक प्रकार से गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार पर मुहर लगाई है। हमारे संविधान के अनुच्छेद इक्कीस ने जीने के अधिकार की गारंटी दे रखी है। लेकिन जीने का अर्थ गरिमापूर्ण ढंग से जीना होता है। और, जब यह संभव न रह जाए, तो मृत्य के वरण की अनुमति दी जा सकती है। गौरतलब है कि ताजा फैसला सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनाया है, जिसके मुताबिक दयामृत्यु की इजाजत कुछ विशेष परिस्थितियों में दी जा सकती है। इजाजत के लिए अदालत ने उचित ही कई कठोर शर्तें लगाई हैं और कहा है कि जब तक इस संबंध में संसद से पारित होकर कानून लागू नहीं हो जाता, तब तक ये दिशा-निर्देश लागू रहेंगे। यह मुद््दा तब देश भर में बहस का विषय बना था जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दयामृत्यु के लिए याचिका दायर की गई थी। बलात्कार और हत्या के प्रयास की शिकार अरुणा चालीस साल तक एक अस्पताल में बेहोशी की हालत में रहीं। उन्हें सामान्य अवस्था में ला सकने की सारी कोशिशें निष्फल हो चुकी थीं।

एक शख्स जो न अपने परिजनों को पहचान सकता है, न चल-फिर, न खा-पी सकता है, न सुन-बोल सकता है, जिसे अपने अस्तित्व का भी बोध नहीं है, और जिसे तमाम चिकित्सीय उपायों से स्वस्थ करना तो दूर, होश में भी नहीं ला सकते, उसका जीना एक जिंदा लाश की तरह ही होता है। ऐसी स्थिति में उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी जीवनरक्षक प्रणाली के सहारे केवल टिकाए रखना मरीज के लिए भी यातनादायी होता है और उसके परिजनों के लिए भी। यह तर्क सर्वोच्च न्यायालय को तब भी जंचा था, पर तब उसने याचिका खारिज कर दी थी। अब उसने दयामृत्यु की इजाजत दे दी है, पर सख्त दिशा-निर्देश के साथ। निर्देशों के मुताबिक, ऐसा मरीज जिसकी हालत बुरी तरह लगातार बिगड़ती जा रही हो या जो अंतिम रूप से लाइलाज हो चुका हो, दयामृत्यु को चुन सकता है। इस संबंध में उसे एक लिखित इच्छापत्र या वसीयत देनी होगी। पर इसे काफी नहीं माना जाएगा। इसे लेकर मरीज के परिजनों या मित्रों को उच्च न्यायालय की शरण में जाना होगा। न्यायालय के निर्देश पर एक मेडिकल बोर्ड गठित किया जाएगा, और वह बोर्ड ही तय करेगा कि मरीज चिकित्सीय रूप से दयामृत्यु का हकदार है या नहीं।

अगर मरीज पहले से निरंतर बेहोशी की हालत में हो, तब भी परिजनों को उच्च न्यायालय की अनुमति से बाकी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। अस्पताल को भी, जीवनरक्षक प्रणाली हटाने से पहले यह देखना होगा कि सारी शर्तें पूरी कर ली गई हैं या नहीं। इस तरह अदालत ने किसी भी मरीज को यह अधिकार दिया है कि वह चाहे तो, लगातार बेहोशी की हालत में रखे जाने या लगातार कृत्रिम उपायों के सहारे अपना वजूद बनाए रखने से इनकार कर सकता है। दयामृत्यु का अधिकार कई देशों में है और इसे मानव सभ्यता की प्रगति की एक निशानी के तौर पर ही देखा जाता रहा है। भारत में विभिन्न मानव अंगों के दान से संबंधित कानून हैं, और ये कानून यही जताते हैं कि हर व्यक्ति का अपने शरीर पर अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने भी इसी की पुष्टि की है। अब इस संबंध में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है, और केंद्र सरकार को इस बारे में पहल करनी चाहिए।


हिंदुस्तान

इच्छामृत्यू पर मुहर

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उस बहस पर विराम लगा दिया है, जिसकी शुरुआत 1986 में कार दुर्घटना के बाद सिजोफ्रेनिया और मानसिक रोगों का शिकार हुए कांस्टेबल मारुति श्रीपति दुबल की खुद को जलाकर मारने की कोशिश और फिर 2009 में 42 साल से अस्पताल में अचेत पड़ी अरुणा शानबाग के लिए शांतिपूर्ण मृत्यु की विनती वाली याचिका से हुई थी। याचिका के साथ देश में इच्छामृत्यु पर नई बहस तो शुरू हुई ही, जाने-अनजाने अरुणा शानबाग यूथेनेशिया या इच्छामृत्यु को वैधानिक आधार देने की मुहिम और बहस का चेहरा बन गईं। यही कारण है कि यह फैसला बार-बार अरुणा शानबाग की याद दिला रहा है। याचिका और फैसले के पीछे भावना यही है कि क्या उस इंसान को, जिसकी जीने की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हों, और जो कोमा जैसे हालात में मृत्यु शैया पर हो, उसे इच्छा मृत्यु मिलनी चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा के मामले में दायर याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ जैसे शब्द जोड़कर नई बहस को जमीन दी थी, और माना था कि संभवत: भविष्य में इस पर विचार हो और इच्छामृत्यु चाहने वाले इंसान, उसकी मेडिकल जांच और पारिवारिक सहमति के साथ किसी फैसले की राह बन सके। ताजा फैसला इसी का विस्तार है। सिरा तो उसी वक्त मिल गया था, जब कोर्ट ने अरुणा शानबाग के मामले में ‘राइट टु क्वालिटी लाइफ’ यानी सम्मानजनक जीवन की तरह की सम्मानजनक मौत की बात मानी थी। हालांकि स्वाभाविक तौर पर इसके साथ तमाम सवाल जुड़े थे, जिन पर आज बस किसी हद तक राह साफ हुई है। कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर सहमति देते हुए कुछ शर्ते लगाई हैं। ‘लिविंग विल’ की बात स्वीकार करते हुए उसने व्यवस्था दी है कि ऐसी विल होने के बावजूद ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की निगरानी में बने मेडिकल बोर्ड के साथ ही परिवार की मंजूरी जरूरी होगी और यह सब जिला मजिस्ट्रेट की देखरेख में ही होगा। कानून बनने तक कोर्ट की गाइडलाइन ही मान्य रहेंगी।कुछ और सवाल भी हैं, जिनके जवाब तलाशने होंगे। ‘लिविंग विल’ अपने आप में बड़ा सवाल है कि ऐसी कोई वसीयत, जिसमें अपनी ही मृत्यु की बात हो, कहां और किस तरह रखी जाएगी? अंगदान या देहदान की वसीयत या इच्छा तो लिखकर परिवार को दे दी जाती है या ऐसे दान का फैसला मृत्युपरांत परिवार भी कर सकता है, लेकिन अपनी ही मृत्यु की वसीयत आसान मामला नहीं। क्या यह सामान्य वसीयत जैसा ही कुछ होगा और ऐसी किसी वसीयत की वैधता या प्रामाणिकता पर सवाल नहीं उठेंगे? ऐसे मामलों में पूरे परिवार की सहमति जरूरी होगी, तो उस परिवार के दायरे में कौन-कौन शामिल होंगे? जरा सा भी विवाद ऐसे हालात उत्पन्न करेगा, जो फैसले की प्रक्रिया को अनिश्चित विस्तार दे सकता है। अगर कोई इंसान किसी भी हाल में उसे इच्छामृत्यु न दिए जाने की वसीयत कर जाए, तो परिवार व मेडिकल बोर्ड की राय अलग रहने के बावजूद क्या होगा? यह सम्मान से जीने के अधिकार की तरह ही सम्मान से मरने के अधिकार यानी अपनी देह पर खुद के हक का मामला भी है, तो फैसले में शायद संबद्ध इंसान की वसीयत ही सबसे अहम मानी जाए। जो भी हो, सर्वोच्च अदालत का यह युगांतरकारी और जरूरी फैसला है। जरूरत बस इसके बेजा इस्तेमाल को रोकने की है।


अमर उजाला

इच्छा मृत्यु का अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने इच्छा मृत्यु को स्वच्छता मृत्यु को स्वच्छता मंजूरी देते हुए इसे जीने के अधिकार की तरह जिस तरह मौलिक अधिकार बताया है, वह सचमुच एक ऐतिहासिक फैसला है। उसने कहा है कि मृत्यु जीने की प्रक्रिया का ही हिस्सा है और मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह कब आखरी सांस ले। अदालत में यह निर्णय एक स्वयंसेवी संस्था कॉमन कॉज की उस जनहित याचिका पर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को इच्छा मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए। इसी के तहत शीर्ष अदालत ने लंबी बहस के बाद लिविंग विल और पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी है। लिविंग विल या मृत्यु की वसीयत वह वसीयत है, जिसमें व्यक्ति यह स्पष्ट कर देता है कि किसी गंभीर बीमारी में अगर उसके बचने की कोई संभावना न रहे, तो उसे जबर्दस्ती लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे जिंदा न रखा जाए। इसके बाद ही पैसिव यूथेनेशिया पर विचार किया जाएगा, जिसमें मरीजों को डॉक्टर वे जीने देना बंद कर देते हैं, जिनके सहारे वे जिंदा रहते हैं। जीवन से निराश व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु की अपील करना नया नहीं है, लेकिन हमारे यहां इस मुद्दे ने तब जोर पकड़ा, जब मुंबई के एक अस्पताल में नर्स अरुणा शानबाग ने यौन शोषण के बाद दशकों तक कोमा में रहने के उपरांत दम तोड़ा था। तब सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें इच्छा मृत्यु देने से इन्कार कर दिया था। अलबत्ता इच्छा मृत्यु का अधिकार सशर्त है। इसका दुरुपयोग रोकने के लिए अदालत ने शर्तें रखी हैं और लिविंग विल से संबंधित दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं। मोटे तौर पर जिसके बचने की संभावना नहीं है, लिविंग विल वही लिख सकता है, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया का फैसला अंततः मेडिकल बोर्ड ही लेगा। जिसे संपत्ति या विरासत में लाभ होने वाला हो, उसके लिविंग विल की गहराई से जांच होगी। इसका भी ध्यान रखा जाएगा कि असाध्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर परिवार की तरफ से इच्छा मृत्यु की वसीयत लिखने का दबाव न बने साफ है कि शीर्ष अदालत का फैसला केवल उन लोगों को पूर्ण गरिमा के साथ मृत्यु इच्छा का चुनाव करने का अधिकार देता है, जिनके लिए जीवित रहने की सारी संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं।


दैनिक भास्कर

आखिरकार अपने जीवन पर अपनी मर्जी चलाने की मंजूरी 

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने इच्छा मृत्यु के लिए दिशानिर्देश जारी करके उस स्थिति को स्पष्ट कर दिया है जो उसके निर्णय और सरकार के विधेयक के बीच फंसी हुई थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग बनाम भारत सरकार के मुकदमे में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सैद्धांतिक रूप से इजाजत देकर सरकार के समक्ष उसकी कार्यविधि निर्धारित करने का दायित्व डाल दिया था। इस बीच सरकार की तरफ से कोई पहल न होते देख कामनकॉज़ नामक गैर-सरकारी संस्था की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। इससे यह भ्रम दूर होता है कि असाध्य रूप से बीमार मरीज को जीवन प्रणाली पर न रखने या एंटीबायोटिक न दिए जाने का फैसला लेने का अधिकारी कौन है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि अब गंभीर रूप से बीमार कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए यह वसीयत बना सकता है कि उसे एक अवस्था के बाद दवाएं न दी जाएं या उसके शरीर को विशेष मशीन पर न रखा जाए। पांच जजों की पीठ ने चार अलग-अलग आदेश लिखे हैं लेकिन, उनका निष्कर्ष समान है। इनमें न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा है कि जीवन और मृत्यु अविभाज्य हैं और जीवन प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है। ऐसे में मरना भी जीवन का ही हिस्सा है। मरीज के करीबी मित्र या रिश्तेदार द्वारा पेश की गई वसीयत के माध्यम से मेडिकल बोर्ड को कोई फैसला लेने में मदद मिलेगी और व्यक्ति अपने जीवन को पीड़ा से मुक्त कर सकेगा। न्यायालय ने इस प्रकार अपने सैद्धांतिक निर्णय को अमली जामा पहनाने का एक साहसिक कदम उठाया है, क्योंकि इस बारे में कार्यपालिका झिझक रही थी। तमाम तरह के विवादों को जन्म देने वाली कार्यपालिका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के इस मसले पर फैसला लेने में क्यों झिझकती है यह समझ से परे है। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय दिशानिर्देश व्यक्तिगत आजादी को मजबूत करने वाला है। हालांकि, सरकार ने कहा है कि अब वह भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को अपराध के दायरे से मुक्त करने जा रही है। सरकार की यह मंशा व्यक्ति की उसी इच्छा को सशक्त करने वाली है, जिसके तहत वह इच्छामृत्यु का अधिकार प्राप्त करेगा। अब सरकार को बिना देरी के इस विषय में कानून बनाना चाहिए ताकि मेडिकल बोर्ड, न्यायालय और समाज को जीवन और मृत्यु के बारे में एक अहम फैसला लेने में कोई दुविधा न रहे।


राजस्थान पत्रिका

इच्छामृत्य का हक!

जब व्यक्ति को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिलता है तो सम्मान के साथ मरने का अधिकार क्यों न हो? लम्बे समय से चल रही इस बहस का निपटारा देश की शीर्ष अदालत में आखिर कर ही दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ ‘इच्छामृत्यु’ के अधिकार का फैसला सुनाया। अदालत ने जीवन की तुलना दिव्य ज्योति से करते हुए जीवन और मौत को एक सिक्के के दो पहलुओं के रूप में स्वीकार किया। साथ ही हर व्यक्ति को ‘लिविंग विल’ का अधिकार दिया। यानी गंभीर बीमारी से जूझ रहे ऐसे लोगों को ‘इच्छामृत्यु’ का अधिकार मिल जाएगा, जिनके स्वस्थ होने की संभावना पूरी तरह धूमिल हो चुकी हो। अदालत ने ‘इच्छामृत्यु’ के नए प्रावधान का दुरुपयोग रोकने के लिए भी कुछ शर्तों का उल्लेख किया है। फैसला कई मामलों में स्वागत योग्य माना जा सकता है। फैसले का सार यही है कि सिर्फ सांसे लेते रहने को जिंदगी नहीं माना जा सकता। किसी भी व्यक्ति को अपने शरीर पर होने वाले अत्याचार को रोकने से पाबंद नहीं किया जा सकता है। साथ ही नए प्रावधान के दुरुपयोग को रोकने के उपायों को भी सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। ‘लिविंग विल’ से पहले मेडिकल बोर्ड की अनुमति जरूरी होगी। सम्पत्ति विवाद या वसीयत के दुरुपयोग की आशंका को दूर किए जाने वाले प्रावधानों पर भी विचार किया जाना चाहिए। ‘इच्छामृत्यु’ का अधिकार देना ऐतिहासिक फैसला है और इसे उसी संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है। यह विषम मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है लिहाजा इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। मतलब साफ है कि जिस तरह जीवन सम्मान के साथ जिया जाता है उसी तरह मृत्यु का वरण भी सम्मान के साथ ही किया जाना चाहिए।


दैनिक जागरण

रक्षा सौदे पर सस्ती राजनीति

कांग्रेस को एक बार फिर राफेल विमान सौदे की याद आ गई। हालांकि वह पहले भी रह-रह कर इस सौदे में कथित गड़बड़ी को उछालती रही है, लेकिन इस बार उसके नेताओं ने जिस तरह फ्रांस के राष्ट्रपति के भारत आगमन के मौके पर इस सौदे में घोटाले का आरोप उछाला उससे यही साबित होता है कि उसका मकसद सस्ती राजनीति करना ही अधिक है। क्या वह अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए फ्रांसीसी राष्ट्रपति को असहज करने में भी संकोच नहीं कर रही है? इस बारे में कांग्रेसी नेता ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन इससे खराब राजनीति और क्या हो सकती है कि संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए एक महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को संदिग्ध बताने का काम किया जाए और वह भी संबंधित देश के शासनाध्यक्ष के नई दिल्ली में कदम रखने के चंद घंटे पहले? बिना किसी ठोस प्रमाण के रक्षा सौदों को संदिग्ध बताने की राजनीति विदेश नीति के साथ-साथ रक्षा नीति को भी प्रभावित करने का काम कर सकती है। अगर कांग्रेस को सचमुच यह लगता है कि राफेल सौदे में गड़बड़ी हुई है तो फिर उसे कुछ ऐसे प्रमाण उपलब्ध कराने चाहिए जो पूरी तौर पर न सही, प्रथमदृष्टया यह संकेत करते हों कि इस सौदे में बोफोर्स तोप सौदे जैसा कुछ हुआ है। इतना ही नहीं उसे तो अदालत का दरवाजा भी खटखटाना चाहिए। 1इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पहले कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री के कथित दोस्त को लाभ पहुंचाने के लिए राफेल सौदे की शर्तो में बदलाव के आरोप के साथ सामने आए थे। अब वे यह रेखांकित कर रहे हैं कि इस सौदे में 12600 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। सबसे हैरानी की बात यह है कि उन्होंने नुकसान का यह आकलन राफेल विमान बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दासौ की कथित वार्षिक रपट के आधार पर किया है। कांग्रेस की मानें तो इस कंपनी ने अपनी वार्षिक रपट में खुद ही यह स्पष्ट कर दिया कि भारत को कथित तौर पर कहीं अधिक दाम में राफेल विमान दिए गए हैं। क्या इससे हास्यास्पद और कुछ हो सकता है कि कोई कंपनी खुद ही इसका उल्लेख करे कि उसने किसी देश के साथ कहीं अधिक महंगा सौदा किया है? कांग्रेस ने यह तो बहुत आसानी से कह दिया कि भारत की तुलना में मिस्र और कतर ने राफेल विमान कम कीमत पर खरीदे हैं, लेकिन इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं समझी कि क्या मिस्न और कतर को मिले ये विमान उसी तकनीक और उपकरण से लैस हैं जिनसे भारत आने वाले विमान सज्जित हैं। कांग्रेस ने यह तो जिक्र किया कि पहले 126 राफेल विमान लिए जाने थे, लेकिन यह नहीं बताया कि वह 2008 से लेकर 2014 तक इस सौदे को मंजूरी क्यों नहीं दे सकी और वह भी तब भारतीय वायु सेना की युद्धक क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती जा रही थी? चूंकि अब यह और स्पष्ट है कि कांग्रेस अपनी सुविधा से इस मसले को उछालती ही रहेगी इसलिए उचित यह होगा कि सरकार जरूरी गोपनीयता कायम रखते हुए कुछ ऐसे तथ्य सामने रखे जिससे इस सस्ती राजनीति का समापन हो सके।