Home काॅलम आज के हिंदी/अंग्रेजी अखबारों के संपादकीय: 16 अप्रैल, 2018

आज के हिंदी/अंग्रेजी अखबारों के संपादकीय: 16 अप्रैल, 2018

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नवभारत टाइम्स

सफलता की चमक

कॉमनवेल्थ गेम्स में अपने खिलाड़ियों का जज्बा देखकर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है। हमने इस बार ग्लास्गो से ज्यादा सोने बटोरे लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हर खिलाड़ी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश की। ऐसे मुकाबलों में भी, जिसमें भारत का हाथ तंग माना जाता रहा है, हमने मेडल जीते और जिनमें पदक नहीं मिल सके उनमें कड़ी चुनौती पेश की। जैसे जेवलिन थ्रो में नीरज चोपड़ा ने कमाल किया। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जेवलिन थ्रो में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय बन गए। बीस वर्षीय नीरज ने पहले ही थ्रो में क्वालीफाईंग आंकड़े को छूकर फाइनल में जगह पक्की कर ली थी। मोहम्मद अनस 400 मीटर दौड़ में भले ही ब्रॉन्ज से चूक गए पर उन्होंने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने 45.31 सेकेंड का समय निकाला और इस तरह एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। हिमा दास 400 मीटर दौड़ के फाइनल तक पहुंची। इसी तरह और एथलीटों ने अच्छा प्रदर्शन कर यह आशा जगाई है कि भारत को जल्दी ही एथलेटिक्स में पदक मिलने लगेंगे। वैसे पूर्व भारतीय महिला एथलीट पीटी उषा का मानना है कि भारत ओलिंपिक 2024 में जरूर एथलेटिक्स में पदक हासिल करेगा। टेबल टेनिस जैसे खेल में भारत ने अपना दमखम दिखाया है। मनिका बत्रा ने टेबल टेनिस के अलग-अलग इवेंट में चार पदक जीतकर इतिहास रचा। कॉमनवेल्थ खेलों में ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला टेबल टेनिस खिलाड़ी बनीं। 22 साल की मनिका ने न सिर्फ टेबल टेनिस के महिला सिंगल्स में गोल्ड जीता, बल्कि महिलाओं की टीम इवेंट में गोल्ड, महिला डबल्स मुकाबले में सिल्वर और मिक्स्ड डबल्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता। यानी उनकी झोली में दो गोल्ड, एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल आया। निशानेबाजी में पिछले दिनों युवाओं की एक नई खेप सामने आई है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना जलवा बिखेरा है। गोल्ड कोस्ट में उसका दमखम साफ नजर आया। कुश्ती, बॉक्सिंग और बैडमिंटन में भारत की स्थिति मजबूत रही है। इसलिए आशा के अनुरूप ही इसमें मेडल मिले। हॉकी में निराशा हाथ लगी। कॉमनवेल्थ की उपलब्धि दरअसल युवाओं की उपलब्धि है। भारतीय दल में युवाओं का दबदबा था। शूटिंग में गोल्ड जीतने वाले अनीश भानवाला मात्र 15 साल के हैं। शूटर मनु भाकर 16 की हैं। 16 से 20 की उम्र के कई खिलाड़ी हैं। खिलाड़ियों में कई महिलाएं हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करके अपना रास्ता बनाया। दरअसल समाज में खेल को लेकर धारणा बदल रही है। सरकार भी जागरूक हुई है। कई नई अकादमियां खुलीं हैं जिनका युवाओं को फायदा मिल रहा है। खेलों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों में और गति लाने की जरूरत है। खेलों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर देश भर में फैलाना होगा। नौकरशाही संबंधी बाधाएं दूर करनी होंगी, तभी एशियाई खेलों और ओलिंपिक में भी हमें झोली भरकर मेडल मिल सकेंगे।


जनसत्ता

सियासत और संवेदना

जब संवेदनशील मसलों पर भी वोट भुनाने की राजनीति होने लगे तो वह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। मगर हमारे राजनेता शायद इस बात को जानबूझ कर भुलाते गए हैं कि कुछ मसले आपस में मिल-बैठ कर, आंतरिक अनुशासन और सामाजिक समरसता बनाए रख कर भी हल किए जाते हैं। उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामलों को लेकर जिस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष गड़े मुर्दे उखाड़ने और खुद को पाक-साफ साबित करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें उस प्रवृत्ति पर नकेल कसने का संकल्प कहीं नहीं है जिसके चलते समाज में भय और असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है। इन दोनों घटनाओं के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आधी रात को मोबत्तियां लेकर इंडिया गेट पर रैली निकाली थी। अब उनके जवाब में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने निर्भया कांड से लेकर उसके बाद की तमाम ऐसी घटनाओं पर कांग्रेस को निशाने पर लिया है। इस तरह कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल और भाजपा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में जुट गए हैं।

उन्नाव और कठुआ की घटनाओं में आरोपियों को बचाने की हर कोशिश की गई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने आरोपी विधायक के पक्ष में उतर कर खुलेआम पीड़ित पक्ष को प्रताड़ित किया। उसमें पीड़िता के पिता की मौत तक हो गई। इसी तरह कठुआ मामले में आरोपियों को बचाने के लिए भाजपा और हिंदुत्ववादी संगठनों के नेताओं की अगुआई में विरोध प्रदर्शन किए गए। लिहाजा इन घटनाओं की जांच और कार्रवाई में खासा वक्त लग गया। लोगों में रोष इसी बात को लेकर है कि जब सत्ता पक्ष से जुड़ा कोई व्यक्ति किसी जघन्य अपराध में शामिल होता है तो स्थानीय प्रशासन से लेकर पार्टी स्तर तक उसे बचाने का प्रयास होने लगता है। घटनाओं से जुड़े तथ्यों को मिटाने या तोड़-मरोड़ कर पेश करने का प्रयास होता है। रसूख वाले लोगों को सजा की दर वैसे भी बहुत कम है। इसलिए जब भी ऐसी कोई घटना होती है, जिसमें कोई जनप्रतिनिधि शामिल होता है, तो उसके विपक्षी दल लोगों की इस नाराजगी को भुनाने का प्रयास करने लगते हैं।

यह समझने की जरूरत है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की कोई पार्टी नहीं होती और न वे किसी एक दल के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। वे अपनी सुरक्षा और लोभ को भुनाने के लिए राजनीतिक दलों की शरण में जाते हैं। ऐसे लोगों को पहचानना और अनुशासित करना संबंधित राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी होती है। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते, तो यह उनकी विफलता मानी जाती है। जब कोई सांसद, विधायक या कार्यकर्ता जघन्य या संज्ञेय अपराध करता है तो निस्संदेह उससे पार्टी की बदनामी होती है। इसलिए पार्टियां उसे बचाने का प्रयास करती देखी जाती हैं। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का बचाव करने से पार्टियों की बदनामी उससे भी ज्यादा होती है। अगर किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगता है, तो सबसे पहले पार्टी को उसकी जांच कराने की मांग करनी चाहिए, फैसला आने तक उसे पार्टी की जिम्मेदारियों से हटा देना चाहिए। तभी कार्यकर्ताओं में अनुशासन का भाव आएगा। मगर विचित्र है कि पार्टियां उनके खिलाफ सख्ती बरतने के बजाय उन्हें बचाने का प्रयास करती हैं। इसके चलते न तो उनकी आपराधिक मानसिकता को बदलने में कामयाबी मिल पाती है और न समाज में ऐसी घटनाओं पर काबू पाने का भरोसा बन पाता है।


 हिंदुस्तान

प्यार का समाजशास्त्र

प्यार क्या है? यह ऐसा सवाल है, जो सदियों से साहित्य, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, शरीर विज्ञान और यहां तक कि रसायनशास्त्र तक को परेशान करता रहा है। सबने अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या की है। व्याख्या जो भी हो, इनमें से ज्यादातर ने प्यार को जीवन का एक सकारात्मक मूल्य माना है। यह बात अलग है कि आज भी ऐसे बहुत से सामाजिक संगठन और संस्थाएं हैं, जो कई मामलों में प्यार को अपराध का दर्जा दे देते हैं और प्यार करने वालों के साथ अपराधियों जैसा सुलूक भी करते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में इसकी वजह महज यह होती है कि ऐसा प्यार कई बार अक्सर उन संस्थाओं के उस अनुशासन से टकराता दिखता है, जिनका वास्तव में कोई सकारात्मक अर्थ नहीं है। लेकिन अब रसायनशास्त्र ने प्यार की एक नई सामाजिक व्याख्या की ओर इशारा किया है, जो हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है।
रसायनशास्त्र के हिसाब से प्यार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हमारे शरीर में पाया जाने वाले ऑक्सीटोसिन नाम का रसायन। इसे अक्सर सेक्स हारमोन भी कहा जाता है। यह तकरीबन सभी स्तनधारी प्राणियों में पाया जाता है। पक्षियों में इस रसायन का एक दूसरा रूप होता है, जिसे मेसेटोसिन कहते हैं, भूमिका इसकी भी वही होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ नेबरेस्का लिंकन के वैज्ञानिकों ने कुछ पक्षियों को इस रसायन की अतिरिक्त खुराक दी। यह प्रयोग कोयल के आकार वाले पिनयन जे नाम की पक्षी पर किया गया। चीड़ के पेड़ों पर घोंसला बुनने वाले पिनयन जे जोड़ी बनाकर रहते हैं और इन जोड़ियों के बड़े-बड़े समूह होते हैं। अपने प्रयोग में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन पक्षियों के शरीर में यह अतिरिक्त खुराक गई, उनका सामाजिक व्यवहार कई तरह से बदल गया। एक तो इसके कारण उन पक्षियों का अपने समूह के अन्य पक्षियों से सामान्य मेल-मिलाप बढ़ गया। सबसे बड़ी बात उन्होंने यह पाई कि ऐसे पक्षियों ने मिलने वाला सारा खाना खुद ही चट कर जाने की बजाय, उसे अपने साथी के साथ मिल-बांटकर खाना शुरू कर दिया। वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसे पक्षियों में विनम्रता भी बढ़ गई। मोटे तौर ये वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि इस हारमोन को भले ही प्यार और सेक्स से जोड़कर देखा जाता हो, लेकिन वह एक बहुत बड़ी सामाजिक भूमिका भी निभाता है, जो इस हारमोन के बढ़ने के साथ ही बढ़ जाती है। हालांकि स्तनधारियों या खासकर इंसान में ऑक्सीटोसिन भी ठीक ऐसी ही भूमिका निभाता होगा, ऐसा अभी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। लेकिन पिनयन जे पर हुए प्रयोग ने यह तो साबित कर ही दिया कि इस तरह का हारमोन एक से ज्यादा तरह की भूमिकाएं निभाता है।
हालांकि मानव समाज के समीकरण पक्षी समाज के समीकरणों की तरह सरल नहीं हैं। धर्म, जाति, रंग, भाषा, क्षेत्र, देश और यहां तक कि सामाजिक व आर्थिक हैसियत की दीवारों ने इसे ढेर सारी जटिलताएं दे दी हैं। ऐसी जटिलताएं कट्टरता पैदा करती हैं, जो न विज्ञान की सुनती हैं, न मनोविज्ञान की देखती हैं और न समाजशास्त्र को समझती हैं। इसलिए जिस प्रेम को समाज का नायक होना चाहिए था, उसे समय-समय पर खलनायक बना दिया जाता है। शरीर क्रिया विज्ञान हमें एक और सुबूत दे रहा है कि जिसे हम प्यार कहते हैं, वे हमारे समाज को तोड़ने का नहीं, जोड़ने का उपक्रम है।


अमर उजाला

युवा और स्त्री शक्ति का दबदबा
ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत 66 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर तो रहा ही, युवा खिलाडियों और महिलाओं का प्रदर्शन भी खास तौर पर बेहद उल्लेखनीय रहा। निशानेबाजी में सात स्वर्ण समेत 16 पदक, कुश्ती में पांच स्वर्ण सहित 12 मेडल, भारोत्तोलन में पांच स्वर्ण समेत नौ पदक, मुक्केबाजी में तीन स्वर्ण समेत नौ पदक, टेबल टेनिस में तीन स्वर्ण समेत आठ पदक, बैडमिंटन में दो स्वर्ण समेत छह पदक, एथलेटिक्स में एक स्वर्ण समेत तीन पदक आदि भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिभा-क्षमता के सबूत हैं। निशानेबाजी में पंद्रह साल के अनीश भानवाल और सोलह साल की मनु भाकर ने स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय खेल में युवा प्रतिभाओं की धमाकेदार मौजूदगी दर्शाई, तो मनिका बत्रा सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी के रूप में उभरकर सामने आईं, जिन्होंने टेबल टेनिस के महिला एकल और टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीता, तो महिला युगल और मिश्रित युगल स्पर्धा में कांस्य जीतकर सभी प्रतिस्पर्धाओं में पदक जीतने का दुर्लभ कीर्तिमान बनाया। ऐसे ही मीराबाई चानू, संजीता चानू, पूनम यादव, हीना सिद्धू, तेजस्विनी सावंत, श्रेयसी सिंह, विनेश फोगाट आदि ने भारतीय खेलों में स्त्री शक्ति के वर्चस्व को रेखांकित किया, तो सुशील कुमार, मैरी कॉम और साइना नेहवाल के स्वर्ण पदकों ने बताया कि उनके अनुभवों का अब भी कोई मुकाबला नहीं है। भारत न केवल बैडमिंटन के पुरुष और महिला एकल के फाइनल में पहुंचा, बल्कि महिला एकल में दो बेहतरीन भारतीय खिलाड़ियों- साइना नेहवाल और पीवी सिंधु के बीच भिड़ंत से साबित हुआ कि इस खेल में भारत निरंतर एक ताकत बनता जा रहा है। पुरुष फाइनल में किदांबी श्रीकांत ने हारने के बावजूद शानदार खेल दिखाया। नए खेलों में दबदबे के बीच राष्ट्रीय खेल हॉकी में पुरुष और महिला, दोनों टीमों का खाली हाथ लौटना हताश करने वाला है। सिरिंज विवाद से शुरुआत के बाद आखिर में साइना नेहवाल के पिता का खेलगांव में न पहुंच पाने का मामला भी हमारे खेल अधिकारियों के लिए सबक होना चाहिए। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड की तुलना में पदों का फर्क बताता है कि हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। इसके बावजूद गोल्ड कोस्ट में हमारे खिलाड़ियों की उपलब्धि ने देश को गौरवान्वित तो किया ही है।


राजस्थान पत्रिका

खिलाडियों को दें मौका

बर्मिंघम में 2022 में मिलने के वादे के साथ गोल्ड कोस्ट (आस्ट्रेलिया) में 21वें राष्ट्रमंडल खेलों का भव्य समापनहो गया। करैरा स्टेडियम में हजारों दर्शकों के बीच कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष लुइस मार्टिन ने खेलों के समापन की घोषणा की। इस बार न्यूजीलैंड के भारोत्तोलक डेविड लिटि को सर्वश्रेष्ठ एथलीट चुना गया। भारत के लिए ये खेल स्वर्णिम सफलता भरे रहे। दिल्ली (2010) व मैनचेस्टर (2002) खेलों के बाद भारतीय दल ने सर्वाधिक पदक हासिल कर तालिका मेंआस्ट्रेलिया व इंग्लैंड के बाद तीसरा स्थान प्राप्त किया। 2012 में भारतीय दल को 101 तथा मैनचेस्टर में 69 पदक मिले थे। गोल्ड कोस्ट खेलों में 71 देशों ने भाग लिया। भारतीय खिलाड़ियों ने कुल 66 (26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य) पदक जीते। आखिरी दिन सायना नेहवाल ने भारत की ही पी. वी. संधू को हरा बैडमिंटनएकल का स्वर्ण जीता। भारत के दो एथलीटों को जरूर कमरे में सुई मिलने के कारण खेलों से बाहर होना पड़ा। इस एक घटना को छोड़ भारतीय दल का प्रदर्शन कुल मिलाकर उत्साहवर्धक रहा।।भाला फेंक स्पद्धों में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण हमारी झोली में आया तो पहलवानी, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, टेबल टेनिस, बैडमिंटन में पुरुष ही नहीं महिला खिलाड़ियों ने भी सफलता की नई इबारत लिखी। 36 वर्षीय मुक्केबाज और तीन बार विश्व विजेता रहीं मैरीकॉम ने राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार स्वर्ण पदक जीता। भारतीय दल की सफलता से देश में हर खेल प्रेमी को गर्व है। अब सरकार को देखना है कि वह टोक्यो में 2020 में होने वाले ओलम्पिक खेलों के लिए अभी से खिलाड़ियों को हर संभव मदद दे। खिलाड़ियों में प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन खेल संगठनों में अधिकारी जमाए बैठे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी के वे अक्सर शिकार हो जाते हैं। कभी उन्हें विश्वस्तरीय कोच नहीं मिलते तो कभी विदेशी धरती पर अभ्यास का मौका नहीं मिलता। चूकि खेल मंत्रालय भी ओलम्पिक पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के पास है और प्रधानमंत्री स्वयं घोषणा कर चुके हैं कि खेलों और खिलाड़ियों के लिए संसाधनों की कमी नहीं होने देंगे, सरकार को खेलों के विकास के लिए खिलाड़ियों को ही आगे करना चाहिए। ताकि राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता एशियन और फिर ओलम्पिक खेलों में भी हमारे खिलाड़ी दोहरा सकें।


दैनिक जागरण

कामयाबी की झलक

नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से 44 जनपदों को बाहर किया जाना इस बात का सूचक है कि सरकार नक्सली हिंसा पर लगाम लगाने में एक हद तक सफल हुई है, लेकिन वह इस सफलता पर संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकती और न ही उसे बैठना चाहिए। इसका कारण यह है कि नक्सली संगठन अपनी ताकत बटोरकर नए सिरे से हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने में माहिर हैं। कई बार वे सुरक्षा बलों की सक्रियता के चलते अपने कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन अतीत में यह सामने आया है कि वह इस दौरान अपनी ताकत बढ़ाने का काम करते हैं। इस बार वे ऐसा न करने पाएं और जिन जिलों में उनकी निष्क्रियता दर्ज की गई है वहां फिर से सक्रिय न होने पाएं, इसके लिए सरकार को सतर्क रहना होगा। नक्सली हिंसा में आई कमी के पीछे एक बड़ा कारण नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास योजनाओं को पहुंचाने में मिली सफलता है। अब इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सली न केवल विकास विरोधी हैं, बल्कि वे निर्धन एवं वंचित तबकों की झूठी आड़ भी लेते हैं। नक्सलियों के इस रवैये को बेनकाब करने की जरूरत है। यह काम मुश्किल इसलिए नहीं, क्योंकि आए दिन यह देखने को मिल रहा है कि नक्सली किस तरह विकास के कामों में बाधा पहुंचाते हैं। वे न केवल सड़कों के निर्माण के विरोधी हैं, बल्कि यह भी नहीं चाहते कि ग्रामीण इलाके संचार सेवा से जुड़ें और यही कारण है कि हाल के समय में सड़क निर्माण वाली कंपनियों को धमकाने और मोबाइल टॉवरों को नष्ट करने के मामले बढ़ते हुए दिखे हैं। 1अब यह एक सच है कि नक्सली संगठन निर्धन आदिवासियों एवं ग्रामीणों की आड़ में उगाही करने वाले संगठन में तब्दील हो गए हैं। वे माफिया गिरोह की तरह से काम कर रहे हैं। गांव-गरीब के हित से उनका कोई लेना-देना नहीं। यह तो पहले से ही स्पष्ट है कि संविधान और कानून में उनका कोई भरोसा नहीं। वे लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को भी कोई महत्व नहीं देते। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्ती दिखाने में संकोच नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन विडंबना यह है कि नक्सल प्रभावित राज्यों में कई ऐसे राजनीतिक एवं गैर राजनीतिक संगठन हैं, जो अपने स्वार्थो के चलते नक्सलियों की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मदद करते रहते हैं। इन संगठनों के खिलाफ भी सख्ती बरतने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त इस पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि आखिर नक्सली संगठन आधुनिक हथियार एवं विस्फोटक कहां से हासिल कर ले रहे हैं? पता नहीं नक्सलियों की हथियारों तक पहुंच को रोकने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? दरअसल यह काम भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह भी देखने की जरूरत है कि नक्सल प्रभावित राज्यों की पुलिस और अधिक सक्षम कैसे बने। इस मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नक्सलियों की कमर तोड़ने का काम मोटे तौर पर केंद्रीय सुरक्षा बलों ने किया है। नक्सली फिर से सिर न उठाने पाएं, यह सुनिश्चित करने का काम राज्य सरकारों और उनकी पुलिस को ही करना चाहिए।


देशबन्धु

सीरिया में तीसरे विश्वयुद्ध की आहत

शनिवार सुबह सीरिया में अजान की आवाज मिसाइलों के शोर के साथ सुनाई दी। अमेरिका ने एक बार फिर विश्व का रहनुमा बनते हुए तथाकथित शांति पाठ और दुष्टों का संहार करने के लिए सीरिया पर हमला बोला। इसमें उसका साथ फ्रांस और ब्रिटेन ने दिया। सीरिया पिछले सात सालों से गृहयुद्ध में फंसा हुआ है। इसे गृहयुद्ध कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहां लड़ाई केवल सीरिया की सरकार और विद्रोहियों के बीच नहीं है, बल्कि इसमें बाहरी तत्वों का दखल भी भरपूर है। यह कहा जा सकता है कि बाहरी देशों की मदद से ही दोनों पक्ष लड़ाई जारी रखे हुए हैं। अगर दखलंदाजी नहीं होती, तो शायद सरकार और विद्रोही आपस में वार्ता कर मतभेदों को दूर करने, शिकायतों के समाधान तलाशने की कोशिश कर सकते थे। पर इससे शांति स्थापित होती, जिससे पूंजीवाद का नुकसान होता।

सीरिया में इस वक्त जो हालात बने हैं, वैसे ही हालात इराक में भी थे। वहां सद्दाम हुसैन तानाशाही चला रहे थे, लेकिन बहुत से सुधारवादी, प्रगतिशील काम भी कर रहे थे, जिससे इराक की जनता का बड़ा वर्ग फायदे में था। सद्दाम हुसैन अमेरिका की धौंस में नहीं आते थे। जिसका बदला अमेरिका ने उस पर हमला करके लिया। विनाशकारी हथियार रखने का इल्जाम लगाकर पूरे इराक को तबाह किया गया, सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई। अमेरिकी जनता पर इस युद्ध का भार थोपा गया। बाद में कहा गया कि इराक में विनाशकारी हथियार नहीं मिले। अमेरिका की इस ज्यादती पर संयुक्त राषष्ट्र संघ ने कोई सख्ती नहीं दिखाई।

दुनिया के अधिकतर देश भी खामोश ही रहे। अब अमेरिका वही खेल सीरिया में खेलने पहुंच गया है। यहां अरब क्रांति के बाद शुरु हुए गृहयुद्ध में अमेरिका ने विद्रोहियों की मदद की। जबकि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ देने रूस सामने आया। उन्हें अपने पिता से सत्ता विरासत में मिली। लेकिन वे सीरिया में सुधार और खुलेपन के हिमायती थे। पर कट्टरपंथी ताकतें उनकी प्रगतिशीलता में रोड़ा बन गईं।  2013 में सीरियाई सरकार पर आरोप थे कि उसने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है। लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरिया पर कोईर् कार्रवाई नहीं की थी। वे तब तक शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल कर चुके थे। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तो ऐसे किसी सम्मान का बोझ या दबाव भी नहीं है। वे शुरु से अमेरिका फर्स्ट यानी अमेरिका के व्यापारिक हितों को सबसे ऊपर रखे हुए हैं।

इसलिए इस बार भी जब सीरियाई सरकार पर आरोप लगा कि उसने डूमा शहर में रासायनिक हमले किए हैं, तो अमेरिका ने पहले चेतावनी दी और फिर हमला बोल दिया। अमेरिका ने कुल 120 मिसाइलें दागीं, जिसमें एक कीमत करीब साढ़े 9 करोड़ रुपए है, यानी कुल 11 सौ करोड़ रुपयों की मिसाइलें इस हमले में खर्च हुईं। शस्त्रागार में ये मिसाइलें रखी रहतीं तो हथियार निर्माता और मिसाइलें कैसे बेच पाते। अब फिर से सौ-डेढ़ सौ मिसाइलों की बिक्री की गुंजाइश बढ़ गई है। साथ ही विश्वयुद्ध जैसी नौबत बनेगी तो अमेरिका के साथ-साथ अन्य देश भी अपना रक्षा बजट बढ़ाएंगे। जनता को समझाएंगे कि तुम्हारी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास के बजट में कटौती करके हम देश को मजबूत बना रहे हैं। राष्ट्रप्रेम के नए पाठ लिखे जाएंगे, जिसमें जनता से ही त्याग मांगा जाएगा। कहने को लड़ाइयां देशों के बीच होती हैं, लेकिन उसका बोझ तो जनता ही उठाती है। ट्रंप जैसे व्यापारी जानते हैं कि जनता पर बोझ डालकर अमीर कैसे बना जाता है।

बहरहाल, सीरिया में जिस रासायनिक हथियार के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया, उससे वह साफ इंकार कर रहा है, रूस भी कह रहा है कि रासायनिक हथियारों का उपयोग नहीं हुआ है। अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस का भी कहना है कि सात अप्रैल को डूमा में सारिन गैस समेत दूसरे रासायनिक हथियारों के हमले की अमेरिका ने अभी पुष्टि नहीं की है। अलबत्ता उन्होंने क्लोरीन के इस्तेमाल की बात जरूर कही है।

हालांकि क्लोरीन का इस्तेमाल औद्योगिक रूप से भी होता है और इससे पहले कभी अमेरिका ने इसके इस्तेमाल पर सैन्य कार्रवाई नहीं की है। तो सवाल यह है कि जब यही तय नहीं है कि सीरिया ने रासायनिक हथियारों का उपयोग किया है, तो फिर उस पर कार्रवाई क्यों की गई और अमेरिका ने किस अधिकार से उस पर मिसाइल दागीं। अगर सीरिया की सत्ता मानवता के खिलाफ काम कर रही है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने उस पर सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की? अब अगर अमेरिका के हमलों का जवाब रूस देता है और फिर ईरान, चीन भी साथ आते हैं, तो क्या इससे तीसरे विश्वयुद्ध के हालात नहीं बनेंगे, जो पहले के युद्धों से अधिक खतरनाक होंगे, क्योंकि सबके पास परमाणु हथियार हैं।

मिसाइल हमले के बाद अमेरिका का दावा है कि मिशन पूरा हुआ। जबकि सीरिया कह रहा है कि उसने अधिकतर मिसाइलों को नष्ट कर दिया। यह भी कहा जा रहा है कि जिन सैन्य ठिकानों पर हमले हुए, उन्हें  सीरिया ने पहले ही खाली करा लिया था। कुल मिलाकर दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं और कौन सही है, कौन गलत, इसका निष्पक्ष निर्णय सुनाने वाला कोई नहीं है। दुनिया के लिए यह स्थिति गंभीर है।


The Times of India

New Nirbhayas
It’s just as well that Prime Minister Narendra Modi has lent his voice to growing outrage across the country at the horrendous violence against girls in Kathua and Unnao. His promise that justice will be delivered should be followed by stringent action against all criminals involved, including those responsible for obstructing justice – else the government’s ‘beti bachao’ slogan will ring utterly hollow. Public outrage at the crimes in Kathua and Unnao resembles the one that erupted after the 2012 Nirbhaya case, which was supposed to have been followed by course correction in the justice system. Clearly, that hope stands dispelled today.

The Unnao rape survivor faced more trauma after her father’s death in custody, her family’s exodus from their native village, and the UP police’s failure to arrest the accused BJP MLA until the Allahabad high court and CBI stepped in. In Kathua, J&K crime branch was hampered by raging protests by a Hindu Ekta Dal aided by local politicians. Both cases reflect political pressures that disrupt criminal investigations. The Nirbhaya protests were followed by a sweeping legislative response through amending rape laws. A similar trajectory is playing out again with ministers demanding death penalty for child rapists, a dangerous move giving perverse incentive to murder victims.
Parliament and assemblies have legislated for decades, but enough laws already exist to prosecute heinous crimes. The failure lies elsewhere: in registering crimes, launching serious prosecutions and delivering convictions. A related problem is political interference. Legislative changes at this point would be just a ploy by the political class to deflect public outrage. Meanwhile, police reforms enjoined by the Supreme Court have been hanging fire for more than a decade. Insulating police from political controls that influence promotions and transfers, recruiting more women cops and deploying them in special cells that investigate sexual offences, protecting witnesses, and improving forensic techniques are just some systemic reforms that are needed.

Alongside, governments must identify sexual predators among elected representatives and fast-track their cases. Being hard on one’s own sends a clear message down the line. A 2017ADR study of 4,852 election affidavits found that three MPs and 48 MLAs faced cases of crimes against women. Further, recognised parties gave tickets to 334 such candidates instead of shunning them. If political parties’ professions following Kathua and Unnao are genuine, they could start by cleaning up their own backyards.


The Indian Express

A Continuing Tragedy
After the United States, Britain and France rained missiles on Syria over the weekend, questions about the legitimacy and effectiveness of the action have come to the fore. For the critics, the absence of prior approval by the United Nations Security Council reflects the growing Western disregard for international law. Supporters of the decision say Syrian President Bashar al Assad’s use of chemical weapons on his own citizens is outrageous. Severe punishment, they say, is necessary to deter the production and use of these outlawed weapons of mass destruction. Critics, however, point to the fact that the Western bombings took place before an international team of experts verified the allegations on the use of chemical weapons. Whatever the merits of these arguments, the nuances of international law and ethical considerations in the use of force — just cause, last resort, proportionality and high probability of success — have long ceased to be relevant in the Middle East. What seems to matter is only politics and power — international and domestic.

The Middle East in general and Syria in particular have become victims of renewed great power rivalry, intensifying regional conflict and the breakdown of the internal political order in many countries. It is not just the Western powers and Russia who are using military force to pursue their political objectives in the region. Regional actors like Iran, United Arab Emirates, Saudi Arabia, Qatar, Turkey and Israel are all deeply involved in Syria’s brutal civil war. This new dynamic has cut across the traditional lines of the political divide in the Middle East. The UN Security Council’s rejection of a Russian resolution condemning the Western bombing of Syria underlines the profound international divisions. Only China and Bolivia backed the Russian resolution, the US and its European allies voted against. The only Arab country currently on the Security Council, Kuwait, sided with the West. Four other developing countries abstained.

It could even be said that the Western bombing of Syria makes little material difference to the balance of power on the ground. Even as he claimed that the bombing was successful, US President Donald Trump is signalling that he has no intention to be drawn deeper into the Syrian conflict. He wants to bring home the 2,000-odd US troops currently in Syria. The Western use of force was carefully designed to avoid an escalation of the confrontation with Russia and Iran, the main military backers of Damascus. The attack, which avoided targeting the Syrian leadership and its military command, also underlines the fact that the West is no longer interested either in ousting Assad from power or joining Russia in imposing regional peace. On a seemingly winning track, Assad seems to have no incentive for internal reconciliation. The tragedy in Syria, then, will continue to unfold.


The New Indian Express

The Trouble with this Banking Clean-Up
In March, RBI Governor Dr Urjit Patel said the central bank was ready to be the Neelkantha consuming poison, but the Brahmasthra was launched much before, February 12 to be precise, or on the day of Shivarathri. The circular was considered potent, as it knocked down all existing debt restructuring schemes, besides imposing harsh regulations including recognition of NPAs within a day after debt default. But bankers feel the regulator jammed the dagger in their back, just when the slate appeared clean. If banks were to comply with the new framework, a staggering `2 lakh crore worth stressed loans will head to the bankruptcy court, or are destined to the scrap heap in the absence of a resolution.

The Indian Banking Association believes the new framework affects credit cycle and asset quality due to higher provisions, even as half of the state-run banks are already in the ICU for poor track record. Banks sought relief, as not all defaulters are wilful like power producers who are facing difficulties with discoms.

Or take steel companies that are in a pickle due to volatile global market conditions and over supply from China. As a result, Indian steel makers who plonked down billions reached a point of no return, compelling banks to take steep haircuts. These assets may still hold high value, and a rushed fire sale just to comply with insolvency norms could prove harmful for lenders.

The RBI may not be out of its depth tightening norms, but the onus is squarely on the regulator to ensure that the access to credit for those in need, particularly SMEs, doesn’t dry up. Unlike large firms, SMEs cannot access alternate channels like corporate bond market and ensuring their survival is essential as they are the backbone of the Indian economy comprising over 90 per cent of the total corporate tax pool and also the largest employers. The zero tolerance on stressed assets will expose the sensitive underbelly of SMEs, which should be avoided at all costs.


The Telegraph

Face the Music

A leopard can ditch the grey sweatshirt for a suit and tie, but can it change its spots? The questioning of Mark Zuckerberg by the United States Congress ended in the former’s triumph. A majority of the Congressmen were woefully unaware of the topic at hand, allowing Mr Zuckerberg to run rings around them by parroting technological jargon. The time allotted for the event was also inadequate – each legislator had under five minutes to ask questions which ensured that even when the queries were on point, there were no follow-ups. Adding insult to injury, Mr Zuckerberg made $3 billion as Facebook’s stocks shot up while the questioning was live-streamed on the site. But most worrying is the State’s skewed understanding of the situation. The problems posed by Facebook are not about a few slip-ups, they are central to the company’s structure and the predicted consequences of its business model. Expecting a businessman to sacrifice his profit for greater ideals like the right to privacy is naive.

Whether or not Mr Zuckerberg is committed to protecting users’ data is not so important as what governments can do to guard citizens. What is needed are rigorous and comprehensive data privacy laws. The European Union’s general data protection regulation could serve as a model as it addresses key concerns regarding a person’s right over his information. But each country needs to tailor laws to suit its own needs as data privacy is perceived differently in different cultures. Take India for instance. At present, Facebook is shielded by Section 79 of the Information Technology Act that gives immunity to intermediaries on the internet – which is what Facebook would be between, say, Cambridge Analytica and an Indian user. The IT Act has failed to keep pace with advancement in technology and is in desperate need of an update. Then, the data protection framework that is being prepared by a committee of experts tries to cover a wide arc, but in the process it fails to analyse deeply certain core concerns. For example, the same regulation cannot apply to both the private and the public sectors if privacy is a fundamental right only vis-à-vis the State, as the legal basis of the two would then be different. Also, is it prudent to create an all-powerful regulator that can mete out punishments, given that it will be at the beck and call of the government and have the power to inspect data in the guise of audits? It will amount to a situation where, like now, there will be too much power in the hands of too few people.