Home काॅलम घाट घाट का पानी : मेरा ठौर

घाट घाट का पानी : मेरा ठौर

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Photo: Abhishek Srivastava


कुछ पन्नों को पलटने की कोशिश है. ऐसा कोई दावा नहीं कि मेरी ज़िन्दगी मानीख़ेज़ है, लेकिन कुछ ऐसा चक्कर था कि मेरे इर्दगिर्द ऐतिहासिक घटनायें होती रहीं. या मुझे ऐसा लगा. उन्हें कैसे देखा, महसूस किया, भोगा, झेला ?

पहली बात तो यह है कि जहां मैं ठहरा होता हूं, वहीं से हर चीज़ देखता हूं, वहीं से अपनी बात कहता हूं.

लेकिन क्या मैं किसी एक जगह पर ठहरा होता हूं. मैं ऐसा नहीं मानता.

शुरू के 26 साल बनारस में. बनारस के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में, शहर के बंगाली पारिवारिक-सांस्कृतिक माहौल में, कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल में. स्कूल (सेंट्रल हिंदू स्कूल) में जिस शिक्षक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा, वह आरएसएस के ज़िला सरसंघचालक थे. लड़कों को अपनी विचारधारा के तहत लाना उनका मिशन था, और उनके विचारों को काटने की कोशिश करना मेरी ज़िद. हमेशा उनसे प्रोत्साहन मिलता था, फिर भी क्लास में सारे लड़के एक तरफ़, और दूसरी ओर मैं अकेला. अल्पसंख्यक होने का अहसास शायद पहली बार तभी मिला था.

बनारसी माहौल में अगर मुझे बंगाली समझा जाता था, तो पहली बार 14 साल की उम्र में कोलकाता पहुंचने पर पता चला कि मैं तो खोट्टा हूं. इसके अलावा मैं रवींद्रनाथ का भक्त था, तो हमउम्र के बंगाली लड़के जीवनानंद पढ़ते थे. कोलकाता जाने का सिलसिला जारी रहा… कुछ एक सालों में मैं भी काफ़्का, सार्त्र, बोदलेयर और रिलके से लैस हो चुका था, लेकिन गैर होने का अहसास बरकरार रहा.

इस बीच बदनामी बढ़ती जा रही थी–  लड़का सिर्फ़ पार्टी ही नहीं करता है, कविता भी लिखने लगा है. बांगला में एक पत्रिका निकाली, जो दो अंकों के बाद मर गई. हिंदी में कविताएं छपीं, काशीनाथ सिंह को प्रतिभा दिखी, कॉलरदार कुर्ता पहनकर अस्सी जाने लगा, और वहां पहुंचते ही बनारस के सबसे महान कवि एक रुपये का नोट थमाकर कहते थे, जाओ बेटा, चार बीड़ा पान लगाकर ले आओ. मित्रों के बीच उन्होंने कहा था–  कसिया को एक बंगाली लौंडा मिल गया है, क-वि है!

घर में सब परेशान थे, आखिर बीए पास करने में कितने साल लगते हैं? पैसे की किल्लत थी, सो फुटपाथ पर किताब बेचने लगा. ब्रेष्त की कविताओं के अनुवाद के ज़रिये बनारस के बाहर भी थोड़ा बहुत परिचय बढ़ा, संयोग कुछ ऐसा हुआ कि रेडियो की नौकरी लेकर पूर्वी बर्लिन आ गया. उम्र अभी 27 से कम थी.

लगभग 40 साल से जर्मनी में हूं. शुरू के दस साल पूर्वी जर्मनी के थे. परिवार बना, जर्मन भाषा व संस्कृति से परिचित होने का मौका मिला. नामी-गिरामी जर्मन लेखकों और संस्कृतिकर्मियों से निकटता हुई. पहले पार्टी के हलकों में उदारवादी के रूप में मुझे शक की नज़र से देखा जाता था, यहां समस्याएं कहीं विकट रूप से सामने आईं. तथाकथित असंतुष्टों से संपर्क बने. काफ़ी मुमकिन था कि नौकरी जा सकती थी. लेकिन जब तक ऐसी नौबत आती, जर्मनी एकीकरण के कगार पर खड़ा था. लाखों की नौकरियां गईं, संयोग से मुझे (पश्चिम) जर्मन रेडियो में ले लिया गया.

एकीकरण से पहले-पहले एक सपना था कि अब मुकम्मल समाजवाद आने वाला है. पूंजी के बुलडोज़र के नीचे यह बेवकूफ़ी जल्द काफ़ूर हो गई. यूरोपीय समाज में फैली उदारता के बीच धीरे-धीरे अपनी चमड़ी के रंग का अहसास पक्का होने लगा. बर्लिन छोड़कर कोलोन आया, एक दिन प्रोग्राम डायरेक्‍टर ने बड़े प्यार से कहा, यहां भारत के बहुत सारे लोग रहते हैं. घर जैसा महसूस करोगे.

गनीमत है कि ‘’घर जैसा महसूस करने’’ की ज़रूरत अभी तक नहीं पड़ी है. भारत के दोस्त हैं, पाकिस्तान के भी–  उससे कहीं ज़्यादा तुर्क या ईरानी. और ज़ाहिर है कि जर्मन दोस्त. वे अक्सर पूछते हैं, जर्मन नागरिकता क्यों नहीं लेते हो. अब उनसे क्या बताऊं. मुझे जर्मनी के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ लेनी पड़ेगी. भारतीय पासपोर्ट तो ऐसे ही मिल गया था. लिया भी था, क्योंकि विदेश यात्रा करनी थी. सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भों से तो जुड़ा हूं, लेकिन पिछले तीन दशकों में राष्ट्रीयता की भावना लगातार घटती गई है. और अगर मेरी भारतीय देशभक्ति ही संदिग्ध है, तो फिर जर्मनी के प्रति निष्ठा कहां से आएगी?

कुछ साल पहले एक जर्मन पत्रिका के साथ साक्षात्कार में मुझसे पूछा गया था: आप कहां घर जैसा महसूस करते हैं? जर्मनी में या भारत में? मेरा जवाब था: न यहां, न वहां– मेरा एक तीसरा ठौर है. यह तीसरा ठौर बाकी दोनों की मिलावट से नहीं बना है, बल्कि उनके साथ तनाव से. साथ ही- अपने दौर के साथ तनाव से. इसी तनाव के ज़रिये मैं सबके साथ जुड़ा हुआ हूं. अकेला नहीं हूं.

अगले रविवार तक.

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