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घाट घाट का पानी : क्‍या तुमने घोड़े पर सवार सम्राट के नीचे छोटी मूर्तियों को देखा है?

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टाखेलेस यिद्दिश भाषा से लिया गया जर्मन शब्द है, जिसका मतलब है सीधी-सपाट या खरी-खोटी बातें. जहां अभी तीन साल पहले तक टाखेलेस हुआ करता था– शहर के केंद्र में ओरानियेनबुर्गर टोर के पास एक टूटा-फूटा मकान, जिसे अपने कब्ज़े में लेकर शहर के (ख़ासकर पूर्वी हिस्से के) युवा अपना अड्डा बना चुके थे– वैकल्पिक अराजकतावादी संस्कृति का केंद्र, आज वह कुछ उजड़ा-उज़ड़ा सा लगता है. यह इलाका सारे यूरोप के आवारा युवा संस्कृतिकर्मियों का मक्का बन चुका था. मकान अब भी उसी हालत में है, उसके सामने कई रेस्त्रां पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, जिनमें से एक भारतीय रेस्त्रां भी है. सामने आइंस्टाइन कैफ़े में युवा मैनेजर से पूछता हूं: क्या हाल है इलाके का? मुंह बिचकाकर वह जवाब देता है– सन्नाटा है. बिजनेस कैसा चल रहा है? – मेरा अगला सवाल. शिकायत करना मुश्किल है– वह जवाब देता है. इससे बड़ी तारीफ़ बर्लिनवाले से उम्मीद नहीं की जा सकती. मुस्कराकर सामने (भूतपूर्व) टाखेलेस की ओर देखता हूं. विशाल तख्ती पर हाइनर म्यूलर के नाटक Anatomie Titus Fall of Rome के प्रदर्शन की घोषणा. इस नाटक की प्रस्तुति के बाद ही टाखेलेस को यह भवन छोड़ना पड़ा था.

हाइनर म्युलर, ब्रेष्त के बाद जर्मन भाषा के सबसे बड़े नाटककार. मुझे 1989-90 में उनसे एक बातचीत याद आ गई. शहर के केंद्र में शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन जहां शुरू होती है, वहां चंद साल पहले जर्मन सम्राट फ़्रीडरिष द्वितीय की विशाल मूर्ति स्थापित की गई थी. हाइनर म्यूलर का सवाल: “घोड़े पर सवार सम्राट के नीचे छोटी मूर्तियों को देखा है?“ “हां, कौन सी ख़ास बात हैं उनमें?“ खांटी ह्विस्की की छोटी सी चुस्की लेने के बाद हाइनर का जवाब: “सामने जनरलों और पादरियों की मूर्तियां, और पीछे जहां घोड़ा हगता-मूतता है, वहां जगह दी गई है लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को. हां, यह जर्मन इतिहास है.“

कुछ ख़ूबसूरत हैं, कुछ बदसूरत, लेकिन बर्लिन में विशाल भवनों की भरमार है. सम्राटों के ज़माने के भवन, तानाशाहियों के ज़मानों के भवन, और अब पूंजीवाद का जयगान करते हुए भवन,  ख़ासकर शहर के केंद्र में–  बर्लिन शहर आज जर्मन मेगालोमैनिया की कार्यशाला– उसका मंच बन चुका है. कला की दूसरी विधाएं भले ही दम तोड़ रही हों, वास्तुकला अल्हड़पन के साथ बेरोकटोक अपनी जवानी का प्रदर्शन कर रही है. टाखेलेस से टहलते हुए फ़्रीडरिशश्ट्रासे तक पहुंचता हूं. दाहिने जाने पर ब्रेष्त की समाधि मिलेगी, बाएं ब्रेष्त की आख़िरी कर्मभूमि बर्लिनर आंसाम्बले. मैं बाईं ओर का रास्ता पकड़ता हूं. थोड़ी देर बाद मोड़ आता है, दाहिनी ओर बर्लिनर आंसाम्बले का भवन दिखाई दे रहा है. नहीं, आज ब्रेष्त के चक्कर में कतई नहीं पड़ना है, मैं आगे स्टेशन की ओर बढ़ जाता हूं. लेकिन ब्रेष्त महाराज मेरा पीछा नहीं छोड़ते– स्टेशन का बाहरी हिस्सा अब भी पुराने दिनों की याद दिलाता है. इन्हीं सीढ़ियों पर ब्रेष्त महाशय हाथ में गुलदस्ता लेकर अपनी नई कमसिन नायिका गिज़ेला माई का इंतज़ार कर रहे थे. वादे के मुताबिक गिज़ेला आई तो ज़रूर, लेकिन इस बीच उसे पता चल चुका था कि ब्रेष्त ने उसी दिन हेलेने वाइगल से शादी की है. ब्रेष्त ने जब उसकी ओर गुलदस्ता बढ़ाया था, तो जल-भुनकर गिज़ेला ने कहा था– कम से कम आज का दिन तो रहने देते. आज तुमने शादी की है! नासमझ मासूमियत के साथ ब्रेष्त ने पलटकर सवाल किया था– तो क्या हुआ?

बर्लिन आने पर मेरा मन बिल्कुल दकियानूस हो जाता है, सिर्फ़ दकियानूस ही नहीं, बेहद मर्दवादी. मुझे यह शहर एक बेहया औरत की तरह लगता है, जो लाज-हया की परवाह किये बिना बड़े ही बेहूदे ढंग से अपना अंग प्रदर्शन करती है. और ख़ासकर शहर के केंद्रीय इलाके में घूमते हुए मैं बर्लिन की ख़ास बोली सुनने को तरस जाता हूं– चारों ओर सिर्फ़ टूरिस्ट, अगर वे जर्मन भी बोलते हैं तो देश के अलग-अलग इलाकों के उच्चारण के साथ. रेस्त्रां या कैफ़े में सुंदरी बाला मुझसे बड़े प्यार से जर्मन अंदाज़ के साथ अंग्रेज़ी में बात करती है, पहले मैं तुनक कर जर्मन में जवाब देता था, अब सिर्फ़ मुस्कराता हूं. सिर्फ़ बस ड्राइवर की बातों में मिठास नहीं होती है, और मैं ख़ुश हो जाता हूं. खांटी बर्लिनवाले के तौर-तरीके में एक खुरदरापन होता है, और उसी खुरदरेपन का अहसास पाने के लिये मैं बार-बार लौट-लौटकर बर्लिन आता रहता हूं.

शाही सड़क उंटेर डेन लिंडेन के बीचोबीच स्थित है बर्लिन का परिचित प्रतीक ब्रांडेनबुर्ग गेट, इस ऐतिहासिक गेट के पश्चिमी हिस्से की सड़क का नाम बदलकर 17 जून मार्ग कर दिया गया था, इस तरह अब उंटेर डेन लिंडेन सिर्फ़ गेट के पूरब की ओर है. इसी तरफ़ मशहूर प्रशियाई वास्तुकार शिंकेल रचित सारे भवन स्थित हैं: हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय, प्रिंसेन पैले, स्टेट ऑपेरा भवन और बेबेलप्लात्ज़, जहां नाज़ियों ने किताबों की होली जलाई थी. इनमें विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की वे सभी किताबें थीं, जो नाज़ियों की राय में जर्मन राष्ट्रवाद के अनुरूप नहीं थीं– जर्मन व विश्वसाहित्य की लगभग सारी अमर रचनाएं. गोएथे और शिलर को उन्होंने बख़्श दिया था. मैंने सुना है कि जलाई गई किताबों में रवींद्रनाथ की रचनाएं भी शामिल थीं. इज़्ज़त बच गई हमारे गुरुदेव की.

एक पुरानी कहानी: पब के अंदर घुसकर युंकर अफ़सर ने चारों ओर देखा, एक खाली बेंच पर बैठकर अपनी बेल्ट ढीली की. वेटर ने उसके सामने बियर का घड़ा और मग रख दिया. मग में उड़ेलकर बियर गटकने के बाद उसने एक लंबी सांस ली. क्या ज़माना आ गया है! कमीनों पर गोली चलानी पड़ी, भाग गये, नहीं तो और कई को ख़त्म कर दिया जाता. उन दोनों को भी बंद कर दिया गया है. सालों ने एक नई पार्टी बनाई है- कम्युनिस्ट पार्टी. और वह सुअर की बच्ची तो यहूदिन है. अब राइख़्सटाग में सोशलिस्ट लोग भी बदमाशी पर तुले हुए हैं. देखा जाए, मामला कहां जाता है. बेचारा सम्राट!

बियर का मग खाली हो चुका था. घड़े से उड़ेलकर वह एक सांस में पी गया. मग को सामने टेबुल पर पटककर तीखी आवाज़ में वह चिल्ला उठा: Die Sau muss weg! ख़त्म कर दो सुअर की बच्ची को! सब लोग उसकी ओर देखने लगे. कोने में बैठा एक सैनिक अपनी जगह से उठा. बिना कुछ बोले वह पब से बाहर निकल गया.

घंटे भर बाद वह सैनिक लौटा. युंकर अफ़सर के सामने खड़े होकर सधी हुई आवाज़ में उसने कहा: ख़त्म हो गई सुअर की बच्ची.

बर्लिन के लांडवेयर कानाल में कार्ल लीबक्नेष्त और रोज़ा लुक्सेमबुर्ग की लाशें बहा दी गई थीं.

कोई 25 साल पहले शाम के एक अड्डे में हाइनर म्युलर के साथ बात हो रही थी. मैं बियर पी रहा था, हाइनर हमेशा की तरह नीट ह्विस्की. लगभग न सुनाई पड़ने लायक धीमी आवाज़ में रुक-रुक कर हाइनर ने कहा: रोज़ा की मौत के बाद यूरोप के नवजात कम्युनिस्ट आंदोलन में कोई नहीं रह गया था, जो लेनिन जैसी महान क्रांतिकारी प्रतिभा, लेकिन मध्यवर्गीय लोकतंत्र विरोधी से लोहा लेता/लेती. लेनिन का नतीजा था स्तालिन, स्तालिन का नतीजा हिटलर,  हिटलर का नतीजा विश्वयुद्ध, शीतयुद्ध, बर्लिन की दीवार, और जहां दीवार थी उसके नज़दीक पोट्सडामर प्लात्ज़ में आज सोनी का गगनचुंबी भवन, जिसे देखने के लिये ऊपर की ओर ताकते हुए गर्दन दुखने लगती है.

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