Home काॅलम घाट घाट का पानी : और जनता बदल गई!

घाट घाट का पानी : और जनता बदल गई!

SHARE

17 जून की बगावत के बाद

लेखक संघ के सचिव ने

स्तालिन मार्ग में पर्चे बंटवाए

जिनमें कहा गया था, जनता

सरकार का विश्वास खो चुकी है

और सिर्फ़ दुगुनी मेहनत के ज़रिये ही

उसे वापस हासिल कर सकती है. होता न

कहीं आसान, कि सरकार

विसर्जित कर देती जनता को

चुन लेती एक और ?

1953 में कम्युनिस्ट सरकार के ख़िलाफ़ कामगारों की बगावत और उसे कुचल दिये जाने के बाद बैर्तोल्त ब्रेष्त ने यह कविता लिखी थी. उन्होंने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी : पार्टी पहली बार जनता से रूबरू हो रही है.

1990 का दौर पार्टी के लिये फिर एकबार जनता से रूबरू होने का दौर था. इसने पार्टी को तोड़ डाला, जिसमें से एक नई वामपंथी पार्टी का उभरना शुरू हुआ. पहली बार बहुदलीय प्रतिद्वंद्विता के साथ पूर्वी जर्मन संसद का चुनाव हुआ. अनुदारवादी गंठजोड़ को 48 फ़ीसदी मत मिले, सोशल डेमोक्रैटों को लगभग 22 फ़ीसदी और सत्तारूढ़ कम्युनिस्टों की उत्तराधिकारी पीडीएस को 16.4 फ़ीसदी. पार्टी जनता का विश्वास खो चुकी थी, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि वह आबादी के एक महत्वपूर्ण अल्पमत का प्रतिनिधित्व करती है. यह अल्पमत आने वाले सालों में लगातार बढ़ने वाला था, लेकिन 1990 में वह दीवार से पीठ सटाकर खड़ा था.

इससे पहले गोर्बोच्योव और हेलमुट कोल की बैठक में तय हो चुका था कि पश्चिम जर्मनी के साथ पूरब के एकीकरण पर सोवियत संघ को कोई एतराज़ नहीं होगा. फिर आया मुद्रा सुधार. पूरब में भी पश्चिम की मुद्रा डॉएचमार्क का प्रचलन शुरू हो गया. अब रह गया था द्वितीय विश्वयुद्ध की विजेता सत्ताओं के बीच प्रतिरक्षा के सवालों पर समझौता, जिनके प्रमुख मुद्दे थे पूरब की धरती से सोवियत सेना की वापसी की शर्तें और नाटो की संरचना में पूरब को शामिल करने की प्रक्रिया. इनके लिये चार विजयी सत्ताओं और दो जर्मन राज्यों के प्रतिनिधियों की चार जमा दो वार्तालाप शुरू हुए. वार्तालाप के बाद इन 6 पक्षों में से सिर्फ़ पांच बाकी रह गये. 3 अक्टूबर को पश्चिम जर्मन संविधान की धारा के अनुसार पूर्वी जर्मनी पांच प्रदेशों के रूप में जर्मन संघीय गणराज्य के हिस्से बन गये.

एक ऐतिहासिक प्रक्रिया चल रही थी और हम रेडियो व उसके कर्मियों के भविष्य के सवाल में उलझे हुए थे. बाहरी दुनिया में पूर्वी जर्मन पार्टी व सरकार की आवाज़ के रूप में हमारा रेडियो काम करता था. ज़ाहिर है कि देश के एकीकरण के बाद उसकी ज़रूरत पूरी तरह से ख़त्म हो जानी थी. सारे देश में कारखाने व संस्थान बंद हो रहे थे, कामगारों को सड़क पर उतार देने का सिलसिला शुरू हो चुका था. पश्चिम जर्मन रेडियो डॉएचे वेल्ले एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मन रेडियो का मालिक बनने वाला था. क्या नये स्वरूप में कार्यक्रम पेश किये जाते रहेंगे ? क्या पूर्वी जर्मन कर्मियों की नौकरी बनी रहेगी ? कितनों की नौकरी बनी रहेगी ? देश के साथ-साथ रेडियो के एकीकरण की प्रक्रिया कैसी होगी ?

कोई प्रक्रिया-वक्रिया नहीं हुई. 3 अक्टूबर को पूर्वी जर्मन विदेश प्रसारण संस्था पश्चिम के मालिकाने में आ गया. लगभग 200 कर्मियों में से 20 को डॉएचे वेल्ले में नौकरी दी गई. बाकी लोगों को तीन महीने के लिये वेतन के साथ एक तथाकथित प्रतीक्षा सूची में रखा गया. नौकरी न दिये जाने की हालत में तीन महीने की अवधि समाप्त होने पर वे बेरोज़गार होने वाले थे. और वे सबके सब बेरोज़गार हो गये.

1990 की शुरुआत से ही पश्चिम जर्मन रेडियो के ट्रेड युनियन के साथ मेरे संबंध बन चुके थे. वे चाहते थे कि किसी न किसी रूप में मुझे डॉएचे वेल्ले में काम करने का मौका मिले. उनकी विशेष दिलचस्पी इसमें थी कि कुछ वामपंथी भी आवें. दूसरी ओर, पश्चिम के प्रबंधन की पूरी कोशिश थी कि किसी वामपंथी को न आने दिया जाय. लेकिन प्रबंधन को पूर्वी जर्मन कर्मियों के बारे में कुछ भी न पता था. चूंकि मैं 1989 से पहले किसी चुने हुए पद पर नहीं था और परिवर्तन का दौर शुरू होने के बाद उचककर सामने आ गया था, शायद मेरे बारे में एक ग़लतफ़हमी हो गई थी कि मैं पूर्वी जर्मन शासन के ख़िलाफ़ सक्रिय रहा हूं. इसके अलावा और एक बात हो सकती है, जिसके सबूत मेरे पास नहीं है : लगभग चालीस कर्मियों की एक तालिका बनाई गई थी, जिनमें से 14 पत्रकारों सहित 20 लोग छांटे गये. इन चालीस लोगों  की फ़ाइलें पूर्वी जर्मन गुप्तचर विभाग से मंगाई गई थी. गुप्तचर विभाग के साथ जिन लोगों के संपर्क थे, उन्हें तुरंत तालिका से बाहर कर दिया गया. मुझे लगता है कि मेरी फ़ाइल में शायद कुछ नकारात्मक बातें कही गई थीं, जो नई राजनीतिक हालत में मेरे लिये सकारात्मक बन गई. इसके अलावा मैं दो भाषाओं – हिंदी और बांगला में काम कर सकता था, जर्मन साहित्य का अनुवादक था, जर्मन भाषा में भी लिखने लगा था. बहरहाल मुझे नौकरी मिल गई. बीस लोगों की हमारी टीम का काम था बर्लिन से रिपोर्टें भेजना, जिनमें स्पष्ट हो कि देश के एकीकरण की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ रही है.

इस बीच एक नई स्थिति उभर रही थी, जो मेरे लिये निजी तौर पर भी ख़तरनाक़ होने वाली थी. पश्चिम की नवनाज़ी ताकतें, जिन्हें अब तक कोई ख़ास समर्थन नहीं मिल रहा था, पूरब की खाली ज़मीन पर अपने विषैले पौधे रोपने की रणनीति बना रहे थे. राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अस्थिरता के चलते ख़ासकर नौजवानों का एक हिस्सा तुरंत उनकी ओर आकृष्ट हुआ. मेरे घर से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर नवनाज़ियों ने एक मकान पर कब्ज़ा कर लिया था. उसे केंद्र बनाकर वे समूचे इलाके में राजनीतिक विरोधियों, और ख़ासकर विदेशियों पर हमले करते थे. मेरे घर के ठीक बगल में वियतनामी प्रशिक्षार्थियों का हॉस्टल था. एकदिन शाम को आठ बजे काम से लौटते हुए एक वियतनामी युवती पर हमला किया गया. पूर्वी जर्मनी के सभी इलाकों से विदेशियों पर हमलों की ख़बरें आ रही थी. उत्तर के नगर रोस्टोक और दक्षिण में हॉयर्सवैर्डा में विदेशियों की बस्तियों में नवनाज़ी गुंडों के गिरोहों ने ज़बरदस्त हमले किये. स्थानीय जनता की भीड़ ताली बजाकर उन्हें जोश दिला रही थी. विदेशियों को बचाने के लिये पुलिस की हिफ़ाज़त में उन्हें वहां से हटाया गया. बर्लिन के आसपास दो भारतीय नागरिकों की पिटाई की भी ख़बर आई.

मेरी पत्नी की नौकरी जा चुकी थी. मुझे नौकरी मिल गई. परिवार एक आर्थिक संकट से बच गया. लेकिन मैं सोच रहा था – इस माहौल में रहूंगा कैसे ?

पिछले अंक पढ़ने के लिए यहां जाएं

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.