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चुनाव चर्चा: राजनीतिक चंदे की पड़ताल उर्फ़ ‘तुम इतना जो लुटा रहे हो, कहाँ से लाए छिपा रहे हो!’

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चंद्र प्रकाश झा 


 

11 अप्रैल 2018 को मीडिया विजिल ने चुनावी चंदो के गोरखधंधा विषय पर एक रिपोर्ट दी थी।  तब से भारत की चुनावी व्यवस्था में बहुत पैसा बह चुका है और कई नए घटनाक्रम भी सामने आये हैं। स्वाभाविक है कि मीडिया विजिल अपनी पुरानी रिपोर्ट का फॉलो आप कर पाठकों को नए तथ्यों से अवगत कराये। दो नए घटनाक्रम यह है कि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने  चंदों के बारे में संसद के बजट सत्र में पारित केंद्र सरकार के  संशोधन विधेयक की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका विचारार्थ स्वीकार कर  ली।  इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस  दीपक मिश्रा की एक बेंच ने  2 जुलाई को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।

इस याचिका में संसद द्वारा पारित वित्त विधेयक 2018 के सेक्शन 217 और सेक्शन 236 को निरस्त करने की याचना  की गई है , जिनके तहत विदेशी चंदे के क़ानून में नियमन को लुंज -पुंज बना दिया गया है। यह याचिका, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) नामक एक  स्वैच्छिक संस्था ने दाखिल की है। इसे तैयार करने वालों में सुप्रीम कोर्ट का प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण शामिल है। याचिका पर सुनवाई लंबित है।  केंद्र सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस सर्मा इस स्वैच्छिक संस्था जुड़े हुए हैं। एडीआर के अनुसार इस बार के बजट सत्र में एफसीआरए कानून में संशोधन दिल्ली हाई कोर्ट के मार्च 2014 के उस निर्णय को नकारने के लिए किया गया जिसमें भाजपा और कांग्रेस, दोनों को विदेशी चंदे लेने में क़ानून का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया था। हाई कोर्ट के आदेश में निर्वाचन आयोग से इन दोनों पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

दूसरा नया घटनाक्रम यह है कि ऐडीआर ने हाल ही में चुनावी चंदों के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट जारी की जिसमें कई चौंका देने ववाले तथ्य इंगित किये गए हैं। एडीआर की 7 अगस्त को जारी नवीनतम रिपोर्ट में विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिये गये वित्तीय वर्ष 2016 – 17 में प्राप्त चंदे के विवरण का खुलासा है। कुल 48 क्षेत्रीय पार्टियों में से पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी एवं आल इंडिया मजलिस– ए– इत्तेहाद– उल– मुस्लिमीन समेत 16 दलों को चुनाव आयोग को चंदे से संबंधित अपना ब्यौरा देना अभी बाकी है। इनमें से छह पार्टियों ने तो यह दावा किया है कि पिछले वित्तीय वर्ष में उन्हें कोई चंदा प्राप्त नहीं हुआ है। चंदा नहीं प्राप्त करने वाले दलों में नेशनल कांफ्रेंस और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) शामिल हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तहत आयकर से पूरी छूट पाने के लिए राजनीतिक दलों को 20 हजार रूपए से ऊपर के सभी चंदे को सार्वजानिक करना जरुरी होता है। चंदे का ब्योरा घोषित करने वाले दलों की आमदनी में इससे पहले के वित्तीय वर्ष के मुकाबले गिरावट दर्ज की गयी। शिवसेना के चंदे में 70% गिरावट है। द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के चंदे में 99% की कमी है।  लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल को 88% कम चंदा मिला। नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाईटेड) के चंदे में 28% की कमी आयी। एडीआर से जुड़े वेबसाइट माई नेता डॉट इन्फो के अनुसार,  सत्या एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने अन्य राजनीतिक दलों को भी उदारतापूर्वक चंदा दिया। भारतीय जनता पार्टी को तो सत्या एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने दिल खोलकर चंदा दिया। ट्रस्ट ने भाजपा को चंदे में 241.20 करोड़ रूपए दिये।

निजी कंपनियों द्वारा वित्त पोषित इस किस्म के एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट (चुनावी ट्रस्ट) दरअसल निजी कंपनियों को अर्ध– गुमनामी में रहते हुए राजनीतिक दलों को चंदा देने में सहूलियत प्रदान करते हैं। ऐसे उपायों की वजह से, पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष किए गए खुलासे के बावजूद यह निर्धारित करना मुश्किल होता है कि किसने किसको कितना चंदा दिया। और इस साल की शुरुआत में लोकसभा द्वारा बिना चर्चा के पारित वित्त विधेयक से इस किस्म का स्वतंत्र आकलन और भी कठिन हो जायेगा.

किसी भी एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी  कम्युनिस्ट पार्टी  के प्रति उदारता नहीं दिखाई. माईनेता डॉट इन्फो के अनुसार, सीपीआई को सबसे अधिक चंदा अपनी राज्य समितियों और अपने सदस्यों से मिला। पार्टी की तमिलनाडु राज्य समिति ने 12.70 लाख रूपए का चंदा दिया. उसके सदस्यों में डी. राजा ने 16 लाख और सी. जयदेवन ने 12 लाख रूपए दिये। सीपीएम को तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज के केंद्रीय संगठन की ओर से 2.5 करोड़ रूपए मिले। सीताराम येचुरी एवं मोहम्मद सलीम ने क्रमशः 4.8 लाख और 4.5 लाख रूपए का योगदान दिया। एडीआर की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि भारत की राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा घोषित कुल आय का केवल 9% जनता को ज्ञात स्रोतों से आता है.

एडीआर की  रिपोर्ट की चर्चा के बाद हम राजनीतिक चंदों के अधिनियम में मोदी सरकार द्वारा किये गए संशोधन का जायजा ले लें तो बेहतर होगा। पार्टी सदस्यों से वार्षिक  सदस्यता शुल्क सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है। राजनीतिक दलों को अपना खर्च पार्टी के बाहर से ही जुटाना पड़ता है। यह खर्च , चुनावों में बेतहाशा बढ़ जाता है। अगला आम चुनाव मई 2019 के पहले निर्धारित है। जाहिर है सभी पार्टियां अपने चुनावी खर्च जुटाने में लग गईं हैं. पार्टियों को चुनावी खर्च के लिए धन उपलब्ध कराने की राष्ट्र -राज्य से सांविधिक व्यवस्था करने की  अर्से से की जा रही मांग पर  ठोस उपाय नहीं किये गए हैं। ऐसे में , पार्टियां पूंजीपति वर्ग से घोषित -अघोषित चन्दा लेती हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने हाल में पटना में  कहा कि  वह  11 करोड़ सदस्यों के साथ भारत ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी  है। पर उन्होंने यह सत्य नहीं बताया कि बीजेपी भारत की सबसे अमीर पार्टी भी है और उसे यह अमीरी राजसत्ता में रहने से मिली है। पिछले आम चुनाव के बाद केंद्रीय सत्ता में आने पर नई दिल्ली में पार्टी का भव्य मुख्यालय तैयार हो चुका है। दिल्ली के बाहर  कुछ अन्य जगहों पर  पार्टी के या तो नए कार्यालय बने है या फिर उनके लिए भूमि खरीदी जा चुकी है। आरोप है कि नोटबंदी से पहले उसकी भनक पाकर बीजेपी के पास जमा नगदी का इस्तेमाल भूखंड आदि खरीदने में कर लिया गया था। बताया जाता है कि कुछ गुजराती अखबारों में नोटबंदी लागू होने के संकेत की खबरें छपी थीं।

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त एवं रेल मंत्री पीयूष गोयल ने 30 बड़े पूँजीपतियों के साथ कुछेक घंटे बैठक की। श्री गोयल , भाजपा कोषाध्यक्ष पद भी संभाल रहे हैं। माना जाता है कि भारत के पूंजीपति वर्ग ने  2014 में मोदी जी को सत्ता में लाने में मदद की थी। भाजपा द्वारा किये चुनावी वादों के अनुरूप मोदी सरकार द्वारा जीएसटी , दिवालिया कानून जैसे किये गए आर्थिक उपायों से पूंजीपति वर्ग प्रसन्न तो है, लेकिन वह वैश्विक आर्थिक संकट के चलते सशंकित भी है। ऐसे संकेत भी हैं सभी पूंजीपति सिर्फ बीजेपी पर दांव नहीं लगाना चाहते हैं।  कुछ पूंजीपति कांग्रेस की भी मदद करने के हिमायती है क्योंकि उन्हें लगता है कि कांग्रेस के महागठबंधन के सत्ता में आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

एडीआर ने 7 अगस्त 2018 को जारी अपनी रिपोर्ट में पार्टियों को मिले चंदे का संक्षिप्त ब्योरा दे कहा था कि वह जल्द ही विस्तृत ब्योरा भी सार्वजानिक करेगा। ताजा ब्योरा से पता चलता है कि चंदों के मामले में दिल्ली के मुख़्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का हिसाब -किताब बाकियों से बेहतर है। आप के नवीनतम हिसाब -किताब के अनुसार उसे कुल 3865 चन्दा दाताओं से 24.73 करोड़ रूपये मिले। सिर्फ आप ने स्वीकार किया है कि उसे विदेशों से भी करीब नौ करोड़ रूपये चंदे मिले। क्षेत्रीय दलों को कुल 91.37 करोड़ रूपये के चंदे मिले। इनमें से शिवसेना को करीब 25 करोड़ रूपये और शिरोमणि अकाली दल को 15 करोड़ रूपये मिले। चौंकाने वाली बात यह है कि नगद चन्दा देने में असम, किसी भी राज्य से आगे रहा जिसने 72 लाख रूपये चंदे दिए।

यह बात जगजाहिर है कि हाल में तमिलनाडु के तूतीकोरन में भारतीय मूल के अनिल अग्रवाल की जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी, वेदांता के ताम्बा गलाने के संयंत्र से प्रदूषण के विरोध में प्रदर्शन में शामिल लोगों पर पुलिस फायरिंग में 13 लोगों को भून दिया गया वह मोदी जी के बड़े समर्थक हैं। वेदांता ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों को चंदे दिए हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल अदालती दस्तावेजों के मुताबिक़ उसने 2004 से 2015 के बीच भाजपा को 17 . 65 करोड़ रूपये और कांग्रेस को 8 .75 करोड़ रूपये चंदे दिए।

एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट के 13 सितम्बर 2013 के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा है निर्वाचन आयोग प्रभावी नियम लागू करे कि कोई भी राजनीतिक दल फॉर्म 24 बी में 20 हज़ार रूपये से अधिक के मिले चंदे का ब्योरा देने का कॉलम का कोई भी भाग खाली नहीं छोड़े।  साथ ही , अमरीका , जापान , जर्मनी , फ़्रांस , ब्राजील , इटली , बुल्गारिया , नेपाल और भूटान की तरह ही भारत में भी  राजनीतिक पार्टियों को प्राप्त चंदा का पूर्ण विवरण सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक समीक्षा के लिए उपलब्ध कराना अनिवार्य हो। उपरोक्त देशों में से किसी में राजनीतिक दलों को प्राप्त धन का 75 प्रतिशत हिस्सा छुपाया नहीं रखा जा सकता है। वर्ष 2017 के वित्त विधेयक में आयकर अधिनियम  के सेक्शन 13 ऐ में संशोधन कर कहा गया है कि पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों को आय कर से माफी दी जाएगी। बशर्ते कि वे सेक्शन 139 के सब सेक्शन 4 बी के तहत पूर्व वित्त वर्ष की अपनी आय का पूरा ब्योरा निर्धारित तिथि या उसके पहले दाखिल करें।अगर कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसा नहीं करती है तो निर्वाचन आयोग उसकी मान्यता रद्द कर सकती है।

 



( मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)



 

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