Home काॅलम मंदी है मगर दिख नहीं रही… मोदी है तो मुमकिन है!

मंदी है मगर दिख नहीं रही… मोदी है तो मुमकिन है!

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“यार समाजवादी… एक बात बताओ…”

बंगाली बाबू ने अगरबत्ती की बची खुची तीली से दांत खोदते खोदते पूछा…

“…ई मंदी वाला मामला है का… बड़ा हल्ला मचा है ससुर?”

“इसका 370 से कोई लेना देना नहीं… छोड़ो जाने दो… निशाखातिर रहो!”

“अरे नहीं यार… एतना हमको भी पता है! चार दिन से कश्मीर पर ज्ञान पेल रहे हो तो चारों ओर कश्मीरै कश्मीर दिखने लगा है!”

बंगाली बाबू खिसिया गये

बगल में बैठे दूसरे लुहेड़े के हाथ मौका लगा तो भला कहां चूकता

“इनका तो केस ही धारा 370 में दर्ज हो गया है, जब देखो कश्मीर-कश्मीर… अब्दुल्ला-अब्दुल्ला…”

समाजवादी जी की सुलग उठी, लेकिन चाय की दुकान पर जमने वाली चौपाल ने संकेत दे दिया, कि बहुत हुआ कश्मीर, अब ट्रैक बदलो…

ट्रैक से समाजवादी जी को फिर कुछ याद आने लगा, लेकिन कश्मीर एतना जल्दी फेंटा जाएगा उन्होंने सोचा नहीं था… रहा मंदी का मामला तो ये उनके लिए जरा पेचदार ठहरा। मगर समाजवादी ही क्या जो हार मान ले, ज्ञान तो इस पर भी देना ही पड़ेगा…

अ…अ…ब…ब… करते समाजवादी जी शुरू हुए।

“दरअसल मामला सीरियस तो है मगर अभी एतना सीरियस भी नहीं है। मंदी आ रही है लेकिन आयी नहीं है… मतलब ये कि…”

समाजवादी जी फंस रहे हैं ये लुहेड़ों की समझ में आ गया। उनको फंसाने का आनंद भी अलग है, लिहाज़ा एक ने चुटकी ली-

“नहीं वो सब तो ठीक है, लेकिन अगर आ रही है तो कहां तक आयी है। आउटर पर खड़ी है कि स्टेशन पर लगने वाली है। मतलब स्टेटस क्या है।”

एक लुहेड़े ने आनंद ले लिया। उसके घर में तीन-चार जने रेलवे में गार्ड और टीटी हैं, लिहाजा लबरे की पूरी शब्दावली ही रेलवे के लबो-लहजे से कूट-कूट कर लबरेज है।

इससे पहले कि समाजवादी जी झल्ला कर कहते कि मंदी कोई 5:40 की बाबू गाड़ी नहीं है, बंगाली बाबू पहले ही कूद पड़े।

“हम कह रहे हैं कि मान लो मंदी आ रही है या आ ही गयी है तो इससे होगा का? कौन सा आसमान फाट पड़ेगा… अकाल पड़ जाएगा, बाढ़ आ जाएगी… मल्लब होगा का ये तो बताओ?”

“नहीं महाराज… बाढ़ और सुखाड़ का इससे कोई लेना देना नहीं!”

“तो फिर! ई सब विरोधी पाल्टी वाले कउन बात की कलह काटे पड़े हैं। मार मोदिया के पीछे पड़े हैं कि मंदी आ गयी, मंदी आ गयी सरकार से कुछ हो ही नहीं रहा!”

देर से चुप्पी साधे एक श्रोता ने मोदी का नाम आते ही आसन बदला।

“अरे ई ससुरों को कोई काम तो है नहीं, खाली मोदिया के काम में मीन मेख निकालना है। यहां पाकिस्तान की दगी पड़ी है, मार मिसाइल पे मिसाइल दाग रहा है। तोप नहीं चल रही तो मुंह से ही बमा बम किये पड़े हैं बेट्टा। यहां कुछ नहीं मिल रहा तो मंदी-मंदी का हल्ला मचा है।”

इस बीच महल्ले का एक मेधावी इमरती लेने आ गया। घर पे मेहमान गिरे पड़े थे और वापस लौटने की जल्दी थी। जल्दबाज़ी में ठोंगा सम्हालता बोला-

“चाचा मंदी का मतलब है, आदमी की क्रय शक्ति का घट जाना। यानी जनता की खरीदारी की ताक़त का घट जाना। मतलब लोग सामान खरीदेंगे नहीं तो बिकेगा नहीं, बिकेगा नहीं तो कारोबार पर असर पड़ेगा, कारोबार घटेगा तो काम घटेगा। काम घटेगा तो रोज़गार घटेगा। मतलब बाजार का मामला है ये सब!”

मेधावी तो मेधा की चमकार दिखा कर चलता बना, मगर बंगाली बाबू समेत दुकान पर चौड़ी हो रही तमाम चौपाल दूसरे ही चक्रव्यूह में फंस गयी। समाजवादी जी को भी एक लिमिट के बाद कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन उन्होने मुंडी कुछ इस अंदाज़ में हिलायी, मानो कह रहे हों… हां, हां… मामला यही है।

थोड़ी देर सन्नाटा रहा, फिर बंगाली बाबू ने हलवाई से बडे सधे अंदाज में एक गहरा सवाल किया

– ये बताओ… तुमने कल केतनी जलेबी बनायी?

– जेतनी रोज़ बनाते हैं!

– अच्छा समोसा केतना बनाया?

– जेतना रोज़ बनाते हैं!

– परसों केतना बनाया था?

– जेतना रोज़ बनाते हैं!

– आज केतना बनाया?

– जेतना रोज़ बनाते हैं!

“जब कल भी एतना ही बनाया, परसों भी एतना ही बनाया, आज भी बनाया ही… तो मतलब बिक रहा है तब्बे तो बनाया।”

लुहेड़े ने बंगाली बाबू की बात को तस्दीक करते हुए कहा… “बिलकुल!”

“अब बताओ… समोसा बिक रहा, जलेबी बिक रही, चावल बिक रहा, दाल बिक रही, नमक बिक रहा, तेल बिक ही रहा है… बताओ बताओ!!”

इस बार दूसरी ओर से आवाज़ आयी… “अरे बिक नहीं रहा है तो खा कैसे रहे हैं! पियाज़ थोड़ी महंगी जरूर हो रही है… लेकिन ऊ बाढ़ की वजह से बाजार में नहीं आ रही।”

तब तक दुकानदार ने जोड़ा

“…अरे गनीमत है महराज, अभी कंट्रोल में है। टिबिया वाले पाकिस्तान-पाकिस्तान किये पड़े हैं वर्ना टीबी में समाचार छपा नहीं कि आग लगी नहीं… फिर खा लेना पकौड़ी।”

समाजवादी जी को चुप साधे देख बंगाली बाबू ने टहोका लगाया…

“बताओ भाई कहां है मंदी? सब तो बिक रहा है, सब खरीद भी रहे हैं!”

समझ तो समाजवादी जी भी नहीं रहे थे कि समझाएं क्या? लेकिन बड़े बड़े लोग मंदी मंदी कह रहे हैं तो उन्हें भी मंदी में ही तेजी दिख रही थी। अपनी ओर से फिर गाड़ी पटरी पर लाने की कोशिश करने लगे। दरअसल वो अपनी धाक बचाने की कोशिश में जुटे थे, जिसे मौका देखते ही मुहल्ले के लुहेड़े मिटाने पर आमादा हो जाते हैं।

“अरे भाई मंदी का मतलब नून, तेल, लकड़ी नहीं होता… ये बाजार का मामला है।”

“अब ल्यो!” कम बोलने और मौके पर चौका जड़ने के माहिर श्रोता ने चौंक कर पूछा। “अरे बाजार में अउर बिकता का है भाई। नून तेल नहीं तो अउर का… मतलब काsss?”

समाजवादी जी को साफ समझ आ रहा था, कि यहां मंदी को समझाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

बात मंदी से चली थी और महंगाई की ओर मुड़ गयी।

“भाई अगर महंगाई बढ़े तो कोई बात है… तो महंगाई तो… मतलब है, लेकिन एतनी तो रहती ही है। है कि नहीं…”

समाजवादी जी ने आखिरी कोशिश की, “अखबार देखे… जीडीपी घट के पांच परसेंट रह गयी है।”

बात अखबार की थी सो सब सतर्क हो गए। एक दूसरे का मुंह देखने लगे, मानो कह रहे हों… अब दो जवाब!

मगर बंगाली बाबू आमादा थे… आराम से खैनी दबाते पूछा, “पहले केतनी थी?”

समाजवादी जी ने चाय से भीग चुका अखबार टटोल कर कहा…”पांच दशमलव आठ!”

“तो जब पांच दशमलव आठ थी तो कौन सा देसी घी का कटोरा पी रहे थे, कि जब पांच रह गयी तो नहीं मिल रहा?”

समाजवादी जी झुंझला कर उठने लगे। बंगाली बाबू उनका मूड ऑफ देख कर मुलायम हुए।

“अरे बइठो… बइठो, नाराज़ काहे होते हो यार। अच्छा मान लिया मंदी है, आ गयी है… मगर हमको तो कोई फरक पड़ा नहीं, इनको कोई फरक पड़ा नहीं। समोसा बिक रहा है, जलेबी बिक रही है, तरकारी बिक रही है, दाल बन रही है… तो फर्जी हल्ला किस बात का।”

सुधी श्रोता ने सतसंग का समापन करने के अंदाज में सवाल उछाला, “यानि मंदी है, मगर दिख नहीं रही… मतलब!!!!”

दूसरे ने खिलखिलाते हुए संपुट पूरा किया, “मतलब, मोदी हैsss… तो मुमकिन है!”

इस ठहाके के पीछे अखबार के गीले पन्ने पर गर्त में जाती जीडीपी की खबर, खुद को गला डालने पर आमादा थी।

 

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