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संविधान का पालन न करने पर ही गवर्नर दोषी- डॉ.आंबेडकर

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 25

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और  समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की  पचीसवीं कड़ी – सम्पादक

 

 

 

175.

साम्प्रदायिक गतिरोध पर डा. आंबेडकर

गवर्नर को नुकसान नहीं; न काॅंग्रेस को मिलेगा

(दि बाम्बे क्रानिकल, 9 अप्रैल 1937)

बम्बई, 8 अप्रैल।

 

डा. बी. आर. आंबेडकर, बैरिस्टर-एट-लाॅ ने भारत में संवैधानिक गतिरोध पर निम्नलिखित वक्तव्य जारी किया है-

‘काॅंग्रेस के मैदान खोने के बाद, अखिल भारतीय काॅंग्रेस कमेटी के प्रस्ताव के सन्दर्भ में काॅंग्रेस के नेताओं को दायित्व देने के लिए गवर्नरों के इन्कार से उत्पन्न होने वाले हालात पर मुझे नहीं लगता कि मेरे लिए बोलना जरूरी है। लेकिन कुछ मित्रों का दबाव है कि मैं इस हालात पर जो सोचता हूॅं, उसे व्यक्त करुॅं, इसलिए मैंने स्वयं को इस विवाद में प्रवेश करने के लिए तैयार कर लिया है।

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों काॅंग्रेस के लोग अन्तरिम मन्त्रियों को न बुलाए जाने के लिए गवर्नर को दोषी ठहराते हैं, और कुछ हद तक मैं उन काॅंग्रेसियों को देखकर आश्चर्यचकित हूॅं, जो मन्त्रिपद स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, और जिनका कार्यक्रम संविधान को तोड़ने के लिए है, और जिस तरह अन्तरिम मन्त्रिमण्डल की स्थापना पर राहत की साॅंस लेने के बजाय, वे अवसर की क्षति पर इतने भड़क और क्रोधित हो रहे हैं कि कोई भी यह सन्देह करने लगेगा कि उनका संविधान की बरबादी के लिए रोना सिर्फ एक ढोंग था।

 

गवर्नर दोषी नहीं

 

जब कोई पार्टी, जिसके पास बहुमत है, और मन्त्रि पद स्वीकार करने से मना कर देती है, तो गवर्नर का कर्तव्य है कि वह उन लोगों को मन्त्रिपद पेश करें, जो उन्हें आश्वासन दे सके कि वे विधायिका में बहुमत को अपनी नीति का समर्थन करने के लिए सुनिश्चित कर सकते हैं। दोषी गवर्नर नहीं हैं, बल्कि वे लोग हैं, जिन्होंने पद स्वीकार कर लिया है। किन्तु जिन लोगों ने विचार के लिए पद स्वीकार किया, उन्हें भले ही गवर्नर को धोखा देने का दोषी न ठहराया जायेगा, पर उन्हें सदन के पटल पर आवश्यक बहुमत पैदा करना होगा। गवर्नरों पर केवल तभी दोष आयेगा,, जब वे संविधान के अन्तर्गत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग उन मन्त्रियों को रखने के लिए करते, जो विधायिका के बहुमत का विश्वास खो चुके हैं, क्योंकि गवर्नरों को जारी निर्देश-पत्र के अन्तर्गत उन्हें अपनी शक्तियों का उपयोग करने के लिए कहा गया है, और तदनुसार अपने मन्त्रियों से सम्बन्धित अपनी जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त करने के लिए अपनी विशेष शक्तियों पर भरोसा नहीं करते।

 

स्थिति पैदा नहीं हुई

 

अभी वह स्थिति पैदा नहीं हुई है, जब पदासीन मन्त्री विधायिका के प्रतिकूल वोट से पराजित हो जाते हैं, इसलिए गवर्नर की कार्यवाही की आलोचना करने से पूर्व, हमें इन्तजार करना है और देखना है कि वे क्या कदम उठाते हैं?

 

आश्वासन की माॅंग

 

हालाॅंकि, मुख्य प्रश्न यह है कि क्या काॅंग्रेस का पद स्वीकार करने से पहले गवर्नर से आश्वासन माॅंगना उचित था, जिसके हकदार वे अपने बहुमत के कारण थे? काॅंग्रेसियों ने यह स्वीकार किया है कि वे कानून में संशोधन नहीं चाहते हैं। उनका विवाद इस बात पर है कि गवर्नर भारत सरकार के अधिनियम के प्राविधानों को रद्द किए बिना ही उन्हें वह अनुशासन दे सकते थे, जो वे चाहते हैं। पर, प्रश्न यह है कि क्या कानून को रद्द किए बिना इस तरह का आश्वासन दिया जा सकता है?

 

राजा और गवर्नर

 

काॅंग्रेस द्वारा उठाई गई स्थिति के समर्थन में मि. भूलाभाई देसाई और मि. सी. राजगोपालाचारी़ दोनों ने इतनी अधिक बार कहा है कि गवर्नर को आश्वासन देने से रोकने के लिए इस अधिनियम में कुछ भी नहीं है, और यदि गवर्नर ने आश्वासन नहीं दिया, तो इसका यही कारण है कि वे इसे देना नहीं चाहते।

हम जिस प्रश्न से चिन्तित हैं, वह यह है कि भारत सरकार के अधिनियम को प्रभावित किए बिना क्या गवनर्रों के लिए अपनी विशेष शक्तियों को निलम्बित करने के लिए सहमत होना सम्भव होगा? मि. भूलाभाई देसाई का विचार है कि भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत गवर्नर को दी गई विशेष शक्ति और राजा की वीटो शक्तियों के बीच कोई अन्तर नहीं है। किन्तु मेरा विरोध यह है कि गवर्नर में निहित व्यक्तिगत विवेक से लिए गए व्यक्तिगत निर्णय की शक्ति अंग्रेजी संविधान में राजा को प्राप्त वीटो की शक्ति से पूरी तरह भिन्न है।

वीटो की शक्ति राजा को अपने मन्त्री अथवा मन्त्रिमण्डल की सलाह को निरस्त करने का अधिकार देती है, जो एक निश्चित कार्यप्रणाली को आगे बढ़ा सकती है। किन्तु यह मन्त्रिमण्डल की सलाह के बिना किसी विशेष तरीके से राजा को उत्तरदायित्व लेने के लिए कार्य करने का अधिकार नहीं देता है।

व्यक्तिगत निर्णय की शक्ति और व्यक्तिगत विवेक न केवल गवर्नर को मन्त्री की सलाह को निरस्त करने का अधिकार देता है, बल्कि उसके समर्थन में उसे मन्त्री की सलाह के बिना भी कार्यवाही करने का अधिकार देता है। वास्तव में, मन्त्री की सलाह के विपरीत, राजा के पास अपनी कार्यवाही का समर्थन करने के लिए कुछ मन्त्री होने चाहिए। किन्तु गवर्नर को अपनी कार्यवाही के समर्थन के लिए किसी मन्त्री की जरूरत नहीं है। यही एक अन्तर वीटो की शक्ति और व्यक्तिगत निर्णय की शक्ति में है।

 

सीमित मन्त्रिमण्डल

 

मि. राजगोपालाचारी का यह दावा कि जो व्यवहार लोकप्रिय सरकार की संसदीय प्रणाली में मन्त्रियों के साथ होता है, वही व्यवहार भारत के मन्त्रियों को भी मिलना चाहिए, पूरी तरह भारत सरकार के अधिनियम में सन्निहित शासन प्रणाली की गलतफहमी को दर्शाता है। भारत सरकार के अधिनियम में सन्निहित शासन प्रणाली एक सीमित मन्त्रिमण्डलीय प्रणाली है। यह एक सीमित राजशाही प्रणाली नहीं है। एक सीमित राजशाही में राजशाही का अधिकार मन्त्रिमण्डल की शक्ति से सीमित होता है। एक सीमित मन्त्रिमण्डलीय प्रणाली में, मन्त्रियों की शक्ति गवर्नगर के अधिकार से सीमित होती है। यदि ये भेद, जिनका मैंने उल्लेख किया है-वीटो के अधिकार और व्यक्तिगत निर्णय के बीच भेद एवं सीमित मन्त्रिमण्डल और सीमित राजशाही के बीच भेद, दिमागी फितूर हैं, तो यह समझना आसान होगा कि क्यों राजा अपनी वीटो शक्ति को निलम्बित कर सकता है और गवर्नर नहीं कर सकता है? गवर्नर अपनी विशेष शक्तियों को नहीं छोड़ सकता है। कानून के अन्तर्गत, वह मन्त्रिमण्डल के कार्यों के लिए उत्तरदायी है। क्या मन्त्रालय की कार्यवाही के बुरे परिणाम हो सकते हैं? कोई संविधान पर बहस करते हुए इस बात पर जोर दे सकता है कि उत्तरदायित्व मन्त्रिमण्डल पर होना चाहिए, न कि गवर्नर पर, पर कोई इसे नजरअन्दाज नहीं कर सकता। हम संविधान को लेते हैं और उसमें तथा अंग्रेजी संविधान में मौजूद अन्तर को देखते है, तो इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है कि गवर्नरों की अपनी विशेष शक्तियों का त्याग करने की कानूनी अक्षमता असली है, और वे संविधान का उल्लंघन किए बिना अपने कार्यों का परित्याग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे निर्देशों की नियमावली से बॅंधे हुए हैं। अगर कोई उत्तरदायित्व नहीं है, तो कोई भी आसानी से अपनी शक्ति छोड़ सकता है, किन्तु, यदि उत्तरदायित्व है, तो कोई भी अपनी शक्ति नहीं छोड़ सकता है।

मेरे विचार में संविधान के कामकाज के लिए विशेष शक्तियों के अस्तित्व का समर्थन विरोध के विशेष आधार के रूप में कभी भी नहीं किया जा सकता।

 

महात्मा का तर्क

 

महात्मा गाॅंधी ने आश्वासन की माॅंग के लिए सबसे अलग ही तर्क दिया है। वह इतना आधारहीन है कि आश्चर्य होता है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति से इसकी माॅंग कैसे की जा सकती है, जो संविधान की कार्य प्रणाली को जानता है? वह कहते हैं, ‘मतदाताओं के निणार्यक समर्थन के साथ एक मजबूत पार्टी गवर्नर की इच्छा पर हस्तक्षेप के भय से हर समय स्वयं को अनिश्चित स्थिति में रखने के लिए तैयार नहीं हो सकती; स्वाभिमानी मन्त्री अपने पूर्ण बहुमत के प्रति जागरूक होता है। क्या किसी ने सोचा होगा कि एक मन्त्रिमण्डल आश्वासन के लिए निहोरे करने के बजाय अपनी चुनावी ताकत के लिए मैदान में उतरेगा और गवर्नर को चुनौती देगा तथा उसके खिलाफ अपनी शक्तियों का उपयोग करेगा?’ निश्चित रूप से यदि कोई आश्वासन आवश्यक है, तो यह कमजोर मन्त्रिमण्डल के लिए है, जिसके पास इस आश्वासन के लिए कोई जनाधार या मतदाता-शक्ति नहीं है। काॅंग्रेस जैसी मजबूत पार्टी के लिए आश्वासन पाना आवश्यक नहीं है। एक अच्छे व्यवहार के गवर्नर से काॅंग्रेस के लोग आश्वासन क्यों माॅंग रहे हैं? क्या वे उन्हें इसके लिए मजबूर का सकते हैं?

 

गवर्नर आश्वासन दे सकते हैं

 

क्या गवर्नर काॅंग्रेसियों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकते, जैसा व्यवहार हम शैतान बच्चों के साथ करते हैं-उनकी माॅंग के लिए आश्वासन देकर उन्हें परेशान करने से रोकते हैं? काॅंग्रेस कमेटी के प्रस्ताव को पढिए और उसमें इस तथ्य पर ध्यान दीजिए, क्योंकि उनकी आश्वासन की माॅंग उसी के अन्तर्गत है। मेरा मानना है कि यदि ऐसा आश्वासन दे दिया गया होता, तो कुछ भी नहीं खोया होता। मुझे लगता है कि जब काॅंग्रेस के मन्त्री संविधान के अन्तर्गत काम करने का आश्वासन दे रहे थे, और यह आश्वासन उनके फार्मूले में ही था,तो ऐसा कोई स्पष्ट कारण नहीं था कि गवर्नरों ने पारस्परिक आश्वासन देने से इन्कार कर दिया और कहा कि वे अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे।

 

कोई लाभ या हानि नहीं

किन्तु जो सवाल मैं सभी काॅंग्रेसियों से पूछना चाहता हूॅं, वह यह है कि यदि गवर्नर काॅंग्रेस कमेटी के प्रस्ताव के अनुसार आश्वासन दे देते, तो उन्हें क्या हासिल हो जाता? मेरे विचार में अहम सवाल यह है कि यह कौन तय करेगा कि गवर्नर के द्वारा विशेष शक्तियों के प्रयोग के लिए अवसर उत्पन्न हुआ है या नहीं? उन्हें कुछ हासिल हो भी जाता, यदि काॅंग्रेसियों से आश्वासन के लिए यह पूछा जाता कि क्या विशेष शक्तियों के प्रयोग का अवसर मन्त्रिमण्डल के द्वारा तय किया गया था या नहीं? तब उस आश्वासन का ज्यादा महत्व होता। लेकिन इस तरह के आश्वासन की माॅंग ही नहीं की गई थी। काॅंग्रेसियों द्वारा माॅंगा गया आश्वासन असंगत था, जो इसके बावजूद और इसका उल्लंघन किए बिना, गवर्नर इस आधार पर हस्तक्षेप करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया गया था कि विशेष बात करने में मन्त्रिमण्डल इस तरह से काम कर रहा था कि उनके निर्णय में विशेष शक्तियों के उपयोग का अवसर उत्पन्न हो गया था। इसलिए मैं यह पता लगाने की कोशिश कर रहा हूॅं कि यदि गवर्नर ने आश्वासन दिया होता, तो उन्हें क्या खोना पड़ता, और काॅंग्रेसियों को आश्वासन मिलने से क्या लाभ होता।

 

176

 

काॅंग्रेस को समर्थन नहीं

डा. आंबेडकर का जवाब

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 17 मई  1937)

बम्बई प्रान्तीय विधान मण्डल में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के नेता डा. बी. आर. आंबेडकर ने स्वयं अपनी और पार्टी की ओर से काॅंग्रेस पार्टी के नेता बी. जी. खेर को पत्र लिखकर, बम्बई के गवर्नर द्वारा मन्त्रिपरिषद की नियुक्ति की अस्वीकृति व्यक्त करने में काॅंग्रेस पार्टी का समर्थन करने से इन्कार कर दिया है।

डा. आंबेडकर अपने उत्तर में वर्तमान स्थिति के लिए काॅंग्रेस पार्टी पर दोष लगाते हैं, क्योंकि, उनकी पार्टी के विचार में काॅंग्रेस की गवर्नर से आश्वासन की माॅंग अनावश्यक और असम्भव है।

विधानमण्डल का सत्र न बुलाने में गवर्नर के निर्णय पर, डा. आंबेडकर मानते हैं कि उस पर इस वक्त विचार नहीं किया जा सकता। इस तरह की कार्यवाही केवल तभी असंवैधानिक होगी, जब बिना सत्र के छह माह बीत जायें।

संविधान अब व्यवहार में आ गया है, इसलिए इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी सोचती है कि विधान मण्डल के सदस्यों के द्वारा कोई अतिरिक्त संवैधानिक आन्दोलन तब तक शुरु नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि संवैधानिक साधनों का प्रयास न किया गया हो और वह विफल न हो गया हो।

डा. आंबेडकर ने आगे कहा, काॅंग्रेस पार्टी का यह प्रस्ताव काॅंग्रेस की स्थिति को न्यायोचित ठहराने और उसकी शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए है। इसका कोई राष्ट्रीय उद्देश्य नहीं है।

 

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कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत। दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए विख्‍यात। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।



 

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