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चुनाव चर्चा: कम्युनिस्टों की छोटी-बड़ी ‘चुनावी लाइन’ और 2019 की चुनौतियाँ

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चंद्र प्रकाश झा 

 

भारत की तीनों बड़ी संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने इसी बरस अपनी  पार्टी -कांग्रेस में अगले आम चुनाव के लिए कुछ नई कार्यनीतियाँ तैयार की हैं। तीनों ने अपने पार्टी ‘कार्यक्रम’ लगभग यथावत रखा है। ये कार्यनीतियां भारतीय जनता पार्टी की ‘फासीवादी’ प्रवृतियों के खिलाफ सीमित चुनावी परिप्रेक्ष्य के लिए बनाई है। उन्होंने अपने मौजूदा महासचिव को ही इस पद पर अगले कार्यकाल के लिए चुनाव किया है । दीपांकर भट्टाचार्य, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी लेनिनवादी -लिबरेशन ) यानि भाकपा -माले के 1998 से ही लगातार पार्टी महासचिव बने हुए हैं। असम के गुवाहाटी में दिसंबर 1960 में पैदा हुए दीपांकर भट्टाचार्य 1998 में विनोद मिश्र के निधन के उपरान्त पार्टी महासचिव चुने गए थे। विनोद मिश्र, पार्टी के 1975 से निधन तक महाचिव रहे। भारत की  कम्युनिस्ट पार्टी ( भाकपा ) के फिर निर्वाचित महासचिव  सुरवाराम सुधाकर रेड्डी तेलंगाना के नालगौंडा से 12 वीं और 14 वीं लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं। वह 2012 में पहली बार 21 वीं पार्टी कांग्रेस में महासचिव चुने गए थे।  भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानि माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी को भी इस पद के लिए फिर चुन लिया गया।

माकपा की हैदराबाद में 18 से 22 अप्रैल तक आयोजित 22 वीं पार्टी कांग्रेस में निर्धारित चुनावी व्यूह -रचना में भाजपा की पराजय सुनिश्चित करने की ‘लाइन’ तय की गई।  नई लाइन में कांग्रेस से चुनावी सम्बन्ध नहीं रखने की पहले की सख्त लाइन में संशोधन कर दिए गए हैं। माकपा के हर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग- अलग चुनावी कार्यनीति बनाने की संभावना है। भाकपा नेता डी. राजा साफ कह चुके हैं कि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल, कांग्रेस के साथ आपसी समझ विकसित किये बिना भाजपा –विरोधी मतदाताओं में भरोसा पैदा करना संभव नहीं होगा। उनके अनुसार गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी ताकत है। उनसे वाम दलों और अन्य लोकतांत्रिक ताकतों को भी आपसी समझ कायम करना ही चाहिए।

भाकपा माले -लिबरेशन  , कमोबेश अपनी पुरानी लाइन पर ही चल रही है। इसमें नया यही है कि पार्टी ने बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ( राजद ) और बिहार में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ चुनावी हाथ मिलाने के संकेत दिए हैं। पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के हाल में राजद नेतृत्व और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन से साथ भेंट का चुनावी मतलब भी समझा जा रहा है। खबर है कि बिहार और झारखंड में  भाकपा, माकपा और भाकपा-माले से लेकर मार्क्सिस्ट कोऑर्डिनेशन कमेटी तक की संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने भाजपा की चुनावी हार सुनिश्चित करने का निश्चय किया है। कोई औपचारिक घोषणा तो नहीं की गई है लेकिन संकेत मिले है कि भाजपा -विरोधी प्रस्तावित वृहत्तर महागठबंधन में इन संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बिहार और झारखंड में कुछ सीटें छोड़ी जा सकती हैं।  इनमें से एक, बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट पर भाकपा की ओर से जवाहर लाल नेहरू विश्विविद्यालय ( जेएनयू ) के छात्र नेता कन्हैया कुमार को खड़ा करने की खबर है।

संसदीय चुनावों को लेकर भाकपा माले-लिबरेशन का ‘भटकाव’, अन्य दोनों बड़ी संसदीय पार्टियों से कमतर नहीं रहा है।  भाकपा माले-लिबरेशन ने तत्कालीन महासचिव विनोद मिश्र के नेतृत्व में  नागभूषण पटनायक और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा कायम वृहत्तर मोर्चा, इंडियन पीपुल्स फ्रंट ( आईपीएफ ) से अलग रूप से चुनाव में भाग लेना शुरू किया था। दीपांकर भट्टाचार्य, आईपीएफ महासचिव रह चुके हैं। भाकपा माले को शुरुआती कुछेक चुनावी सफलता मिली थी। उसने 1990 के दशक के आखिर में  जनता दल से लालू प्रसाद यादव के विरोध में मौजूदा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस आदि के अलग होकर बनाई गई समता पार्टी  के साथ चुनावी गठबंधन भी किया था। जब समता पार्टी का जनता दलयूनाइटेड के रूप में प्रादुर्भाव हुआ और वह भाजपा के दक्षिणपंथी गठबंधन, नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) के संग हो गई तो उससे भाकपा माले ने चुनावी किनारा कर लिया। भाकपा माले का बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और उसकी सरकारों के प्रति विरोध बना रहा।

संसदीय चुनावों को लेकर कम्युनिस्टों के बीच एक ख़ास तरह का द्वंद्व हमेशा से रहा है। दरअसल, 1920 -1925 में बनी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा ) में और उसके 1964 में हुए विभाजन से बनी माकपा में  शुरू से कांग्रेस को लेकर पारस्परिक विरोधी रूख रहा है। माकपा ने 1960 के दशक के उत्तरार्ध में बिहार , उत्तर प्रदेश जैसे कुछेक राज्यों में गैर- कांग्रेस दलों की मिली-जुली संयुक्त विधायक दल ( संविद ) सरकारों से बाहर रहने का निर्णय किया था। कहा जाता है कि माकपा का एक हिस्सा ऐसी सरकार में शामिल होने की पेशकश पर विचार करने के पक्ष में था लेकिन पार्टी नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं था। भाकपा ऐसी सरकार में, भाजपा के पूर्ववर्ती संस्करण, जनसंघ के भी साथ शामिल हो गई थी। भाकपा से माकपा का विभाजन मूलतः इसी मुद्दे पर हुआ कि अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व कांग्रेस या अन्य का हाथ थाम राजसत्ता में दाखिल होने के पक्ष में था। जिस दूसरे हिस्से ने अलग होकर माकपा बनाई उसका मत था जबतक किसी सरकार को चलाने में मुख्य भूमिका नहीं मिले उसमें शामिल नहीं होना चाहिए। कम्युनिस्टों के राजनीतिक  द्वंद्व की दूसरी बड़ी झलक इंदिरा गांधी सरकार के दौरान दिखी। तब भाकपा ने इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन किया। माकपा ने उस सरकार के अधिनायकवादी राजकाज का विरोध किया। पर माकपा उस सरकार के खिलाफ जयप्रकाश नारायण (जेपी ) के नेतृत्व में चले आंदोलन से अलग रही.  द्वंद्व की अगली साफ झलक 1996 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व में बनी पहली सरकार के 13 दिन में ही गिर जाने से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों में दिखी. तब पूर्व प्रधानमंत्री ( अब दिवंगत ) विश्वनाथ प्रताप सिंह के सुझाव पर गैर -भाजपा और गैर-कांग्रेस दलों के मोर्चा की ओर से, देश में सर्वाधिक काल तक मुख्यमंत्री रहे माकपा नेता ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाए जाने की पेशकश की गई। इसके लिए लगभग सभी ऐसे राजनीतिक दल ही नहीं स्वयं ज्योति बसु और तत्कालीन माकपा महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत तक तैयार थे। पर यह हो नहीं सका। ज्योति बसु ने खुद बाद में इसे ऐतिहासिक भूल करार दिया। ज्योति बसु को प्रधानमन्त्री बनने से रोकने के माकपा केंद्रीय कमेटी के कुछेक वोट के अंतर से लिए निर्णय को ‘ प्रकाश कारात लाइन ‘ कहा जाता है जो चुनावी गठबंधन की राजनीति में माहिर माने जाने वाले हरकिशन सिंह सुरजीत के गुजर जाने के बाद और जोर पकड़ गई।

माकपा , निर्वाचन आयोग से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल है। मौजूदा लोकसभा में इसके 9 और राज्यसभा में पांच सदस्य हैं. माकपा, केरल में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा का नेतृत्व कर रही है। उसकी  पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी अर्से तक सरकार रही है। उसके जम्मू -कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना , ओडिसा आदि में भी कुछेक विधायक हैं। उसने पहली बार1967 के लोकसभा चुनाव में भाग लिया था। तब उसके 19 और भाकपा के 23 सांसद चुने गए। माकपा के सर्वाधिक 43 सांसद 2004 के लोकसभा चुनाव में चुने गए। तब उसने केंद्र में कांग्रेस के मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) की सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। बाद में उसने उस सरकार से अपना समर्थन भारत के अमरीका के साथ किये परमाणु ऊर्जा करार के विरोध में वापस ले लिया था। माकपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल मतदाताओं के 3. 24 प्रतिशत के मत मिले थे।

श्री येचूरी पहली बार 2015 में अपने गृह राज्य, आंध्र प्रदेश के वैजाग और अब  हैदराबाद में आयोजित पार्टी कांग्रेस में महासचिव निर्वाचित तो हो गए पर उनका संगठन में वर्चस्व नहीं रहा। माकपा के सांगठनिक ढाँचे पर कारात की ही चलती रही है। कारात 2015 में महासचिव बनने के पात्र नहीं रह गए थे क्योंकि पार्टी संविधान में उनके ही पेश संशोधन के पारित हो जाने के बाद किसी के लगातार तीन बार से अधिक महासचिव बनने पर रोक लग चुकी है। कारात पहली बार 2005 में महासचिव चुने गए थे। वह खुद सांसद नहीं बने लेकिन  उनकी पत्नी, वृन्दा कारात बंगाल से राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं। कारात दम्पत्ति, पार्टी पोलितब्यूरो के सदस्य हैं। श्री कारात और श्री येचूरी, दोनों नई दिल्ली में वामपंथियों का गढ़ माने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। रांची में निवास करने वाले राजनीतिक अध्येता, उपेन्द्र प्रसाद सिंह के अनुसार  माकपा भी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी होने के अपने मूल कार्यक्रम से  भटक गई है। वह संसदीय  भूलभुलैया में फंस गई लगती है जिसके प्रति कम्युनिस्ट इटरनेशनल की तीसरी कांग्रेस ने 1920 में अपनाई ‘लाईन’ के जरिये सबको सचेत कर दिया था।

 




( मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)



 

10 COMMENTS

  1. All 3 have 1 thing in common They don’t believe in making their cadres, members well educated in communist classics. They ignored great opportunity for the discussion on the 100 that anniversary of Oct revolution. Their teachers are Bernstein, kautsky and khrushcev. They hate Marx lenin Stalin and Mao…. Talking about leadership. Cpi man kanhaiyya said Stalin Murdabad. Ford Foundation ( cia ) funded WSF MUMBAI. Indian don’t know Lenin. Thanks to cpm

  2. Biggest task of our era is to expose able disciples of kautsky Bernstein who are only using parliament leaving Historical tasks and teaching of Guru’s. They are not interested to prepare public for day to day struggle and ultimately Smashing State apparatus with force

  3. If revisionist leaders of cpm can do Nandi gram singur. If its clear m can say in 2004 invest in the western bengal as we have not Boycotted American goods during Iraq war. They have no objection on GUjrat massacre provided that it is beneficial to the interest of Capitalism. Followers of the Kowtsky, khrushcev. They don’t want to develop mood for resistance of Proletariat and peasants. But just to help retain them in their fold they do 1 day annual strike.ikewise

  4. Without making bitter struggle with leaders of second international Lenin could have not done revolution, given us Leninism at its best. Stalin did same. Mao exposed Khrushcev similarly Protecting developing liveliness, vigour of Marxism Leninism. Present day world over such traitor are there, agents of imperialist. Yes there are some communist who seriously want revolution unlike leaders of cpi cpm etc. They can join hands. Have open discussions. Do wha ever they can do to realise slogan Unite Workers of the world.

  5. From the Great Debate, page 243, Gargi Publication, Hindi….. In 1904 Mensevik were in top of everything be a council, organ, central committee. Lenin wrote a letter to Zurich group of bolshevik…. Leaders have dissociated themselves from Party. Centre is out of party. Either you are with Centre or party. ( This is almost same condition today in India and world. Only difference perhaps is that we don’t have today Lenin to launch struggle)

  6. Wish to thank all the commentators . Learnt a lot from these comments. Writing on Communists in India is not an easy task. Hope there wasn’t any factual error in this piece . CP

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