Home काॅलम अख़बारनामा : आज का इंडियन एक्सप्रेस और पुराने दिनों का जनसत्ता

अख़बारनामा : आज का इंडियन एक्सप्रेस और पुराने दिनों का जनसत्ता

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आज अखबारों की चर्चा बाद में, पहले पत्रकारिता। इसमें कोई शक नहीं था कि ज्यादातर अखबारों में आज पहली खबर या लीड भारतीय वायु सेना के पायलट, विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तान के कब्जे से सुरक्षित वापस आने की खबर ही होगी। हालांकि, बड़ी खबर एक दिन पहले वाली थी जो कल छप चुकी है। पाकिस्तान कब्जे में लिए गए वायु सेना के पायलट को बिना शर्त रिहा कर देगा यह पुरानी घोषणा है और इस आधार पर खबर कल के अखबारों में लीड थी। शीर्षक कल जैसे ही आज भी हैं। यानी पाकिस्तान विंग कमांडर को छोड़ देगा और विंग कमांडर सुरक्षित पुहंच गए – लगातार दो दिन एक सी खबरें देश के अखबारों ने लीड बना दी।

देशभक्तों और बूथ मजबूत करने वालों की बात अलग है। मैं पत्रकारिता की बात ही करूंगा। आज सभी अखबारों ने इस खबर को लीड बनाया है। इसलिए आप मुझे गलत कह सकते हैं। पर मैं इस खबर को लीड नहीं बनाता। हर तरह से यह सेकेंड लीड है। फॉलो अप है। अगर कोई दूसरी खबर नहीं होती तो बात अलग थी। आज जो खबरें हैं एक बार उन्हें भी देख लेते हैं। हिन्दू में खबर है, “विपक्ष सशस्त्र सेना पर शक कर रहा है, पाकिस्तान की सहायता कर रहा है:मोदी”। उपशीर्षक है, “कन्याकुमारी में प्रधानमंत्री ने कहा कि ये पार्टियां सिर्फ मोदी के प्रति घृणा से संचालित होती हैं”। भक्ति के साथ पत्रकारिता के लिए यह खबर बुरी नहीं थी। टेलीग्राफ में खबर है, “लेसन फॉर पीएम ऑन ट्वीटर”। एक और खबर है जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ वन को नुकसान पहुंचाने की शिकायत करने के बारे में सोच रहा है। दोनों धुर विरोधी है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर है। यह मौसमी खबर है। कभी भी लीड बन सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है कि महाराष्ट्र, गुजरात, गुजरात, मध्य प्रदेश में पश्चिम रेलवे ने आंतंकवादी हमले कि खिलाफ अलर्ट जारी किया है। सारा मामला ही इन दिनों आतंक का है। इन सबके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि चुनाव समय पर होंगे। यह कम नहीं है और साधारण संयोग नहीं है कि बूथ मजबूत होने, पायलट प्रोजेक्ट पूरा होने, राजनीति रुक सकती है जैसे बयानों और लगभग युद्ध के हालात बनने-बनाने की कोशिशों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त कह रहे हैं कि चुनाव समय पर होंगे। इसपर भी लिखा जा सकता था। पायलट प्रोजेक्ट भले ही चुटकी हो हम चुनाव आयुक्त के इस बयान पर वैसे ही चुटकी क्यों नहीं ले सकते हैं।

इसी तरह, नवोदय टाइम्स में (पहले पन्ने पर) खबर है, विंग कमांडर के अभिभावकों का विमान में अभिनंदन। दैनिक भास्कर ने लीड के साथ ही छापा है कि कुपवाड़ा में पांच जवान शहीद हो गए और पुंछ में नौ माह की बच्ची समेत परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई। अमर उजाला में खबर है, रास नहीं आया नया दफ्तर, अब पुराने में बैठेंगे अमित शाह।

पत्रकारिता को देशभक्ति बना देने की इन स्थितियों में आज कोई दूसरी कोई खबर कैसे लीड बन सकती थी। ज्यादातर अखबारों ने अभिनंदन के वापस आने की खबर को ही बनाया है तो आज मुझे मौका मिला की अखबारों में खबरों के चयन का एक अपना पुराना अनुभव आपको बताऊं। मैं कई दिनों से आपको यह बताना चाह रहा था। आज के अखबारों ने मौका दे दिया। खास कर इंडियन एक्सप्रेस ने। इंडियन एक्सप्रेस ने एक शब्द अभिनंदन को शीर्षक बनाया है और अंग्रेजी में हिन्दी का यह एक शब्द शीर्षक के लिए पर्याप्त है। इस लिहाज से यह प्रशंसनीय है। अखबार ने इस मुख्य खबर के साथ सुशांत सिंह की खबर बाईलाइन के साथ छापी है। खबर बिना किसी अधिकारी का नाम लिए बताती है कि पाकिस्तान पर भारत के हवाई हमले से संबंधित “रडार इमेजरी” से पुष्टि होती है कि जैश के मदरसे में 4 इमारतों को नुकसान हुआ।

इमेजरी का मतलब होता है कल्पना (जी हां रडार की कल्पना और यह विमान के मामले में महत्वपूर्ण है) पर बिना अधिकारी का नाम लिए इस सरकारी खबर को इतनी प्रमुखता से छापने का क्या मतलब? खासकर तब जब कल ट्वीटर पर स्वामीनाथन ए अय्यर के कॉलम की चर्चा थी (अखबार में किसी को पता ही न हो तो अलग आश्चर्य है) जिसमें उन्होंने हवाई हमले से पहले ही सलाह दी थी कि किसी पुरानी या खाली बिल्डिंग पर बम गिराकर खबर छपवा ली जाए और यह युद्ध के मुकाबले बेहतर होगा। ऐसे में यह सरकारी खबर इतनी प्रमुखता से छापना सरकारी विज्ञप्ति छापने की तरह है।

इससे मुझे जनसत्ता के पुराने दिन याद आए और मैं यह इंडियन एक्सप्रेस के बचाव में नहीं बता रहा हूं। जनसत्ता में मुख्य रूप से चार संस्करण निकलते थे। एक शाम में पांच बजे के करीब, दूसरा रात 10 बजे के करीब और तीसरा नगर संस्करण। इसके अलावा एक डाक संस्करण भी होता था पर इसमें खास बदलाव नहीं किया जाता था सिर्फ तारीख बदलती थी। तीनों एडिशन के लिए एडिशन इंचार्ज होते थे। दूसरे और तीसरे के लिए संस्करण इंचार्ज को समाचार संपादक और उपसमाचार संपादक का सहयोग मिलता था जो उनसे सीनियर भी होते थे। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मुख्य अखबार 10 बजे वाला होता था बाकी में ताजी खबरें ही लगाई जाती थीं। अंदर के पन्ने भी संशोधित होते थे।

उन दिनों जनसत्ता में हमलोगों को इतनी आजादी थी या काम करने का ऐसा भूत सवार रहता था कि जरूरी नहीं होने पर भी हममें से कई लोग पूरा संस्करण लगभग नया बना देते थे जबकि तब इसमें मेहनत ज्यादा थी गलती होने का जोखिम भी रहता था। आलम यह था कि एडिशन देखकर हमलोग समझ जाते थे कि एडिशन इंचार्ज कौन रहा होगा। यानी हर एडिशन इंचार्ज का बनाया अखबार अलग। एक ने खबर को चार कॉलम में लगाया था दूसरे ने हटा दिया या अंदर के पन्ने पर एक कॉलम में निपटा दिया। शीर्षक लगाने का अंदाज और उसमें भी विविधता। इसी से पता चलता था कि किस खबर को कौन ऐसा ट्रीटमेंट देगा। यह उस व्यक्ति के मिजाज औऱ रोज के काम से हम समझ चुके थे।

मुझे चार-पांच महीने हो गए सभी अखबारों को देखकर लिखते हुए। पता नहीं आपने महसूस किया या नहीं, अब ज्यादातर अखबार एक से होते हैं। पहला पन्ना तो खासकर। मैं यही बताने की कोशिश कर रहा हूं कि अब सभी अखबारों के संपादक एक ही स्कूल के पढ़े लगते हैं या एक ही जगह से निर्देश पाते हैं। इससे अखबारों की विविधता खत्म हो गई। यही हाल टेलीविजन का है। नतीजा यह हुआ कि हर कोई एक ही अखबार पढ़ता है और फिर वह अखबार उस व्यक्ति की राय और उसका विचार बदलने की कोशिश में लग गया है। यह संभव है कि प्रधानमंत्री को सवाल पसंद न हो पर हम उन्हें खुश करने के लिए परेशान क्यों हों? ट्वीटर पर आज टेलीग्राफ ने जो खबर छापी है उसमें लिखा है कि ट्वीटर पर प्रधानमंत्री को जो प्रतिक्रिया मिली उसमें से जो छापने लायक है उसे ही छाप रहा है। वो भी संपादित। इससे आप समझ सकते हैं कि ट्वीटर पर एक आदमी तो प्रधानंमंत्री से ऐसी बात कह दे रहा है जो छापने लायक नहीं है पर अखबार सवाल पूछने से डरते हैं या इंडियन एक्सप्रेस सरकारी बयान को लीड बना दे रहा है।

आइए अब दूसरे अखबारों को देखें। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ ने विंग कमांडर अभिनंदन की सिंगल कॉलम में पर पूरे कद की फोटो लगाई है। शीर्षक है, पायलट बैक आफ्टर सस्पेंस एंड टेप (संदर्भ दिन भर के इंतजार के दौरान उठी आशंकाओं और पाकिस्तान द्वारा जारी वीडियो का है)।

टाइम्स ऑफ इंडिया का भी मुख्य शीर्षक है, हार्टफेल्ट अभिनंदन। लेकिन यहां फ्लैग शीर्षक में बताया गया है कि है, पायलट के वापस आने में देरी हुई क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें प्रचार वाला वीडियो रिकार्ड करने के लिए मजबूर किया। आखिरकार दिन भर के इंतजार के बाद वाघा सीमा पार कर भारत आए।
हिन्दुस्तान टाइम्स की शीर्षक है, अभिनंदन ऑन इंडियन सॉयल। यह भी अच्छा है। इसका दोनों मतलब हो सकता है – विंग कमांडर अभिनंदन का भारत में अभिनंदन और विगं कमांडर अभिनंदन भारतीय जमीन पर।

द हिन्दू के शीर्षक हमेशा सीधे साफ सपाट होते हैं। वह शीर्षक से प्रयोग नहीं करता। आज भी वैसा ही है – अभिनंदन अराइव्ज टू हीरोज वेलकम। उपशीर्षक भी वैसा ही है और अगर आपने टेलीविजन देखा हो तो खबर जानते हैं। यहां अलग खबर होती है, शीर्षक नहीं।

हिन्दुस्तान का शीर्षक है, अभिनंदन का अभिनंदन। नवभारत टाइम्स ने भी इसे लीड बनाया है पर तीन कॉलम में ही। तीन लाइन का शीर्षक है, ढेरों दस्तावेज मांगे, कोर्ट पहुंचा, विडियो बनाया, तब पायलट छोड़ा पाक ने। 60 घंटे बाद लौटे विंग कमांडर का जोरदार स्वागत। दैनिक भास्कर ने ’58 घंटे बाद’ लिखा है। जागरण ने 59 घंटे बाद। नवोदय टाइम्स ने जांबाज का अभिनंदन शीर्षक लगाया है। राजस्थान पत्रिका का शीर्षक है, पाक को आंखें दिखा सीना ताने लौटे। अमर उजाला का शीर्षक है, जन गण मन … अभिनंदन। दैनिक जागरण का शीर्षक मुझे समझ में नहीं आया। आपको समझ में आए तो बताइए। मुख्य शीर्षक है, “वर्तमान :गण … मन … अभिनंदन”। उपशीर्षक है, बुधवार सुबह 10:18 बजे गुलाम कश्मीर में उतरे थे, 59 घंटे बाद शुक्रवार रात 9:21 बजे भारतीय भूमि पर रखा कदम। दैनिक भास्कर का शीर्षक है, 58 घंटे के बाद देश में अभिनंदन।

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