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सत्रहवीं लोकसभा में आधी दुनिया: पिछड़ा कहे जाने वाले सूबे ओडिशा का महिला सांसदों में दबदबा

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आम चुनाव 2019 के परिणामों के विश्लेषण विभिन्न आयामों के सन्दर्भ में लम्बे अरसे तक किये जाते रहेंगे। इनमें महिलाओं का भारी मतदान और महिला प्रत्याशिओं का अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन भी शामिल है। मीडियाविजिल के मंगलवारी चुनाव चर्चा के इस अंक में हम इसका विस्तृत जायजा लेंगे।

पिछले आम चुनाव में 61 महिलाएं लोकसभा में जीत कर गई थीं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस बार नया रिकार्ड कायम कर सर्वाधिक 76 महिलाएं लोकसभा में पहुंची हैं, लेकिन हक़ीकत और भी है। इस आम चुनाव में भी पुरुष प्रत्याशियों का ही बोलबाला रहा, जो कुल 7334 थे। महिला प्रत्याशियों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। कुल 8049 उम्मीदवारों में 10 प्रतिशत से भी कम सिर्फ 717 महिलाएं थीं जबकि देश में उनकी आबादी लगभग आधी है। भारत भर में औसतन करीब 14 प्रतिशत महिला उम्मीदवार ही जीत सकीं।

महिला प्रत्याशियों ने सबसे ज्यादा 33 प्रतिशत जीत अपेक्षाकृत पिछड़े कहे जाने वाले राज्य ओडिशा में दर्ज की। वहां की केउंझार सीट से जीती आदिवासी नेता चंद्राणी मुर्मू नई लोकसभा में सबसे युवा (करीब 26 बरस की) हैं। 2019 के आम चुनाव में भी पुरुष प्रत्याशियों का ही बोलबाला था जो कुल 7334 थे। देश में क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़े राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर शहर की लोकसभा सीट पर  48 बरस बाद कोई पहली महिला प्रत्याशी कांग्रेस की पूर्व मेयर ज्योति खण्डेलवाल चुनाव मैदान में तो उतरीं पर वो भारतीय जनता पार्टी के पुरुष प्रत्याशी एवं निवर्तमान सांसद राम चरण बोहरा से हार गईं। जयपुर से पूर्ववर्ती राजघराने की गायत्री देवी 1962 से तीन बार स्वतंत्र पार्टी की लोकसभा सदस्य रही थीं। इस बार जयपुर राजघराने की दूसरी सदस्य एवं भाजपा की दीया कुमारी राजसमंद सीट पर कांग्रेस के देवकीनंदन गुर्जर को करीब पांच लाख वोटों से हरा कर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं। दिवंगत गायत्री देवी उनकी दादी थीं। पूर्ववर्ती ही सही राजघरानों के दिन नहीं लदे हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराना की वंशज हैं, जिनके पुत्र दुष्यंत सिंह भाजपा प्रत्याशी के रूप में राजस्थान की झालावाड़-बारां लोकसभा सीट से लगातार तीसरी बार जीते हैं।

Chandrani Murmu

संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की व्यवस्था करने के लिए एक विधेयक 2010 में ही राज्यसभा ने पारित कर दिया था, लेकिन इस विधेयक पर लोकसभा में कभी मतदान ही नहीं हो सका। भारत के पुरुषसत्तात्मक समाज की राजनीति इसमें अड़चने खड़ी करती रही है। परिणामस्वरूप वह विधेयक 15वीं लोकसभा के 2014 में भंग होने के उपरान्त स्वतः निरस्त हो गया। भाजपा और कांग्रेस हर बार कहती रही हैं कि वे सत्ता में आने पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था करेंगी लेकिन दोनों ही इस आरक्षण को लेकर ज्यादा गंभीर नज़र नहीं आती हैं। वरना वे बिना किसी अधिनियम के भी 17वें लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतार सकती थीं। जैसा कि इस बार ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के बीजू जनता दल (बीजेडी) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने कर दिखाया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ कदम आगे बढ़ कर लोकसभा और विधानसभाओं समेत सभी विधायिका और सरकारी रोजगार में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की जो फिलवक्त तो अर्थहीन ही निकली।

लगभग सभी राज्यों में वोटर लिस्ट में दर्ज महिला मतदाताओं की संख्या और उनके अपने मताधिकार का उपयोग करने में भी भारी इजाफा हुआ। सर्वाधिक शिक्षित और कई मामलों में देश में अव्वल केरल में ही नहीं, सामाजिक रेनेसाँ के साक्षी पश्चिम बंगाल, द्रविड़ आंदोलन की भूमि तमिलनाडु, अर्द्धसामंती बिहार अरब सागर तटवर्ती गोआ तथा पर्वतीय उत्तराखंड, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और यहां तक कि लक्षद्वीप और दादरा-नगर हवेली जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान अधिक रहा। आम चुनाव के विस्तृत आंकड़े उजागर होने पर और भी नए तथ्य सामने आ सकते हैं। जैसे अपनी-अपनी सीटों से चुनाव मैदान में फिर उतरी भाजपा की 16 महिला प्रत्याशियों में से केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी (सुल्तानपुर), चंडीगढ़ से निवर्तमान सांसद किरण खेर और

नई दिल्ली सीट से निवर्तमान सांसद मीनाक्षी लेखी की जीत हुई लेकिन अन्य दलों और राज्यों में महिला प्रत्याशियों का पूरा अधिकृत ब्योरा तत्काल स्पष्ट नहीं है। सवाल उठता है कि क्या स्वतंत्र भारत में  इस बार सर्वाधिक 76 महिलाओं के लोकसभा पहुंचने से ही देश में महिला साधिकारिता राजनीतिक रूप से हासिल हो गई है?

हम जानते हैं कि भारत में विगत में इंदिरा गांधी जैसी महिला शासक होने के बावजूद हमारा समाज मूलतः पितृसत्तात्मक ही है। हम यह भी देख चुके हैं कि भारत में शिक्षा प्रशासक एवं आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी मार्लेना पूर्व दिल्ली सीट पर भाजपा प्रत्याशी एवं पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर से हार गईं और आतंकी हिंसा में आरोपित एवं राष्‍ट्रपिता महात्मा गांधी के दोषसिद्ध हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करने वाली प्रज्ञा ठाकुर भाजपा की ही प्रत्याशी के रूप में भोपाल सीट से जीत गईं।

चुनाव में महिलाओं के सन्दर्भ में एक जानकारी यह भी है कि मतदान में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अब 1.5 प्रतिशत ही पीछे रह गयी हैं। प्रथम दो आम चुनाव के आंकड़े तत्काल उपलब्ध नहीं हैं लेकिन 1962 में तीसरे आम चुनाव में कुल मतदाताओं में से 63 प्रतिशत पुरुषों और 46 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले थे। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की अध्यक्ष यामिनी अय्यर ने डॉ. प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला की हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘द वर्डिक्ट’ और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के हवाले से एक अध्ययन में बताया कि वोटर लिस्ट में महिला मतदाताओं के नाम दर्ज करने में काफी वृद्धि हुई है।  भारत में महिला मतदाताओं की संख्या 2014 के 47 प्रतिशत से बढ़कर 48.13 प्रतिशत हो गई है।  इसलिए भी 2019 के आम चुनाव में महिलाओं के मतदान का हिस्सा और बढ़ने की संभावना व्यक्त की गई थी। लेकिन महिला प्रत्याशियों की संख्या 1962 से लेकर 1996 के बीच कुल उम्मीदवारों के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं थी। इस बार भी इसमें दो प्रतिशत का ही इजाफा हुआ।

ओडिशा

बीजेडी ने पार्टी उम्मीदवारों में से 33 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं को देने का चुनाव से पहले किया अपना वादा निभाया। उसने राज्य की कुल 21 लोकसभा सीटों में से 7 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अवसर दिया। इनमें से पांच महिला उम्मीदवारों- प्रमिला बिसोयी (आसका), मंजुलता मंडल (भद्रक), राजश्री मलिक (जगतसिंहपुर), शर्मिष्ठा सेठी (जाजपुर) और चंद्राणी मुर्मू (केउंझर) ने जीत भी दर्ज की। राज्य से जीती अन्य दो लोकसभा सदस्य- अपराजिता सडांगी (भुवनेश्वर) और संगीता कुमारी सिंहदेव (बलांगीर) भाजपा की हैं। भाजपा ने छह महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था। राज्य से इन  नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों में प्रमिला बिसोयी को छोड़कर सभी सुशिक्षित भी हैं। उनमें से किसी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है। ओडिशा के इतिहास में यह पहली बार है जब राज्य से करीब 33 प्रतिशत महिलाएं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुई हैं। सत्‍तर बरस की और कक्षा दो से आगे नहीं बढ़ सकी प्रमिला बिसोयी के पास भी जटिल जीवन के व्यावहारिक अनुभव हैं। वे करीब 70 लाख महिलाओं की सदस्यता वाले स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) का बखूबी प्रतिनिधित्व करती हैं।

आदिवासी नेता चंद्राणी मुर्मू का उदाहरण अप्रतिम है। उन्होंने 2017 में भुवनेश्वर से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की बीटेक डिग्री हासिल की थी। जब वह नौकरी ढूंढ रही थीं तो बीजेडी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में केउंझर से टिकट देने की पेशकश की। वह बेहिचक चुनाव मैदान में उतर गईं। उनके अपने परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं है। उनके माता-पिता सरकारी नौकरी करते हैं, उनके नाना दो बार 1980 और 1984 में कांग्रेस के सांसद रहे थे। वह ननिहाल के जरिये ही राजनीति में आईं। उन्होंने  इस सीट पर भाजपा के अनुभवी उम्मीदवार अनंत नायक को करीब 66200 मतों के अंतर से हराया जो केउंझर से दो बार 1999 और 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए थे।

चंद्राणी के पास न खुद की गाड़ी है, न अपना मकान है और न ही कोई खास बैंक बचत। उन्होंने चुनावी हलफ़नामे में अपनी सम्पति सिर्फ 20 हजार रूपये नगदी और माता-पिता से मिला 100 ग्राम सोना ही बताई है। बीजेडी ने उन्हें 2 अप्रैल को अपना उम्मीदवार घोषित किया और वह दो माह के भीतर अब विधिवत निर्वाचित सांसद हैं।

पश्चिम बंगाल

इस बार के आम चुनाव के दौरान बीजेडी ने ही नहीं, तृणमूल कांग्रेस ने भी इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के चयन में महिलाओं को 40 प्रतिशत आरक्षण देने की अपनी घोषणा पर अमल कर राज्य में लोकसभा की 42 में से 17 सीटों पर महिला उम्मीदवार खड़े किये। इनमें से कई बांग्ला फिल्मों की अदाकारा हैं जिनमें मुनमुन सेन (आसनसोल), नुसरत जहां (बसीरहाट), मिमी चक्रवर्ती (जादवपुर), शताब्दि रॉय (बीरभूम) शामिल हैं। पिछली बार जीतने में सफल रही मुनमुन सेन इस बार हार गईं। पश्चिम बंगाल की अवाम ने इस चुनाव के दौरान कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली के समय महान शिक्षाविद एवं समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने को एक छोटी घटना बताने पर आक्रोश व्यक्त किया। टीएमसी प्रत्याशी महुआ मोईत्रा भी कृष्णागर सीट पर जीतने में सफल रहीं जो राजनीति में आने से पहले जेपी मॉर्गन कम्पनी में उपाध्यक्ष थीं। उन्हें राहुल गांधी 2008 में राजनीति में लाये थे। राज्य में इस बार भाजपा के प्रत्याशी के रूप में बांग्ला अभिनेत्री लॉकेट चटर्जी ने हुगली सीट पर टीएमसी की रत्ना डे को मामूली अंतर से हराया।

स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, जया प्रदा

भाजपा की नवनिर्वाचित महिला लोकसभा सदस्यों में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी सर्वप्रमुख कही जा सकती हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 52 हजार मतों के अंतर से परास्त कर दिया। उन्होंने इस जीत पर आह्लादित होकर दिवंगत दुष्यंत के एक शेर को बिना उनका नाम लिए अपूर्ण रूप से अंग्रेजी में ट्वीट किया, ‘ कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता’।  उसके आगे की पंक्ति है, ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।‘ गौरतलब है कि वह पहली बार लोकसभा चुनाव जीती हैं। उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव 2004 में दिल्ली की चांदनी चौक सीट पर कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के खिलाफ लड़ा था जिसमे वह विफल रहीं। 2009 में राहुल गांधी अमेठी में स्मृति ईरानी से 370,000 वोट के अंतर से जीते थे। पिछले चुनाव में उनकी जीत का अंतर 107,000 रह गया। इस बार बसपा और सपा ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये। इसलिए भी स्मृति ईरानी की जीत का महत्व है।

उत्तर प्रदेश की ही मथुरा सीट से 2014 में जीती फिल्म अदाकारा एवं भाजपा प्रत्याशी हेमा मालिनी इस बार फिर वहां से जीत गईं जिन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र की लगभग कोई देखभाल नहीं की। उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल के कुंवर नरेंद्र सिंह को हराया। उन्होंने फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र के दूसरे विवाह के लिए धर्म परिवर्तन कर निकाह किया। दोनों ने निकाह के लिए अपना नाम भी मुस्लिम किया। हेमा मालिनी के सौतेले पुत्र सनी देओल इस बार पंजाब के गुरदासपुर से भाजपा के टिकट पर जीते हैं। गुरदासपुर से भाजपा सांसद रहे दिवंगत फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना की पत्नी कविता इस बार भाजपा की ओर से चुनाव लड़ना चाहती थीं लेकिन उन्हें पार्टी से टिकट नहीं मिला। धर्मेंद्र खुद भी भाजपा के ही प्रत्याशी के रूप में 2004 में बीकानेर (राजस्थान) से जीते थे। इस बार भाजपा प्रत्याशी के रूप में जया प्रदा रामपुर में समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद आज़म खान से हार गयीं। वह इस सीट से सपा प्रत्याशी के रूप में 2004 और 2009 में जीती थीं। बाद में उन्होंने सपा से अलग होकर अमर सिंह के साथ अपनी नई पार्टी बनाई और फिर भाजपा की शरण में चली गईं।

प्रज्ञा ठाकुर

महाराष्ट्र के मालेगांव में आतंकी बम विस्फोट की वारदात के लिए आरोपित प्रज्ञा ठाकुर भी भोपाल से जीतने में कामयाब रहीं। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को करीब तीन लाख मतों के अंतर से हराया। विवादों के घेरे में रहीं प्रज्ञा ठाकुर ने वोटिंग से पहले दावा किया कि मुंबई के आतंकी-विरोधी दस्ता के प्रमुख आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे ने उन्हें प्रताड़ित किया था और उनके श्राप के कारण ही मुंबई के 2008 के हमले में उनकी मौत हुई। प्रज्ञा ने एक और विवादित बयान में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था। मोदी ने चुनाव की बेला में ट्वीट कर कहा कि वह इसके लिए प्रज्ञा ठाकुर को कभी मन से माफ नहीं करेंगे। यह दीगर बात है कि प्रज्ञा ने भाजपा के निर्देश पर गोडसे के समर्थन में दिया अपना बयान वापस ले लिया, लेकिन हकीकत यह है कि प्रज्ञा की जीत की घोषणा के बाद भोपाल में गोडसे जिंदाबाद के नारे लगे और इस पर किसी की कोई सफाई नहीं आई।

अन्य प्रमुख जीत–हार

कांग्रेस के नेतृत्व वाले युनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी परम्परागत लोकसभा सीट रायबरेली से जीतने में फिर कामयाब रहीं। वह फिर जीतने वाली कांग्रेस की एकमात्र निवर्तमान सांसद हैं। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उत्तर-पूर्वी दिल्ली सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं निवर्तमान सांसद और भोजपुरी फिल्मों के अभनेता मनोज तिवारी से हार गईं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्‍नी परणीत कौर एक अंतराल के बाद फिर पटियाला सीट से जीतने में सफल रहीं लेकिन दिवंगत फिल्म अभिनेता एवं पूर्व सांसद सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त मुंबई उत्तर-मध्य की सीट पर भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की पुत्री एवं निवर्तमान सांसद पूनम महाजन से भारी मतों से फिर हार गई। प्रिया दत्त ने लगातार तीसरी बार वहां से चुनाव लड़ा। उन्होंने अपना पहला चुनाव मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से लड़ा था जहां से उनके पिता सुनील दत्त सांसद थे। 2005 में उनकी मृत्यु के बाद वहां उपचुनाव में प्रिया दत्त जीती थीं। वह  2009 में मुंबई उत्तर-मध्य सीट से जीती थीं लेकिन 2014 में पूनम महाजन से ही हार गई थीं।

पूर्व फिल्म अदाकारा उर्मिला मातोंडकर भी मुंबई उत्तर सीट पर भाजपा के गोपाल शेट्टी से हार गईं।  पंजाब से केंद्रीय मंत्री एवं शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की पत्‍नी हरसिमरत कौर भी भटिंडा से जीतने में फिर कामयाब रहीं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले भी महाराष्ट्र में अपने गृहजिला की सीट बारामती से जीत गईं लेकिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की पुत्री एवं उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति की प्रत्याशी निज़ामाबाद की सीट पर इस बार भाजपा के धर्मपुरी अरविन्द से हार गईं। निज़ामाबाद सीट पर इस बार रिकार्ड 185 उम्मीदवार थे और इस कारण वहां इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय बैलट पेपर के जरिये चुनाव कराना पड़ा।  जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री एवं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती भी अनंतनाग सीट पर नेशनल कांफ्रेंस के हसनैन मसूदी से चुनाव हार गईं। यह सीट 2016 में महबूबा मुफ़्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके दिए इस्तीफा के कारण रिक्त थी, जहां उपचुनाव ‘सुरक्षा कारणों’ से नहीं कराये गए। अनंतनाग जम्मू कश्मीर की छह लोकसभा सीटों में शामिल है, जहां 13.6 प्रतिशत ही मतदान हुआ। महबूबा मुफ़्ती के गृहनगर बिजबेहरा में सिर्फ 2 फीसद मतदान हुआ। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव तो आजमगढ़ से जीत गए, लेकिन उनकी पत्नी एवं कन्नौज से निवर्तमान सांसद डिम्पल यादव हार गईं। फिल्म अभिनेता एवं निवर्तमान भाजपा सांसद शत्रुघन सिन्हा न केवल खुद कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पटना साहिब सीट से केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद से हारे बल्कि उनकी पत्नी पूनम सिन्हा भी लखनऊ सीट पर सपा प्रत्याशी के रूप में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से हार गईं। पूनम सिन्हा ने जोधा अकबर समेत कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया है।

आंध्र प्रदेश में एक आदिवासी स्कूल में शिक्षक रही गोदत्ति देमूडू भी 26 वर्ष की आयु में वायएसआर कांग्रेस पार्टी की टिकट पर जीत गईं। उनके पिता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में दो बार विधायक चुने गए थे।


सीपी झा मीडियाविजिल के लिए मंगलवारी स्‍तंभ चुनाव चर्चा लिखते हैं

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