Home काॅलम ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है ब्राह्मणवाद, हालाॅंकि वह इसका जनक है-डॉ.आंबेडकर

ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है ब्राह्मणवाद, हालाॅंकि वह इसका जनक है-डॉ.आंबेडकर

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 27

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और  समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की  सत्ताइसवीं कड़ी – सम्पादक

 

180.

 

मन्त्रिमण्डल को डा. आंबेडकर की चेतावनी

वयस्क मताधिकार पाने के लिए हमारी लड़ाई जारी रहेगी

(बाम्बे सेन्टिनेल, 31 जनवरी 1938)

 

‘यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय राष्ट्रीय काॅंग्रेस के टिकट पर पद भार ग्रहण करने वाला बम्बई मन्त्रालय, जिसने तड़क-भड़क के साथ वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई निर्वाचक असेम्बली  द्वारा राष्ट्रीय संविधान के निर्माण के कार्यक्रम की घोषणा की है, वयस्क मताधिकार के सवाल पर अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व से उसी तरह पीछे हट गया है, जिस तरह वह बम्बई नगर निगम, सुधार बिल के मामले में कोशिश कर रहा है।’ ये विचार डा.आंबेडकर ने ‘सेंन्टिनेल’ को दिए गए अपने साक्षात्कार में दिए हैं।

उन्होंने कहा, ‘लोथियन कमेटी के कुछ सदस्य, जिनके लिए काॅंग्रेस ने कभी अनुराग नहीं दिखाया था, पूरे प्रान्त में वयस्क मताधिकार प्रस्तुत करने के लिए तैयार थे, पर समस्या उनके सामने केवल यह थी कि मतदान दिवस पर पंजीकृत करने के लिए पुरुषों की कमी थी।’

‘काॅंग्रेस सरकार को, जो पिछले कई सालों से वयस्क मताधिकार के लिए चिल्ला रही थी, इस अवसर को जिला और तालुका परिषदों तथा नगरपालिकाओं में सबसे पहले प्रस्तुत करने की पेशकश करनी चाहिए थी। पर वे शुरुआत में ही अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गए।

‘बम्बई नगरपालिका के लिए वयस्क मताधिकार के बारे में तो उन्हें कोई संकोच करना ही नहीं चाहिए था, क्योंकि सम्पूर्ण प्रेसीडेंसी में वयस्क मताधिकार के प्रयोग के लिए यदि कोई सबसे श्रेष्ठ स्थान है, तो वह बम्बई ही है। यहाॅं साक्षरता की दर अन्य के मुकाबले सबसे ऊॅंची है, और शायद लोग भी यहाॅं सार्वजनिक हित के लिए अन्य जगहों से ज्यादा जागरूक हैं। यह बताने के और भी दूसरे कारण है कि वयस्क मताधिकार शुरु करने के लिए बम्बई ही क्यों सबसे उपयुक्त स्थान है। फिर भी काॅंग्रेस सरकार व्यस्क मताधिकार पर 1942 में विचार करने के लिए बिल पेश करती है, और इस शर्त पर कि कारपोरेशन उससे सहमत होगा।

‘जैसा कि श्री एन.एम.जोशी ने कहा है कि यह एक बेतुकी शर्त है। कारपोरेशन एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदान करके आत्महत्या करने वाला नहीं है, जो काफी हद तक उसके अस्तित्व को मिटा देगा।

‘काॅंग्रेस सरकार की नीति जो कुछ भी हो, मैं और मेरी पार्टी, जो समाज के सबसे निचले तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं, नगर के लिए वयस्क मताधिकार को सुरक्षित करने के लिए किसी भी आन्दोलन में शामिल हो जायेगी।

विधान सभा के पटल पर हम लोकतन्त्र की इस आधारभूत स्थिति को सुनिश्चित करने के लिए अनवरत लड़ाई जारी रखेंगे, यदि सम्भव हुआ तो सरकार को भी इसके लिए बाध्य करेंगे।

विधान सभा के बाहर हम जनता की इस माॅंग और सार्वजनिक वादों तथा सिद्धान्तों को लागू कराने के लिए सरकार को जनशक्ति का अहसास कराने के लिए सभाओं और प्रदर्शनों का सहारा लेंगे।

हालाॅंकि, मुझे आशा है कि मन्त्रालय को उस बिल की मूर्खता का अहसास होगा, जो वह इस तरह का बिल लाने वाला है। मुझे आशा है कि उसे विधान सभा में पेश करने से पहले वे अपने वादों को जरूर याद करेंगे और 1942 तक इन्तजार और कारपोरेशन की सहमति के बिना ही वयस्क मताधिकार लागू करने के लिए शीघ्र ही उसमें अवश्यक परिवर्तन करेंगे।

 

181.

 

मजदूरों का प्रतिनिधित्व

दलित वर्ग काॅंग्रेस से स्वतन्त्र होंगे

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 14 फरवरी 1938)

 

‘आपको एक ऐसी राजनीतिक पार्टी की जरूरत है, जो वर्गहित और वर्गचेतना पर आधारित हो और ऐसी पार्टी कोई दूसरी नहीं, सिर्फ ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ है, जिसमें आप अपने हितों को नुकसान पहुॅंचाए बिना शामिल हो सकते हैं। यह बात डा. आंबेडकर ने, 12 और 13 फरवरी को मनमाड में आयोजित जी.आई.पी.रेलवे के दलित वर्ग सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कही।

डा.आंबेडकर ने कहा कि एक अर्थ में यह पहला सम्मेलन नहीं है। पर दूसरे अर्थ में यह अपनी तरह का पहला सम्मेलन है। अब तक दलित वर्गों ने अपने सामाजिक कष्टों को दूर करने के लिए आन्दोलन किया है। उन्होंने अपनी आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए कदम नहीं उठाया है। यह पहली बार है, जब वे अपने आर्थिक कष्टों पर बात करने के लिए इकटठे हुए हैं। पहले वे ‘परिया’ के रूप में सभा करते थे, पर आज वे कामगार के रूप में सभा कर रहे हैं।

मेरे विचार में इस देश में दो शत्रु हैं, जिनके साथ मजदूरों का रोज पाला पड़ता है। वे दो शत्रु हैं ब्राह्मणवाद और पूॅंजीवाद। हमारे आलोचक हम पर इसलिए आरोप लगाते हैं, क्योंकि वे ब्राह्मणवाद को एक शत्रु मानने में विफल हो गए हैं, जबकि मजदूरों को उसका रोज सामना करना पड़ता है। जब मैं यह कहता हूॅं कि ब्राह्मणवाद एक शत्रु है, तो मैं भ्रमित करना नहीं चाहता हूॅं। ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब ब्राह्मण समुदाय के विशेषाधिकार और हितों से नहीं है, और न इस अर्थ में मैं इस शब्द का प्रयोग कर रहा हूॅं। ब्राह्मणवाद से मेरा अभिप्राय स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता के इन्कार से है। उस अर्थ में यह सभी वर्गों में मौजूद है, सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है, हालाॅंकि वह इसका जनक है।

 

रोजगार पर असर

ब्राह्मणवाद वह सर्वव्यापी सत्ता है, जिसने आर्थिक अवसरों के क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। दलित वर्गों के मजदूरों को लीजिए और उनके अवसरों की तुलना उन मजदूरों से कीजिए, जो दलित वर्गों के नहीं हैं। क्या जो अवसर उन्हें मिले हुए हैं, वह दलित वर्ग के मजदूरों को प्राप्त हैं? दलित वर्ग के मजदूर के पास क्या नौकरी की सुरक्षा और तरक्की की सम्भावनाएॅं हैं? यह सबको पता है कि ऐसे बहुत से उद्यम हैं, जिनके दरवाजे दलित वर्ग के मजदूर के लिए इसलिए बन्द हैं, क्योंकि वह एक अछूत है। इसका एक कुख्यात उदाहरण काॅटन मिल है। मैं नहीं जानता कि भारत के दूसरे भागों में क्या होता है? रेलवे को लीजिए। रेलवे में दलित वर्ग के कामगार की क्या स्थिति है? इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि उसके भाग्य में सिर्फ गैंगमैन का काम ही लिखा है। यही स्थिति रेलवे के वर्कशाप में भी है।

हम श्रमिक श्रेणियों को कैसे मजबूत कर रहे हैं? क्या इस तरह हम श्रमिकों के बीच एकता पैदा कर रहे हैं? उनमें एकता पैदा करने का सही तरीका मजदूरों को यह बताना है कि ये सामाजिक ऊॅंच-नीच कौन पैदा करता है, जिसका परिणाम इस अनुचित भेदभाव में होता है, जो सिद्धान्त में गलत है और श्रमिकों की एकता के लिए भी घातक है। दूसरे शब्दों में अगर हमें श्रमिकों की श्रेणियों में एकता कायम करनी है, तो हमें श्रमिकों के बीच से असमानता की भावना-ब्राह्मणवाद को जड़ से खत्म करना होगा।

अब प्रश्न यह है कि आपको कौन सी पार्टी चाहिए? वर्तमान में बहुत सी पार्टियाॅं हैं। एक पार्टी काॅंग्रेस है। क्या आपको काॅंग्रेस में जाना चाहिए? क्या यह श्रमिकों के लक्ष्य में सहायता करेगी? मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि श्रमिकों को राजनीति में अपना स्वतन्त्र और काॅंग्रेस से पूरी तरह अलग संगठन बनाना चाहिए। आपको वर्ग-हित और वर्ग-चेतना पर आधारित पार्टी की जरूरत है। और इस उद्देश्य को पूरा करने वाली पार्टी ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ के सिवा कोई दूसरी नहीं है, जिसमें आप अपने हितों को नुकसान पहुॅंचाए बिना शामिल हो सकते हैं।

 

182.

गोपनीय।

1934/34 एस. बी.

मेमो संख्या…………..

39-बिहार-37

 

बिहार प्रान्तीय दलित वर्ग संघ

जगजीवन राम का डा. आंबेडकर को पत्र

 

(बिहार सी. आई. डी. विशेष शाखा, पटना, दिनाॅंक 10मार्च1937,

विशेष अधिकारी की रिपोर्ट की प्रतिलिपि, पटना, दिनाॅंक 9 मार्च 1937)

 

यह गोपनीय रूप से पता चला है कि बिहार प्रान्तीय दलित वर्ग संघ, पटना के अध्यक्ष जगजीवन राम, बी.एस.सी, ने 8 मार्च 1937 को डा. बी.आर. आंबेडकर, बार-एट-लाॅ, राजगृह, दादर, बम्बई को एक पत्र लिखा है, जो इस प्रकार है-

एक हो और संगठित हो

बाॅंकीपुर, पटना, 8 मार्च 1937

संख्या 41

मेरे प्रिय डाक्टर साहेब,

 

मुझे आपका इसी 3 तारीख का पत्र मिला। अगर जाति पर आपकी विवरणिका (ब्रोशर) पूरी हो गई हो, तो कृपया उसकी एक प्रति भेजने की कृपा करें, ताकि मैं उसका अनुवाद कर सकूॅं।

मैं आपकी इच्छानुसार उन प्रत्याशियों की सूची भेज रहा हूॅं, जिन्होंने चुनाव लड़ा था। मैं मानता हूॅं कि हमने काॅंग्रेस के साथ एक समझौता किया है, और इस समझौते के परिणामस्वरूप संघ (लीग) के 9 लोग कामयाब भी हुए हैं। उन्होंने संघ के संकल्प पर और कुछ आरक्षण के साथ काॅंग्रेस के संकल्प पर भी हस्ताक्षर किए हैं। शायद आप जानते हैं कि यहाॅं बिहार में काॅंग्रेस के सिवा कोई अन्य संगठित पार्टी नहीं है। स्थानीय स्वशासन मन्त्री श्री गणेश दत्त सिंह अपनी पार्टी बनाने की कोशिश कर रहे थे, परन्तु वह उसका संगठन खड़ा नहीं कर सके। हमने आखिरी वक्त में, 29 अक्टूबर 1936 को काॅंग्रेस से समझौता किया, और 3 नवम्बर 1936 को नामाॅंकन पत्र दाखिल किए। हम दलित वर्गों ने यहाॅं अपना आन्दोलन बहुत देर से शुरु किया था, इसलिए हमारा संगठन भी अभी छोटा है। किन्तु जो अनुभव हमने हाल के चुनावों में प्राप्त किया है, उसने साबित कर दिया है कि यदि हमने अगले 5 वर्षों तक अपना कार्य जारी रखा, तो हम अगला चुनाव बहुत अच्छी तरह और सफलता के साथ लड़ सकते हैं।

आप इलाहाबाद के श्री बलदेव प्रसाद जायसवाल को जानते हैं। वह पटना आए हुए हैं और एक अखिल भारतीय सम्मेलन करना चाहते हैं। यहाॅं उनके द्वारा अखबारों में वक्तव्य दिया गया है कि सम्मेलन की अध्यक्षता दीवान बहादुर श्रीनिवासन करेंगे और आप भी सम्मेलन में भाग लेंगे। मैं सच्चाई नहीं जानता और न मैं इस आदमी पर विश्वास कर सकता हूॅं। पिछले वर्ष लखनऊ में एक सम्मेलन हुआ था और श्री जायसवाल उस सम्मेलन के संचालन में गतिशील व्यक्ति थे। मैं सिर्फ आपसे मिलने के लिए पूरे दिन लखनऊ में रहा था, परन्तु आपको न देखकर निराशा हुई थी। अब वह मेरी मदद ले रहे हैं, पर मैं तब तक खुलकर उनकी मदद नहीं कर सकता और न किसी तरह की कोई मदद उनको दे सकता हूॅं, जब तक कि मुझे यह न पता चल जाए कि आप इस सम्मेलन में सम्मिलित होंगे। यह सम्मेलन 9, 10 और 11 अप्रैल 1937 को होने वाला है। बिहार का कोई भी व्यक्ति उनके साथ नहीं है। उन्होंने यहाॅं कैथोलिक चर्च में अपना कार्यालय बनाया है, और सारा प्रबन्ध मिशनरियों के द्वारा किया जा रहा है।

दलित वर्ग संघ की कार्य कारिणी समिति ने पटना में 15 अप्रैल और 15 मई 1937 के बीच किसी तारीख को प्रान्तीय सम्मेलन करने का निश्चय किया है,और उसमें आपको आमन्त्रित करने का भी निर्णय लिया है। किन्तु यदि आप श्री जायसवाल के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आ रहे हैं, जिसका मुझे सन्देह है, तो हम अपने सम्मेलन की उसी के आसपास 12 अप्रैल की तारीख तय कर लेंगे। क्या आप इस पत्र के मिलते ही यथाशीघ्र सूचित करने की कृपा करेंगे कि आप श्री जायसवाल के सम्मेलन में आयेंगे या नहीं? एक बात और, वह सौ से ज्यादा दलित वर्गों की भीड़ जुटाने में समर्थ नहीं होंगे। हालाॅंकि उन्होंने हजारों की संख्या में मुसलमानों और ईसाईयों को भी आमन्त्रित किया है, जैसा कि उन्होंने लखनऊ में किया था। मैं इस तरह की रीति का घोर विरोध करता हूॅं। हमें वास्तविक दलित वर्गों का ही सम्मेलन करना चाहिए। शीघ्र ही उत्तर की प्रत्याशा में।

सादर।

भवदीय

(हस्ताक्षर)

जगजीवन राम

 

बिहार प्रान्तीय विधान सभा के लिए चुनाव लड़ने वाले सदस्यों की सूची

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नाम एवं पता                 टिकट                मतदान

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  1. जगजीवन राम, चंडावा, आरा। दलित वर्ग संघ-काॅंग्रेस               निर्विरोध
  2. राम बसावन रबिदास, गोपालगंज, सारन। तदैव                       तदैव
  3. बालगोविन्द भगत, बेटिटहा, चम्पारन। तदैव                        तदैव
  4. शिवनन्दन राम, वी. मन्सूरपुर, चम्पारन, डाक.

मारवान, जिला मुजफ्फरपुर।                                 तदैव                        तदैव

  1. डा. रघु नन्दन प्रसाद, सदर अस्पताल, मुंगेर। तदैव                        तदैव
  2. कारू राम, शिक्षक, सेंट कोलम्बस कालेज, हजारी बाग। तदैव                        तदैव
  3. राम बरस दास (बरसू चमार), ग्राम बेलथू, डा. शाहकुन्द,

जिला भागलपुर।                                           तदैव                        754

  1. महावीर दास लालूचक, डा. मिरजन हट। मिनिस्टीरियल                1700
  2. बिशुनचरन दासरबिदास, कोआपरेटिव सोसाइटी,

जिला मनभूम।                                          पुरुल्लिया लीग काॅंग्रेस             1964

 

बनाम

गुल्लू धोबी, ग्राम मामुरजोरे                                मिनिस्टीरियल                 2300

  1. जीतूराम, ग्राम बंसडीह, डा. लेशी गंज,

जिला पलामू।                            लीग काॅंग्रेस                  2744

बनाम

फगुनी राम, क्लर्क, जिला परिषद, डाल्टन गंज,

जिला पलामू।                                               मिनिस्टीरियल 532

  1. राम प्रसाद, महासचिव, दलित वर्ग संघ (लीग),

पटना।                                                    लीग काॅंग्रेस                   1473

बनाम

कालर दुसाध,                                               मिनिस्टीरियल                   511

  1. सुन्दर पासी, ग्राम केश्ता, डा. दलसिंह सराय,

जिला दरभंगा।                                                काॅंग्रेस                   निर्विरोध

  1. केशव पासवान, ग्राम बिहटा, डा. बेनीपटटी,

जिला दरभंगा।                                                  तदैव                     तदैव

  1. सुखारी पासी, चाकन्द डाकघर, जिला गया। तदैव                    तदैव
  2. बूॅंदी पासी, डाक. बरसालीगंज, जिला गया। तदैव                     3555

बनाम

दलीप दुसाध                                              मिनिस्टीरियल                  487

  1. जगलाल चैधरी, स्वराज आश्रम,

डाक. टिक्का पटटी, जिला पुरैना।                              काॅंग्रेस                      4789

बनाम

लगतुप मुसहर,                                            मिनिस्टीरियल                  1769

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पिछली कड़ियाँ—

 

26. धर्मांतरण का आंदोलन ख़त्म नहीं होगा- डॉ.आंबेडकर

25. संविधान का पालन न करने पर ही गवर्नर दोषी- डॉ.आंबेडकर

24. ‘500 हरिजनों ने सिख धर्म अपनाया’

23. धर्म बदलने से दलितों को मिली सुविधाएँ ख़त्म नहीं होतीं-डॉ.आंबेडकर

22. डॉ.आंबेडकर ने स्त्रियों से कहा- पहले शर्मनाक पेशा छोड़ो, फिर हमारे साथ आओ !

21. मेरी शिकायत है कि गाँधी तानाशाह क्यों नहीं हैं, भारत को चाहिए कमाल पाशा-डॉ.आंबेडकर

20. डॉ.आंबेडकर ने राजनीति और हिंदू धर्म छोड़ने का मन बनाया !

19. सवर्ण हिंदुओं से चुनाव जीत सकते दलित, तो पूना पैक्ट की ज़रूरत न पड़ती-डॉ.आंबेडकर

18.जोतदार को ज़मीन से बेदख़ल करना अन्याय है- डॉ.आंबेडकर

17. मंदिर प्रवेश छोड़, राजनीति में ऊर्जा लगाएँ दलित -डॉ.आंबेडकर

16अछूतों से घृणा करने वाले सवर्ण नेताओं पर भरोसा न करें- डॉ.आंबेडकर

15न्यायपालिका को ‘ब्राह्मण न्यायपालिक’ कहने पर डॉ.आंबेडकर की निंदा !

14. मन्दिर प्रवेश पर्याप्त नहीं, जाति का उन्मूलन ज़रूरी-डॉ.आंबेडकर

13. गाँधी जी से मिलकर आश्चर्य हुआ कि हममें बहुत ज़्यादा समानता है- डॉ.आंबेडकर

 12.‘पृथक निर्वाचन मंडल’ पर गाँधीजी का अनशन और डॉ.आंबेडकर के तर्क

11. हम अंतरजातीय भोज नहीं, सरकारी नौकरियाँ चाहते हैं-डॉ.आंबेडकर

10.पृथक निर्वाचन मंडल की माँग पर डॉक्टर अांबेडकर का स्वागत और विरोध!

9. डॉ.आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया!

8. जब अछूतों ने कहा- हमें आंबेडकर नहीं, गाँधी पर भरोसा!

7. दलित वर्ग का प्रतिनिधि कौन- गाँधी या अांबेडकर?

6. दलित वर्गों के लिए सांविधानिक संरक्षण ज़रूरी-डॉ.अांबेडकर

5. अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ प्रभावी क़ानून ज़रूरी- डॉ.आंबेडकर

4. ईश्वर सवर्ण हिन्दुओं को मेरे दुख को समझने की शक्ति और सद्बुद्धि दे !

3 .डॉ.आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तो भड़का रूढ़िवादी प्रेस !

2. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

1. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

 



कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत। दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए विख्‍यात। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।