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बिसात-2014 : राष्ट्रीय मंच पर नरेंद्र मोदी की आमद से यादगार बना सोलहवां आम चुनाव

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सोलहवीं लोकसभा चुनने के लिए 2014 में हुआ आम चुनाव पिछले सभी आम चुनावों के मुकाबले कई मायनों में खास रहा। खास इस मायने में कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जिस तरह इस चुनाव को अपनी तड़क-भड़क वाली तैयारियों से अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव जैसा बनाना चाहते थे, उसमें वे काफी हद तक कामयाब रहे।

खास इस मायने में भी कि आजादी के बाद देश पर लगभग पांच दशक तक शासन करने वाली कांग्रेस इस चुनाव में अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय से रूबरू हुई। इस मायने में यह चुनाव खास रहा कि इस बार चुनाव प्रचार भौंडेपन के निम्नतम स्तर पर पहुंचा और किसी भी खेमे ने अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत रूप से कीचड़ उछालने में कोई कोताही नहीं बरती। इस सिलसिले में आधुनिक संचार साधनों का भी अभूतपूर्व इस्तेमाल हुआ।

इस बार के चुनाव खास इसलिए भी रहे कि एक्जिट पोल के नतीजे आने के पहले ही शेयर बाजार कुलांचे भरता हुआ रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा और डॉलर टूटने लगा। यह चुनाव इसलिए भी खास रहा कि चुनाव आयोग के चुनाव सुधार सबंधी तमाम दावों के बावजूद इस बार जिस तरह पानी की तरह पैसा बहाया गया वैसा पहले कभी नहीं हुआ। बेतहाशा खर्चीले चुनाव प्रचार का स्वाभाविक असर मीडिया, सर्वे एजेंसियों और सट्टा बाजार पर भी दिखा और उन पर भी एक व्यक्ति यानी नरेंद्र मोदी का रंग छाया रहा।

भाजपा वास्तविक अर्थों में अखिल भारतीय पार्टी बनी

बेहतरीन चुनावी रणनीति, तड़क-भड़क वाले प्रचार, मीडिया द्वारा निर्मित नरेंद्र मोदी की विकास पुरुष की छवि के चलते पूरे चुनाव अभियान के दौरान भी भाजपा जबरदस्त बढ़त बनाती दिखी और यह बढ़त चुनाव नतीजों में भी तब्दील हुई। 2009 के आम चुनाव में तो भाजपा का वोट प्रतिशत महज 18.80 ही रह गया था जो इस चुनाव में बढ़कर 31 फीसद हो गया। उसके सहयोगी दलों ने भी 7.5 फीसद वोट हासिल किए। इस चुनाव में मोदी ने अपने धुआंधार प्रचार से या यूं कहें कि अपने मार्केटिंग कौशल से भाजपा का ग्राफ न सिर्फ उसके पारंपरिक प्रभाव क्षेत्रों में बढ़ाया, बल्कि वहां भी उसकी वापसी कराई जहां पहले कभी उसकी फसल लहलहाती थी। यही नहीं, मोदी भाजपा को वहां भी ले जाने और जमाने में सफल रहे जो भाजपा के लिए एक तरह से बेगाने रहे थे। कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के आगमन से भाजपा वास्तविक अर्थों में अखिल भारतीय पार्टी बन गई।

चुनाव नतीजों से जाहिर हुआ कि भाजपा ने न सिर्फ अपना वोट प्रतिशत बढ़ाया, बल्कि सीटों के मामले में भी उसका प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा। भाजपा 282 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। उसके नेतृत्व वाले एनडीए को मिली कुल सीटों की संख्या 336 रही। जो कामयाबी अपनी पार्टी या गठबंधन को अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी कभी नहीं दिला सके, वह नरेंद्र मोदी ने दिलाई। उत्तर प्रदेश में जो पार्टी पिछले चुनाव में अजित सिंह के लोकदल के सहारे चौथे नंबर पर थी, वह मोदी की बदौलत इस बार अकेले अपने दम पर न सिर्फ सबसे आगे रही बल्कि 80 में अकेले 72 सीटें जीत कर उसने बाकी सभी पार्टियों का लगभग सफाया कर दिया।

मोदी बने प्रधानमंत्री, पूरी पार्टी उनके आगे हुई नतमस्तक

चुनाव से पहले तक भाजपा में कुछ नेता मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने से खिन्न थे और अपने को असहज महसूस कर रहे थे। जिन लालकृष्ण आडवाणी की दावेदारी और मोदी के नाम पर असहमति को खारिज कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराया था, वे आडवाणी अपनी गांधीनगर सीट से चुनाव तो लड़े लेकिन देश में कहीं भी पार्टी का प्रचार करने नहीं निकले। आडवाणी की करीबी सुषमा स्वराज भी अपने नेता की उपेक्षा से खुश नहीं थीं।

पार्टी के एक अन्य दिग्गज नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी मोदी के लिए अपनी वाराणसी सीट छिन जाने से क्षुब्ध थे, हालांकि वे कानपुर से चुनाव लड़े और जीते भी लेकिन पूरे चुनाव के दौरान पार्टी का प्रचार करने कहीं नहीं गए। चुनाव नतीजे आने के बाद इन सभी नेताओं के सुर बदल गए। पूरी पार्टी मोदी के आगे नतमस्तक दिखी। पार्टी से बड़ा कद मोदी का हो गया। एनडीए के घटक दलों ने मिलकर मोदी को औपचारिक तौर पर संसदीय दल का नेता चुनाव और उन्होंने धूमधाम से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक हार से रूबरू हुई कांग्रेस

इस चुनाव में कांग्रेस को अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। वह लोकसभा में आधिकारिक विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रही। उसे मात्र 44 सीटें मिलीं। उत्तर और मध्य भारत में ही नहीं, बल्कि मुसीबत के समय हमेशा उसे सहारा देने वाले दक्षिण भारत ने भी उसे बुरी तरह निराश किया। सिर्फ केरल ने ही उसे थोड़ा-बहुत सहारा दिया। पश्चिम और पूर्वोत्तर के राज्यों ने भी कांग्रेस से मुंह मोड़ लिया। कई राज्यों में तो उसका खाता ही नहीं खुल पाया। उसके कई दिग्गज नेता अपनी पारंपरिक सीट बचाने में नाकाम रहे। कांग्रेस से उसका दलित, आदिवासी और मुस्लिम जनाधार तो 2004 से पहले ही बड़े पैमाने पर छिटक चुका था, इस चुनाव में उस मध्यवर्ग का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया जिसने उसकी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का भरपूर फायदा उठाया।

कुछ ही क्षत्रप अपना किला बचा पाए, लोकसभा बेनूर हो गई

वामपंथी तथा अन्य दलों के पारंपरिक गढ़ भी बुरी तरह ढह गए। अपवाद रहे सिर्फ पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा। पश्चिम बंगाल में जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 42 में से 34 सीटें जीतने में कामयाब रहीं, वहीं तमिलनाडु में जयललिता की अन्ना द्रमुक भी अपने सहयोगी दलों के साथ 39 में से 37 सीटें जीत गई। ओडिशा में बीजू जनता दल ने भी 21 में से 20 सीटें जीत कर मोदी लहर को अपने राज्य में प्रवेश नहीं करने दिया। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू भी 15 सीटें जीत कर अपना किला बचाने में कामयाब रहे। उन्होंने यह चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होकर लड़ा था।

इस चुनाव में एक अफसोसनाक बात यह रही कि ऐसे कई नेता लोकसभा पहुंचने में नाकाम रहे, जो वर्षों से संसद के इस सदन को लोक महत्व के मुद्दों और अपनी धारदार बहसों के जरिए जीवंत और जागरूक बनाए हुए थे। गुरदास दासगुप्ता, प्रो. वासुदेव आचार्य, शरद यादव, डॉ. रघुवंश प्रसाद, असीम दासगुप्ता आदि मुखर नेताओं सहित कांग्रेस के कई दिग्गजों को भी हार का सामना करना पडा।

मतदान के लिहाजा से भी यह चुनाव ऐतिहासिक रहा। लगभग 81 करोड़ मतदाताओं में से 66.38 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, जो भारत के आम चुनाव के इतिहास में उच्चतम रहा। रिकॉर्डतोड़ मतदान के लिए यह दलील भी दी जा सकती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे की अगुवाई में चले आंदोलन के वक्त से पैदा हुई जन चेतना ने भी लोगों की अपने मताधिकार के प्रति सतर्कता बढ़ाई है। यह भी कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग और सरकारी प्रयासों से भी लोगों की यह चेतना बढ़ी है, लेकिन इस सबके बावजूद इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी से भी एक वर्ग बहुत उत्साहित होकर वोट डालने निकला।

यह तर्क भी दिया जा सकता है कि अगर मोदी के पक्षधर बहुत उत्साह से सामने आए, तो उन्हें नापसंद करने वालों की जमात भी काफी बड़ी थी, जिसने ज्यादा शोर भले ही न मचाया हो पर वह वोट डालने जरूर गई। इस सबके अलावा मतदान का प्रतिशत बढ़ाने में आम आदमी पार्टी की चुनाव मैदान में मौजूदगी के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसने अपनी आंदोलनकारी राजनीति से एक बड़े तबके को प्रभावित किया था।

इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा था- प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी। भाजपा का पूरा चुनाव अभियान नरेंद्र की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर ही केंद्रित था। राम मंदिर, धारा 370, कॉमन सिविल कोड जैसे अपने सनातन और परमप्रिय मुद्दों को भाजपा ने हाशिए पर डाल दिया था। खुद मोदी भी गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार से निर्मित अपनी छवि से छुटकारा पाने के लिए ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मंत्रोच्चार करते हुए विभाजनकारी और सांप्रदायिक नफरत से भरे भाषण देने से बचते रहे। अपने स्वभाव के विपरीत उन्होंने अपने भाषणों में पाकिस्तान को लेकर भी नरम दिखने की कोशिश की।

कांग्रेस भी पूरे चुनाव अभियान के दौरान मोदी को रोकने की रणनीति पर ही काम करती दिखी। कोई व्यक्ति मोदी का समर्थक हो या विरोधी, उसे यह तो मानना ही पड़ेगा कि देश की मौजूदा राजनीति में सबसे चर्चित और विवादास्पद इस व्यक्ति ने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे इलाकों मे भी अपने नाम का डंका बजवा लिया है और देश के बाकी हिस्सों में भी भाजपा के किसी भी अन्य नेता से ज्यादा चर्चा उनके नाम की ही रही। यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं रहा कि बिहार जैसे सूबे में तमाम जातिगत ध्रुवीकरण के बावजूद भाजपा अपने सहयोगी दलों की मदद से अकेले 22 सीटें जीतने में कामयाब रही। उसकी इस उपलब्धि का श्रेय नरेंद्र मोदी के अलावा और किसे दिया जा सकता है!

यह भी सच है कि मोदी का इस तरह खड़ा होना भी कॉरपोरेट घरानों व मीडिया जगत के सहयोग से ही संभव हो पाया। कहा जा सकता है कि जनादेश निर्माण में कौन-कौन तत्व मौजूदा दौर में प्रभावी हो सकते हैं, इसे नरेंद्र मोदी नामक परिघटना से समझा जा सकता है। इस चुनाव में 81 करोड़ मतदाताओं में से 51 करोड़ से ज्यादा ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया जो हमारे लोकतंत्र के लिए जरूर गर्व की बात हो सकती है, लेकिन इस चुनाव में कई ऐसे मुद्दे बहुत साफ उभरे जो बाकी दुनिया के लिए चर्चा और चिंतन का विषय हों न हों, हमारे लिए जरूर हैं।

इस बार चुनाव में जिस पैमाने पर पैसा खर्च हुआ, जिस सुविधा से राजनीतिक दलों ने चुनाव को सांप्रदायिक रंग दिया, फिर सुविधा के मुताबिक जातिवादी रंग चढ़ा दिया गया और जिस तरह से मतदान बढ़ा है, उससे साफ है कि चुनाव के साथ ही हमारी राजनीति और समाज में भी बहुत कुछ तेजी से बदला है। इसमें हम युवा मानस, पहली बार वोट देने वालों की अलग मानसिकता और लोकतंत्र के मजबूत होते जाने का गुणगान कर सकते हैं, पर बात सिर्फ इतनी ही नहीं रही। नौ चरणों में हुए मतदान ने हमारी चुनावी व्यवस्था की जितनी सफलता बताई, उतनी ही विफलता भी। इतना लंबा चुनाव अभियान कुल मिलाकर साधन संपन्न राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए ही मुफीद हो सकता है।

पिछले कुछ चुनावों की तरह इस बार भी चुनाव आयोग का इस बात के लिए बहुत गुणगान हुआ कि उसने चुनाव में कानफोड़ू शोर-शराबे को खत्म कर दिया और चुनाव प्रचार में झंडे, बैनर, पोस्टर तथा वाहनों के बेतहाशा इस्तेमाल को बेहद सीमित कर दिया, जिससे चुनाव में फिजूलखर्ची और कालेधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगा है। लेकिन यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि जब चुनाव में फिजूलखर्ची पर अंकुश लग गया है तो चुनाव आयोग ने एक लोकसभा उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की सीमा चालीस लाख से बढाकर सत्तर लाख रुपए क्यों कर दी और यह पैसा कहां खर्च हो रहा है?

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के प्रचार और उनकी इमेज मेकिंग का जिम्मा एक विदेशी कंपनी के पास था। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की इमेज मेकिंग पर भी सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च होने की चर्चा रही। जाहिर है कि प्रचार में जो जितना आगे या पीछे रहा, उसका खर्च भी उसी हिसाब का रहा। इस बार कुल चुनाव खर्च का अनुमान तीस हजार करोड़ से साठ हजार करोड़ रुपए तक का रहा, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव खर्च से कहीं ज्यादा है। सिर्फ चुनाव आयोग ने ही साढे तीन हजार करोड़ रुपए खर्च किए जो 2009 के आम चुनाव में हुए खर्च का तीन गुना रहा।

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अनिल जैन वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और मीडियाविजिल के लिए आम चुनावों के इतिहास पर श्रृंखला लिख रहे हैं। 

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