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बिसात-2009 : बिखरे और निस्तेज विपक्ष के चलते कांग्रेस फिर बाजी मार गई

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कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने 2009 का चुनाव अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अपनी सरकार के संतोषजनक प्रदर्शन के सहारे लड़ा। इस चुनाव में उसे उसकी मनरेगा जैसी कल्याणकारी महत्वाकांक्षी योजना के कारण ग्रामीण मतदाताओं का भी भरपूर समर्थन मिला। बिहार में हालांकि लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) इस चुनाव में यूपीए का हिस्सा नहीं रहीं क्योंकि सीटों के बंटवारे को लेकर इन दोनों पार्टियों की कांग्रेस से ठन गई थी।

इसके बावजूद यूपीए में कांग्रेस के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेन्स, झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि पार्टियां शामिल थीं। कांग्रेस के पास इस चुनाव में एक उपलब्धि यह भी थी कि उसने पहली बार केंद्र में गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था और सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। उसकी यह सफलता देश में गठबंधन राजनीति के परिपक्व होने की परिचायक थी।

चंद्रशेखर, वीपी सिंह, वाजपेयी और जॉर्ज राजनीतिक परिदृश्य से विदा

इस चुनाव का सबसे अहम पहलू यह था कि दशकों तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे चार पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिक परिदृश्य से पूरी तरह विदा हो गए। चंद्रशेखर का निधन हो चुका था, जबकि विश्वनाथ प्रताप सिंह और गुजराल अपनी गंभीर बीमारी के चलते राजनीति से दूर हो चुके थे। लगभग पांच दशक तक पहले जनसंघ और फिर भाजपा का चेहरा रहे अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी अस्वस्थता के चलते न सिर्फ इस बार चुनाव मैदान से बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य से ही गायब हो चुके थे। भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संयोजक जार्ज फर्नांडीस भी अपनी बीमारी के चलते सक्रिय राजनीति से करीब-करीब दूर हो गए थे। ऐसी स्थिति में एनडीए का नेतृत्व अब वाजपेयी और जार्ज की जगह लालकृष्ण आडवाणी और जनता दल (यू) के तत्कालीन अध्यक्ष शरद यादव के हाथों में आ गया था। आडवाणी एनडीए के अध्यक्ष थे और शरद यादव संयोजक लेकिन एनडीए के कुनबे का आकार काफी घट गया था। उसमें भाजपा के साथ जनता दल (यू), शिवसेना, अकाली दल, असम गण परिषद और इंडियन नेशनल लोकदल ही बचे थे।

आडवाणी की वाजपेयी जैसा बनने की कवायदें
Indian Prime Minister Atal Behari Vajpayee (R) and Deputy Prime minister L. K. Advani are about to hug during an election campaign rally in Lucknow, in the northern Indian state of Uttar Pradesh, April 5, 2004. Top Indian political leaders descended on the key northern state on Monday in a bid to woo voters ahead of the coming general elections. REUTERS/Pawan Kumar AH/TW – RP4DRIHUNCAB

राजनीतिक परिदृश्य से वाजपेयी के अलग हो जाने के बाद भाजपा में उनकी जगह स्वाभाविक तौर पर आडवाणी ने ले ली थी। दो सांसदों वाली भाजपा को अपने उग्र अपने उग्र हिंदूवादी तेवरों से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में आडवाणी की ही अहम भूमिका रही थी, लेकिन उनकी स्वीकार्यता भाजपा के बाहर नहीं थी। यही वजह थी कि उदार छवि वाले वाजपेयी ही अन्य दलों में अपनी स्वीकार्यता के चलते पार्टी के शीर्ष नेता बने रहे और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में कामयाब रहे। चूंकि अब वाजपेयी की राजनीतिक पारी उनके खराब स्वास्थ्य के चलते लगभग समाप्त हो चुकी थी, लिहाजा भाजपा के प्रथम पुरुष की हैसियत में अब आडवाणी ही थे। उनकी भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा अंगड़ाई लेने लगी थी, लेकिन उनके रास्ते में सबसे बडी बाधा थी- उनकी कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि।

आडवाणी ने 2004 से 2009 के बीच अपना पूरा जोर इस छवि से छुटकारा पाने में ही लगाया। उनके बयानों और भाषणों से वह सांप्रदायिक तल्खी और हिंदुत्ववादी आक्रामकता गायब हो चुकी थी जो 1988 से 1998 तक के दौर में रहा करती थी। इसी सिलसिले में वर्ष 2005 के जून महीने में उन्होंने पाकिस्तान यात्रा भी की। अपनी इस यात्रा के दौरान वे वहां न सिर्फ मुहम्मद अली जिन्नाह की मजार पर गए बल्कि वहां जाकर उन्होंने जिन्नाह को धर्मनिरपेक्ष विचारों वाला नेता भी बताया। उनके इस बयान से समूचे संघ परिवार में खलबली मच गई। संघ के तमाम नेताओं को जिन्नाह की तारीफ में दिया गया उनका बयान बेहद नागवार गुजरा। भारत लौटने पर उन्हें संघ मुख्यालय में तलब किया गया। वहां उन्होंने अपने बयान को लेकर सफाई भी दी लेकिन संघ नेतृत्व उनकी सफाई से संतुष्ट नहीं हुआ। कुछ ही समय बाद उन्हें संघ के दबाव में पार्टी की अध्यक्षता छोडना पडी। चूंकि उस समय भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं था जो वाजपेयी या आडवाणी का विकल्प बन सके, लिहाजा संघ परिवार की नजरों से उतरने के बावजूद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर आडवाणी ही पार्टी का चेहरा बने रहे। भाजपा और एनडीए ने उनकी ही अगुवाई में 2009 का चुनाव लडा।

विपक्ष निस्तेज ओर निहत्था रहा

वामपंथी दलों, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राजद, लोजपा, बीजू जनता दल, तेलुगू देशम, अन्ना द्रमुक, एचडी देवगौडा के जनता दल (सेक्युलर) आदि ने अपने-अपने प्रभाव वाले राज्यों में अकेले ही यह चुनाव लड़ा। कुल मिलाकर विपक्ष इस चुनाव में सत्तारुढ़ गठबंधन के मुकाबले लगभग निस्तेज और निहत्था था। यूपीए सरकार के खिलाफ न तो एनडीए के पास कोई बडा मुद्दा था और न ही अन्य दलों के पास।

फिर त्रिशंकु लोकसभा, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी

पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए इस चुनाव में 16 अप्रैल से 13 मई तक पांच चरणों में मतदान संपन्न हुआ। 16 मई को चुनाव नतीजे घोषित हुए, हालांकि पिछली बार की तरह इस बार भी किसी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। त्रिशंकु लोकसभा में कांग्रेस फिर सबसे बडे दल के रूप में उभरी। पिछली बार के मुकाबले उसकी सीटों में भी खासा इजाफा हुआ। 2004 में उसे 141 सीटें मिली थीं जबकि इस बार वह 207 सीटें जीतने में कामयाब रही। उसके सहयोगी दलों का भी अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन रहा। कुल मिलाकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूपीए को ढाई सौ से अधिक सीटें हासिल हुई। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और राजस्थान में यूपीए ने बेहतर प्रदर्शन किया और वह एक बार फिर सरकार बनाने की स्थिति में आ गया।

आडवाणी की महत्वाकांक्षा ध्वस्त हुई

दूसरी ओर भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने इस चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया था लेकिन इस बार भी एनडीए की करारी हार हुई। भाजपा को करारा झटका यह भी लगा कि चौदहवीं लोकसभा के मुकाबले उसकी सदस्य संख्या इस लोकसभा में 138 से घटकर 116 रह गई। यह स्थिति व्यक्तिगत तौर पर आडवाणी के लिए भी बेहद निराशाजनक थी। उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा एक बार फिर ध्वस्त हो गई थी।

वाम मोर्चा को पहली बार अपने गढ़ों में झटका लगा

गैर कांग्रेसी-गैर भाजपाई सरकार का सपना पालने वाले वाम मोर्चा का भी इस चुनाव में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। पश्चिम बंगाल और केरल में उसे करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल में जहां ममजा बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 19 सीटों पर अपना परचम लहराकर उसे तगड़ी चुनौती दी, वहीं केरल में उसे कांग्रेस के मुकाबले बुरी तरह हार का सामना करना पडा।

कुछ क्षत्रपों का जलवा कायम रहा, तो कुछ हार गए

तमिलनाडु में जयललिता के अन्ना द्रमुक की, आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम की और बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल तथा रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की करारी हार हुई। लालू यादव की पार्टी को महज चार सीटें मिलीं। वे खुद भी चुनाव जीत गए लेकिन उनकी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल सकी। खुद राम विलास पासवान भी चुनाव हार गए। ओडिशा में बीजू जनता दल अपना किला बचाने में कामयाब रहा और उसने राज्य की बीस में से चौदह सीटें हासिल की। बिहार में जनता दल (यू) ने भी अपनी ताकत में इजाफा करते हुए राज्य की 40 में से बीस सीटों पर कब्जा किया।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी बेहतर प्रदर्शन किया। उन्हें क्रमश: 22 और 21 सीटें मिलीं। चौधरी अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भी पांच सीटें जीतने कामयाब रहा। कांग्रेस ने भी यहां 21 सीटें जीतकर इस सूबे में अपनी फिर से वापसी की थी। उत्तर प्रदेश में सबसे तगड़ा झटका भाजपा को लगा था। उसे महज दस सीटें ही हासिल हो सकी थीं।

इस लोकसभा में कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी थी और सबसे बडा गठबंधन भी उसकी अगुवाई वाला यूपीए ही था। उसे पिछली बार की तरह इस बार भी सपा और बसपा का बाहरी समर्थन हासिल हो गया था। इस प्रकार सरकार बनाने के लिए उसके पास बहुमत के आंकड़े से अधिक समर्थन था। यूपीए संसदीय दल की बैठक ने डॉ. मनमोहन सिंह को फिर से अपना नेता चुन लिया था, लिहाजा उन्हीं की अगुवाई में एक बार फिर यूपीए की सरकार बनी, जो पूरे पांच साल चली।

मीरा कुमार बनीं लोकसभा अध्यक्ष

लोकसभा अध्यक्ष का पद सहयोगी दल को देने का जो सिलसिला 1996 में 11वीं लोकसभा से शुरू होकर 14वीं लोकसभा तक जारी था, वह इस बार 15वीं लोकसभा में थम गया। इस बार कांग्रेस की ही वरिष्ठ नेता और यूपीए के पहले कार्यकाल में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रहीं मीरा कुमार इस लोकसभा की अध्यक्ष चुनी गईं। देश के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर रहा जब लोकसभा अध्यक्ष के पद पर किसी महिला का चुनाव हुआ।

यूपीए का दूसरा कार्यकाल नाकामी और भ्रष्टाचार के नाम रहा

यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल का रिकार्ड कमोबेश साफ-सुथरा रहा था, लेकिन उसका दूसरा कार्यकाल तो मानो घोटालों और घपलों का पर्याय ही बन गया। महंगाई के मोर्चे पर भी यूपीए सरकार बुरी तरह नाकाम रही। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के लिए अण्णा हजारे के नेतृत्व में हुए जनांदोलन ने इस सरकार की चूलें ही हिला दीं। तमाम मोर्चों पर उसकी नाकामी के चलते उसके खिलाफ लोगों में व्यापक तौर पर असंतोष फैल गया। इसी पृष्ठभूमि में हुआ था 2014 का आम चुनाव।




लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और मीडियाविजिल के लिए आम चुनावों के इतिहास पर श्रृंखला लिख रहे हैं

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