Home काॅलम प्रपंचतंत्र: हिंदुत्व के आतंक और स्वीकार्यता का फ़र्क़!

प्रपंचतंत्र: हिंदुत्व के आतंक और स्वीकार्यता का फ़र्क़!

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अनिल यादव


भाजपा की गाड़ी में अब सेकेंड और थर्ड क्लास नहीं है. अटल बिहारी बाजपेयी के जमाने में हुआ करता था. अब सिर्फ फर्स्ट क्लास का डिब्बा है और कांग्रेस से अधिक लंबाई में फैली जनरल  बोगियों की कतार है जिसमें मंत्री से लेकर प्रचारक और कार्यकर्ता भूसे की तरह ठुंसे हुए हैं. कहने का मतलब है, नेतृत्व की दूसरी और तीसरी पंक्ति यानि भविष्य के नेताओं की नर्सरी सुखा दी गई है. देश में जब आएगी तब आएगी, पार्टी के भीतर लोकतंत्र को खत्म कर तानाशाही मुकम्मल हो चुकी है. ऐसे सवाल बहुत हैं जिनका भाजपा की जनरल बोगी वाले जवाब नहीं दे पाते. वे सत्ता की गाड़ी के ज्यादातर डिब्बों में रहस्यमय अंधेरा होने के कारण अपने लंगड़े आत्मविश्वास की कांख में एक जुमले को बैसाखी की तरह लगाते हैं, “ध्यान रहे, यह अमित शाह की भाजपा है.”

वे मोदी और अमित शाह के सबकुछ पर नियंत्रण के बाद पार्टी में आई ‘किलिंग इंस्टिक्ट’ (आदिम हत्यारी प्रवृत्ति) की बात करते हैं. यह शब्द राजनीति में क्रिकेट के रास्ते आया. बहुत दिनों तक प्रसन्ना जैसे स्पिनरों और गावस्कर जैसे टुक-टुक करने करने वाले बल्लेबाजों के जमाने तक भारतीय टीम में इस प्रवृत्ति का अभाव बताया जाता था. लेकिन तब तक स्टेडियम के नीचे तहखानों में बैठे ललित मोदी जैसे अपराधियों द्वारा खेल को सट्टाबाजार और खिलाड़ियों को भाड़े के लड़ाकू मुर्गों में नहीं बदला गया था. जीत-हार और रिकार्ड के अलावा भी क्रिकेट में बहुत कुछ था जिसे इस प्रवृत्ति के एकमात्र प्रोत्साहन पैसे ने हड़प लिया.

राजनीति में किलिंग इंस्टिक्ट का मतलब है पार्टी के भीतर-बाहर, बाधा बनने वाली संस्थाओं, मूल्यों, व्यक्तियों की हत्या और बिना किसी नैतिक या विचारधारात्मक लफड़े में पड़े में अपनी सर्वोच्चता को कायम रखना. अटल बिहारी बापजेयी में भी इस प्रवृत्ति का अभाव था वरना सिर्फ एक वोट से कांग्रेसी उनकी सरकार नहीं गिरा पाते. कहीं से भी आठ-दस सांसद खरीद लेते. गोधरा के बाद मोदी को राजधर्म की नसीहत न देते और उनसे इस्तीफा लेने की बात न करते जबकि वे उसी आरएसएस के पोलिटिकल प्रोडक्ट थे जिसके मोदी हैं. भाजपा, राजनीति, समाज और आम आदमी सभी तब से बहुत दूर चले आए हैं.

अगर हिंदुत्व की राजनीति सही रास्ते पर है तो फिर मोदी की सरकार और अमित शाह की भाजपा की क्या मजबूरी थी कि उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी के बहुप्रतीक्षित निधन को एक ‘मेगा शो’ में बदल दिया ताकि खुद को उनके तथाकथित लिबरल पदचिन्हों पर शोकमग्न चलता हुआ दिखा सकें. यह गुजरात के मुख्यमंत्री से भारत के प्रधानमंत्री बन जाने के बावजूद मोदी और उनके दाहिने हाथ अमित शाह की हार है.

भाजपा के ‘टार्गेट किलर’ पार्टी बनने के पिछले दस सालों के दौरान, बिस्तर पर पड़े होने के बावजूद अटल बिहारी बाजपेयी की पार्टी के भीतर और बाहर स्वीकार्यता ज्यादा थी. अगले आम चुनाव का सामना करने से पहले पार्टी को अपने पीछे एकजुट रखने के लिए एक उदार कलाबाजी खाने लायक लचीलापन पाने के लिए यह सुनहरा मौका था जिसे भरपूर इस्तेमाल किया गया. इस स्वीकार्यता का ही तकाजा था कि उनके धुर विरोधी वामपंथी भी शालीन और संस्कारी नजर आए. यह चुनावी हार से डराने वाली स्वीकार्यता उर्फ लोकप्रियता मजेदार चीज है, इसी के कारण सभी राजनीतिक पार्टियां दहेज, खाप, कन्या भ्रूण हत्या, बलात्कार और अंधविश्वास के कारीगर बाबाओं जैसे मुद्दों पर नहीं बोलतीं. अटल बिहारी बाजपेयी की मृत्यु ने पहली बार जनता को नेता (दोनों ही भाजपाई) के आतंक और स्वीकार्यता में फर्क करना सिखाया है.

जो लोकप्रिय है उससे लिपट कर अपना विस्तार करना आरएसएस की रणनीति रही है. धार्मिक घृणा की राजनीति में इतनी ताकत कभी नहीं थी कि अकेले कामयाबी दिला सके इसीलिए गांधी, अंबेडकर, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस यहां तक कि भगत सिंह की फोटो लगाकर जनता के बड़े दायरे तक पहुंचा जाता है लेकिन कान में गोडसे, सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय का मंत्र फूंका जाता है. वित्त मंत्री से अधिक यसमैन अरूण जेटली खामखां नहीं कह रहे हैं कि यह अटल के युग का अंत नहीं उसका विस्तार है. मतलब अटल की फोटो का रंग उड़ाकर उसे मोदी की फेशियल वाली फोटो में बदलने की तैयारी है.

अटल बिहारी बाजपेयी की छवि ऐसी करामाती बनी कैसे कि मोदी जैसे खुद पे निछावर राजनेता का भी आत्मविश्वास डोल गया, इसका रहस्य भारत की जनता के चरित्र में छिपा हुआ है. वह एक यथास्थितिवादी नेता थे जिन्होंने कुछ नहीं बदला लेकिन अपने भाषण, भांग, कविताई, लचकदार कुंआरेपन, खान-पान, विरोधियों से भी संवाद की अदा ने सबकुछ को ढक दिया. क्या एक आम आदमी भी अपने जिंदगी के मूल प्रश्नों से भागने और जिंदगी को सहनीय बनाने के लिए मनोरंजक ढंग से यही सब नहीं करता है. वे एक दिन आरएसएस के शिकंजे से निकल कर जनता की परछाई बन गए थे. अगर उनके बारे में दूसरी राय जाननी हो तो बहुमत आबादी के दलितों और पिछड़ों से पूछना चाहिए कि अटल बिहारी ने उनकी जिंदगी को कितना छुआ. लेकिन शहरी सवर्ण मध्यम वर्ग की मीठी बातों के नशे में उनकी तरफ माइक घुमाता कौन है!