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आंबेडकर विश्‍वविद्यालय, महू के कुलपति को बेइज्‍जत कर के हटाया गया, लेकिन कोई चर्चा नहीं हुई!

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आदित्‍य सिंह परिहार । महू

बीएचयू के बवाल को आखिरकार खबरों में ठीकठाक जगह मिल गई लेकिन महू, मध्यप्रदेश के एक मामले में ऐसा नहीं हुआ। हालांकि मामला यहां भी एक विचारधारा के विस्तार और खुली सोच पर अंकुश लगाने जैसा ही है।

महू के आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विवि के कुलपति ड़ॉ. आरएस कुरील को राज्य सरकार ने बेइज्जत कर हटा दिया। बात 18 सितंबर की है कुलपति को राज्य सरकार ने धारा 44 लगाकर उनके स्थान पर एक आईएएस अफसर को बैठा दिया। कुरील पर इल्जाम लगाया गया कि उन्होंने नियुक्तिों में बेईमानी की है। हालांकि इसके पीछे सरकार राजनीतिक नाराजगी बताई जाती है।

दरअसल विवि में एक कार्यक्रम के दौरान आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर के साथ कांग्रेस के नेता मोहन प्रकाश और अजय सिंह पहुंच गए थे। ये सभी महू में कांग्रेस की एक रैली में शामिल होने के लिए आए थे। विवि में कांग्रेसियों के पहुंचने के बाद यहां स्थानीय भाजपाईयों ने खासा विरोध किया और काले झंडे दिखाए। कुलपति कुरील ने सफाई दी कि उन्हें कांग्रेसी नेताओं को नहीं बल्कि बाबा साहेब के पोते होने के नाते केवल प्रकाश आंबेडकर को यहां बुलाया था अब बाकी जो आ गए तो उन्हें कैसे भगाया जाए। अब क्योंकि मामला रैली में कांग्रेसी नेताओं और मोहन प्रकाश द्वारा की गई सरकार की आलोचना का था सो सफाई नहीं सुनी गई और छोटे-छोटे नेताओं ने बड़े-बड़े मंचों पर इसकी शिकायतें की।

हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा बनाए गए इस संस्थान में कुरील के कार्य़काल में जितने भाजपा नेता आए हैं उतने तो शायद कभी नहीं पहुंचे। कुलपति महोदय ने तो आंबेडकर के बाद पहली बार किसी दलित और आदिवासी समाज के व्यक्ति को मानद उपाधि भी दे डाली। कुरील के माध्यम से इतिहास में आंबेडकर के बाद जगह पाने वाले ये थे केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और प्रदेश के शिक्षा मंत्री विजय शाह। हालांकि विवि में होने वाले कई सेमिनार सरकार के लिए कुछ असहज हो रहे थे। प्रदेश में दलितों की स्थिति पर विभिन्न शोध और सेमिनार जिनमें देश भर से बुद्धिजीवी आते थे और जो शोधार्थियों और विद्यार्थियों के दिमाग से विकास के नाम पर पड़ी धूल झाडते रहते थे। बताया जाता है कि पढ़ाई के नाम पर ये व्याख्यान मालाएं भी सरकार को खास पसंद नहीं थी।

वहीं आंबेडकर के मूल विचारों पर होने वाले सेमिनार भी बड़ी परेशानी थे जो अक्सर मौजूदा सरकार के कामकाज और रवैये पर बड़े सवाल उठाते थे। कुलपति कुरील ने अनियमितता की या नहीं ये सरकार की जांच का मामला है जो अब तक सामने नहीं रखी गई है लेकिन राजनीतिक कारणों से उन्हें हटाया जाना गलत है वहीं सरकारों को यह भी तय करना चाहिए कि आंबडकर के नाम पर खोले जाने वाले संस्थानों खासकर शैक्षणिक संस्थानो में से उनके तार्किक विचार ही हटा दिए जाएंगे तो भविष्य में आंबेडकर का स्वरूप कैसा होगा?

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