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जेएनयू : वाम छात्र संगठनों और BAPSA में संवाद और एकता ज़रूरी, शत्रुता नहीं !

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रामायण राम

जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव खत्म हुए और लेफ्ट यूनिटी के पैनल के जीत के साथ ही गहमा गहमी,आरोप-प्रत्यारोप और जुनून भरे बहसों का दौर फिलहाल थोड़ा थम गया है।अब जेएनयू पढ़ाई-आंदोलन और गुलज़ार ढाबों के अपने स्वाभाविक जीवन मे अगले एक साल के लिए वापस लौट जाएगा।

लेकिन इस बार चुनाव के खत्म होते होते यह सवाल देश के जनवाद और सामजिक न्याय पसंद लोगों को परेशान करने लगा है कि बहुजन छात्रों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले ‘बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (बापसा) ने चुनाव में जिस तरह वाम के खिलाफ घृणित कुत्सा अभियान चलाया,जिस तरह ‘लाल-भगवा एक है’ का नारा दिया गया और पूरे लेफ्ट यूनिटी को ब्राह्मणवादियों का पैनल घोषित किया,यह प्रवृत्ति सामाजिक न्याय आंदोलन और बहुजन राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी?

पिछले छात्रसंघ चुनाव से ही बापसा की जेएनयू में मजबूत उपस्थिति दर्ज हो चुकी है। जेएनयू में सामाजिक न्याय,आरक्षण और प्रोफेसरों की नियुक्ति में पिछड़ों-दलितों की भागीदारी के सवाल को सामने रखकर इस संगठन ने काफी हलचल पैदा की है। यह लोग जेएनयू को ब्राह्मणवाद का गढ़ और वामपंथी सोच के अध्यापकों स्कॉलरों को छदमवेषधारी ब्राह्मणवादी मानता है।

लेकिन अगर खास तौर पर जेएनयू की बात करें तो अपनी एडमिशन पालिसी और परिसर जनवाद के मामले में यह अव्वल रहा है। जेएनयू ही एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय रहा है जहां जाति आधारित अरक्षण के अलावा भी क्षेत्र, लिंग,भाषा जैसे आधारों पर हाशिये पर स्थित छात्रों को भी विशेष प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। और यह सब वाम-जनवादी छात्र राजनीति और प्रगतिशील सोच के बल पर हासिल किया गया था। इस विशेष प्रतिनिधित्व के प्रावधान पर ही वर्तमान सरकार का हमला जारी है। और यही वह समय है जब बापसा जेएनयू में मजबूत आवाज के रूप में उभरी है।

जेएनयू से बाहर देश के दूसरे विश्वविद्यालयों की स्तिथि भयावह है। आजकल वे जातिवादी भेदभाव की प्रयोगस्थल में तब्दील हो चुके हैं। भारत के किसी भी राज्य का कोई भी शिक्षण संस्थान ले लीजिए वे सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की कब्रगाह साबित हो रहे हैं। लेकिन वहां पर कोई बड़ा संगठित प्रतिरोध नही दिखाई देता। देश के हर हिस्से से मेडिकल कॉलेजों और इंजीनियरिंग कॉलेजों से दलित पिछड़े छात्रों के आत्महत्याओं की खबरें आती हैं लेकिन ये किसी भी सामाजिक न्याय के अलंबरदार को संवेदित नही करती। उप्र, बिहार,  मध्यप्रदेश,राजस्थान जैसे राज्यों के विश्वविद्यालयों की हालत तो बहुत ही खराब हैं , जहां दलित पिछड़े छात्रों के लिए पढ़ाई और रिसर्च करना आज भी बहुत कठिन काम है।

वर्तमान सरकार और समूचा तंत्र ही आज आरक्षण ओर सामाजिक न्याय के विरोध में खड़ा है। इसलिए आज सामाजिक न्याय का सवाल किसी एक कैंपस में लड़ी जाने वाली लड़ाई नही है। देश के विचारशील और लोकतंत्रपसन्द सामाजिक न्याय के पुरोधाओं को बापसा के इस कार्यशैली पर बात करनी चाहिए। उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आज जब देश मे एक व्यापक सामाजिक न्याय एकता की जरूरत है तब आप वामपंथ को कठघरे में खड़ा करके क्या हासिल कर पाएंगे? निश्चित तौर पर वामपंथ से आपके वैचारिक मतभेद होंगे यहां तक कि वाम की नीयत पर भी शक होगा लेकिन क्या आप सचमुच ईमानदारी से यह मानते हैं कि ब्राह्मणवाद और वामपंथ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं?

यह सवाल इसलिये भी पूछा जाना चाहिए कि इस समय हिंदुत्व की फासिस्ट सेना हर तार्किक और विवेकशील विचार को वामपंथ का नाम देकर खामोश कर देना चाहती है। गौरी लंकेश से लेकर कलबुर्गी,पानसरे और दाभोलकर की हत्या उनकी वामपंथी पहचान की वजह से हुई। लाल भगवा की यह कैसी एकता है जिसमे भगवा लाल के हर निशान को भारत से मिटा देना चाहता है !

दूसरी बात यह कि सामाजिक न्याय का वह कौन सा मॉडल है जिसे बापसा लागू करना चाहता है। वाम को हरी घास का हरा सांप कह कर जो सामाजिक न्याय की लहर उप्र, बिहार से लेकर महाराष्ट्र, तमिलनाडु तक फैली उसकी परिणति हमारे सामने है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को सदन में निर्विघ्न पहुंचाने के लिए सपा, बसपा ने विधान परिषद में अपना प्रत्याशी ही नही उतारा। यह कैसा रिश्ता है ? पिछले बीस वर्षों में सामाजिक न्याय की राजनैतिक शक्तियों ने समझौतों और मौका परस्ती के कीर्तिमान बनाएं हैं फिर भी इनसे भरोसा क्यों नही टूट रहा ?

80 के दशक के बाद से ही देश भर में वाम की जमीन पर ही सामाजिक न्याय की बेल फली फूली है। इसके पीछे निःसंदेह वाम की अपनी कमजोरियां थीं, अक्षम्य किस्म की कमजोरियां थीं, लेकिन दलित,पिछड़े की भागीदारी और सत्ता में हिस्सेदारी के लुभावने सपने दिखा कर सत्ता तक पहुंची पार्टियों ने किनको मजबूत किया ? ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने की बात से शुरू करके आज कहाँ तक पहुंचे हैं यह भी देखना चाहिए।

इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई को नए दौर में नई जमीन पर लड़ना होगा। आज महज वाम एकता से काम नही चलने वाला। वाम एकता में सामाजिक न्याय की आवाज को भी शामिल करना होगा।और सामाजिक न्याय का सवाल भारतीय क्रांति का मूलभूत सवाल है। आज आपस मे संवाद और एकता की जरूरत है न कि शत्रुता की ! यह बापसा और वाम दोनों को समझना चाहिए।

.रामायण राम

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रनेता और अब ललितपुर के एक कॉलेज में शिक्षक हैं )

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