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IIMC में भेदभाव : इंटरव्यू में मुस्लिम छात्र के’ओबीसी’ होने पर निशाना !

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देश के सबसे बड़े पत्रकारिता संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली (आईआईएमसी) में एक मुस्लिम छात्र से इंटरव्यू में भेदभाव का एक गंभीर मामला सामने आया है। इंटरव्यू करने वाले पैनलिस्ट ये भी नहीं जानते थे कि ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग में मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियाँ भी आती हैं। उन्होंने इस मसले पर छात्र को मानसिक रूप से काफ़ी प्रताड़ित किया।

आईआईएमसी के इस सत्र में रेडियो एंड टीवी जर्नलिज्म में लिखित परीक्षा पास कर इंटरव्यू के लिए बुलाए गए तल्हा राशिद ने इंटरव्यू में अपने साथ हुए भेदभाव की पूरी कहानी बयां की है…..

रेडियों एंड टीवी जर्नलिज्म इंटरव्यू कक्ष (आईआईएमसी)- 

जैसे ही मैंने कमरे में प्रवेश किया, मेरा इंटरव्यू लेने के लिए तीन पैनलिस्ट का एक दल वहां बैठा हुआ था। उनके पास पहले से ही मेरा रजिस्ट्रेशन फार्म था, जिस पर मेरी जाति और मेरे समुदाय की जानकारी थी।

दूसरे नम्बर के पैनलिस्ट ने पहला सवाल पूछा – एक मुसलमान ओबीसी कैसे हो सकता है ? जब मुस्लिमों में ओबीसी और एससी जातियां ही नहीं होती तो एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी में इन जातियां का रिजर्वेशन कैसे हो सकता है?

मैने उत्तर दिया – सर , कुछ यूनिवर्सिटी में अलग से मुस्लिम ओबीसी के लिए मु्सिलम कोटा है। मैने खुद दिल्ली यूनिवर्सिटी में इसी कोटे के तहत एडमीशन लिया है। लेकिन दूसरे पैनलिस्ट न की मुद्रा में अपना सिर हिलाते रहे, जबकि मैं लगातार अपना पक्ष रखकर उनको सहमत करने की कोशिश करता रहा।

उन्होंने मुझसे पूछा – क्या तुम्हारे पास इस समय अपनी जाति का कोई प्रमाण-पत्र है ?

मैंने तुरंत अपना जाति प्रमाण-पत्र निकाल कर दिखा दिया और अपना जाति प्रमाण-पत्र ऑन लाइन चेक करने का निवेदन भी किया। उन्होंने फिर मुझसे सवाल किया – इस जाति प्रमाण-पत्र को किसने इश्यू किया है ?

मैने जवाब दिया – जिसे इसे जारी करने का अधिकार है। मैं उनसे लगातार अपने जातिप्रमाण-पत्र की वैधता की ऑनलाइन जांच का आग्रह करता रहा पर पैनलिस्ट न. 2 लगातार अपना सर हिलाते रहे। जबकि  पैनल न. 1 के एक अन्य सदस्य ने इसे मामले को आईआईएमसी प्रशासन पर छोड़ने की बात कहते हुए इंटरव्यू शुरू करने की बात कही।

एक अन्य पैनलिस्ट सदस्य (पैनल न. 3) जो तकरीबन 40 साल की उम्र के होंगे भी पैनलिस्ट न. 1 की बात से सहमत दिखे, पर मध्य में बैठे पैनल नं 2 पर इन दो पैनलिस्टों की बात का कोई असर नहीं हुआ। इस पर पैनलिस्ट नम्बर 2 ने अपना मोबाइल फोन उठाया और किसी एसडीएम को फोन लगाया।

इसके बाद सौभाग्य से उन्होंने मेरे ग्रेजुएशन के विषयों , मेरे बैकग्राउंड और अंत में मैंने आईआईएमसी को क्यों चुना इस पर सवाल पूछा ।

मैंने सवालों का सीधा जवाब दिया। इसके बाद मुझे फाइनल राउंड में कैमरे के सामने एक मिनट तक अपनी पसंद के किसी विषय पर बोलना था। जी हां अाईआईएमसी प्रशासन द्वारा हमें इसी तरह के निर्देश दिए गए थे।

पैनलिस्ट नम्बर. 3 ने मुझसे कहा – अब आप कैमरे पर जाइए, आपका कैमरे पर बोलने का विषय क्या है ?
मैने जवाब दिया – राष्ट्रपति इलैक्शन 2017 ( जी हां , यही मेरा कैमरे पर बोलने का विषय था)

पैनलिस्ट न. 2 ने चिल्लाते हुए कहा – नहीं , मैं चाहता हूं कि आप नायक पर बोलें
मैने कहा – नायक ( सॉरी सर, मैं समझा नहीं)
पैनलिस्ट नं 2 – नाईक, वो इंसान जो मुस्लिमों को कट्टरपंथी बना रहा है।
मैं समझ गया था कि पैनल न. 2 जाकिर नाईक की बात कर रहे हैं।

मैने पैनल सदस्यों से 1 मिनट या कम से कम 30 सैकेंड देने का आग्रह किया, ताकि मैं जाकिर नाईक पर कोई ओपिनियन बना सकूं।
पर पैनलिस्ट न. 2 ने मना कर दिया।
इसके बाद मैं बदहवाश हो गया और कैमरे के सामने एकदम नर्वस होकर खराब प्रदर्शन किया।

यहां एक बात मजेदार है कि पैनलिस्ट न. 2 ने मुझसे मेरी पढ़ाई-लिखाई के बारे में कोई सवाल नहीं किया, उन्होंने तो मुझ पर सिर्फ मुस्लिम समुदाय का ओबीसी होने के नाते सवाल खड़े किए और अखिलेश सरकार को बुरा-भला कहते रहे ( उन्हें पता था कि मैं यूपी से हूं) और अंत मैं अंतिम समय पर कैमरे पर बोलने के समय पर मेरा टॉपिक बदल दिया।

उन्होंने मेरे इंटरव्यू के दौरान ही एसडीएम को फोन क्यों लगाया ?
क्या ये मुझे नर्वस करने का प्रयास नहीं था ?
क्या ये सारा ड्रामा सिर्फ इसलिए नहीं रचा गया कि मैं मुस्लिम समुदाय का ओबीसी था ?
क्या ये सब जानबूझकर नहीं किया गया ताकि मुझे असहज करके मेरी समझ को शू्न्य बनाया जा सके। ताकि मुझे कम नम्बर देने का बहाना मिल सके।

मेरे जीवन की ये पहली घटना थी जब मैं इस तरह के भेदभाव का शिकार हो हुआ
हकीकत में उस बात की कीमत चुकाई , जिस पर मैं कभी यकीन नहीं करता था।

अब सोचने वाली बात ये है कि पैनलिस्ट न. 2 के अल्पज्ञान और पैनलिस्ट न. 1 और 3 की खामोशी के कारण एक लड़के के साथ भेदभाव होता रहा। एक औऱ बात बड़े आश्चर्य की है कि इतने बड़े संस्थान में इंटरव्यू लेने के लिए कैसे-कैसे मंदबुिद्ध और अपेक्षाकृत कम सामाजिक जानकारी वाले लोग आने लगे हैं। यहां साफ है कि पैनलिस्ट न. 2 के अल्पज्ञान और मंदबुद्धि की कीमत एक छात्र को चुकानी पड़ी और जिस तरह से पैनलिस्ट नं 2 ने अंतिम समय में कैमरे पर बोलने का टॉपिक बदला , कोई भी सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है कि पैनिलस्ट नं. 2 ने ऐसा व्यवहार क्यों किया ?

सारे मामले में एक बात तो तय है कि पैनलिस्ट नं. 2 के अल्प ज्ञान की कीमत इंटरव्यू देने वाले ने चुकाई। ऐसे समय में जब देश में पसमांदा डिबेट बहुत बड़ी हो चुकी है  पैनलिस्ट नं. 2  को इस बारे में कोई खबर ही नहीं है । इससे पैनलिस्ट नं. 2 की बुद्धि पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इसके अलावा आईआईएमसी पर भी सवाल खड़े हो गए हैं कि ये संस्थान अब कैसे-कैसे अल्पज्ञानी लोगों को बच्चों का इंटरव्यू लेने के लिए बुला रहा है।

इसके अलावा एक बड़ा सवाल ये है कि इंटरव्यू लेने वाले का काम तो इंटरव्यू लेना है। कौन सा प्रमणपत्र असली है कौन सा फर्जी है। ये जांचना तो संस्थान का काम है। फिर ये पैनलिस्ट नम्बर 2 ने अपनी कम बुद्धि के साथ कागजों की जांच करने के काम में क्यों लग गए ?

नेशनल जनमत से साभार

4 COMMENTS

  1. DISCRIMINATION ON GROUND OF RELIGION ! VIOLATION OF FUNDAMENTAL RIGHTS. REGISTER AN FIR NOW AGAINST IIMC, INDIVIDUAL AT LEAST (2) A PROTEST LETTER , RATHER MARCH OF DELHI JOURNALISTS. WHY NOT INDIA ? (3) CANCELE interview. (3) terminate RASCSL FROM JOB .

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